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काश! जीएसटी की ‘पटरी’ भी बुलेट के समान होती! – अतुल मलिकराम

काश! जीएसटी की ‘पटरी’ भी बुलेट के समान होती! – अतुल मलिकराम

जापान की बुलेट को भारत की पटरी पर उतारने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली हाईस्पीड बुलेट ट्रेन के निर्माण के लिए डिब्बे निर्माण से लेकर टेक्नाॅलजी तक के लिए भारत, अपने पक्के दोस्त जापान पर आश्रित है। जी हां, जापानी कंपनी का प्रधानमंत्री मोदी के मेक इन इंडिया के सपने को हकीकत की पटरी पर उतारने में सबसे बड़ा योगदान है। यही नही परियोजना के तहत स्टेशन को भी ऐसा स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है ताकि ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों में जापानी यात्रियों के समान शिस्टाचार एवं अनुशासन निर्मित किया जा सके।

प्रत्येक स्तर पर बारीकी से मूल्यांकन और जांच-पड़ताल करने के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। जरा सोचिए कि जब 508 किमी की दूरी की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सरकार इतनी कवायद कर रही है तो सोचिए सरकार तब कितनी कवायद करती जब बुलेट का जाल पूरे देश में बिछता!
बुलेट से कुछ याद आया, अरे हां! जीएसटी। वही जीएसटी, जिसने पूरे हिन्दूस्तान की कमर तोड़कर रख दी है। हाल अब कुछ ऐसा है जानाब कि जिसे जीएसटी के बारे में कुछ अता-पता भी नही वो भी बस जीएसटी-जीएसटी ही चिल्ला रहा है।

भारत में 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू की गई थी, लेकिन अभी भी ये यहां के रहवासियों के लिए माइंड रिडल के समान बनी हुई है। हालांकि टैक्स चोरी रोकने के लिए फ्रांस ने 1954 में ही जीएसटी लागू कर दी थी। जिसके बाद करीब 160 देशो ने इसे अपनाया है। न्यूजीलैंड की जीएसटी, आदर्श जीएसटी मानी जाती है। वहीं भारत की जीएसटी, एशिया के अन्य समकक्ष देशो की जीएसटी में जमीन-आसमान का अंतर है।

क्या आप जानते हैं कि भारत का जीएसटी माॅडल, कनाडा से लिया गया है। इतना ही नही बल्कि भारत में कनाडा की तरह ड्यूल जीएसटी लागू है। अगर भारत में जीएसटी माॅडल लाने से पहले जिम्मेदार, कनाडा की राज्यव्यवस्था का अध्ययन करते, उन मापकों को ध्यान में रखते जो जनजीवन एवं व्यवस्थाओं को प्रभावित करती हैं, अगर देश में GST का मॉडल यहाँ की राज्य व्यवस्था को ध्यान में रख कर तैयार किया जाता तो आज परिस्थिति अलग होती, क्यूंकि देश की राज्य व्यवस्थाओं की चुनौतियां ही GST की जटिलता को और भी जटिल बनती चली जा रही हैं। ये चुनौतियां वो ख़राब पटरियां हैं, जो GST रूपी बुलेट ट्रेन को पटरी से उतारे जा रही हैं, और उसमे सवार यात्रियों यानी टैक्स भुगतानकर्ताओ को चोट पंहुचा रही हैं। जिस तरह सरकार बुलेट सफल बनाने में लगी है, अगर उसी तरह उसे GST समझाने एवं उसे सरल बनाने का प्रयास करना चाहिए ताकि टैक्स भुगतानकर्ता को चोट ना लगे।

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