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केतु – पाप पुण्य की चेतना

केतु – पाप पुण्य की चेतना
जीवन में कष्ट देना और जीवन के कार्यों में बाधाएं देने का कार्य केतु ग्रह करता है। अचानक दुर्घटना, शल्य चिकित्सा और भूत-प्रेत बाधा यह सभी केतु के कार्यक्षेत्र है। केतु को मोक्ष कारक ग्रह भी कहा गया है। मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक है की व्यक्ति पुण्य कर्म एकत्रित करें। श्रीमद भगवद्गीता के एक श्लोक के अनुसार –
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं, क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना, गतागतं कामकामा लभन्ते।
अर्थात
जीवात्माएं उस विशाल स्वर्ग लोक के भोगों को भोग कर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक में आ जाती हैं और पुण्य प्राप्त होने पर मृत्यु लोक से गमन कर जाती है।
इस लोक में पुण्य कर्म करने के लिए प्रेरित करने और जीवात्मा को मोक्ष का मार्ग दिखाने का कार्य केतु ग्रह करता है। इसके लिए वह व्यक्ति को पाप कर्म और पुण्य कर्म दोनों में अन्तर करने की चेतना देता है। जीवन का उद्देश्य स्पष्ट करता है। यह सर्वविदित है की प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार जीवन में सुख – दुःख की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में वर्णित स्वर्ग और नर्क के द्वार केतु के द्वारा ही खुलते है।
जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन स्वहित और दूसरों के हितों का ध्यान रखते हुए, करता है तो व्यक्ति सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है, और इसके विपरीत होने पर वह ना अपने हितों का ख्याल रखता है और ना ही दूसरों के हितों को महत्व देता है। इस भावना में स्वार्थ ही स्वार्थ होता है, त्याग और परहित की भावना गौण होती है। प्राणी मात्र के सभी जीवों के हितों को महत्व देना, और आपकी वजह से किसी को कोई कष्ट ना हो, इस विचार के साथ जीवन जीना ही सदमार्ग पर रहना है। मंगल केतु एक साथ जिस भाव को दृष्टि देते है उस भाव में फोड़े फुन्सी, कैंसर की सम्भावना देते है। प्राणी को मोक्ष देने का कार्य क्षेत्र परमात्मा ने केतु के सुपुर्द किया है। केतु की स्थिति त्रिक भाव में मंगल-शनि के साथ युति में हो तो वह जातक को एक उत्तम स्तर का शल्य चिकित्सक बनाता है। देश रक्षक बनाता है या फिर देशद्रोही बनाकर आतंकवादी बना सकता है। केतु व्यक्ति के जीवन में स्पीड ब्रेकर का काम करता है। केतु व्यक्ति की सिक्थसेंस को सक्रिय करता है। केतु व्यक्ति को सांसारिक विषयों से उन्मुख कर आध्यात्मिक विषयों से जोड़ता है। सांसारिक जीवन से मोहभंग करने के लिए केतु व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक कष्ट देता है। व्यक्ति को बोध कराता है कि सांसारिक सुख काफी भोग लिए है, अब जीवन को परमात्मा की प्राप्ति में लगाओ। ईश्वर की भक्ति में मन लगाने और स्वयं को ईश्वर को समर्पित करने का सन्देश देता है। इस प्रकार जीवन शान्ति की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ता है। इसके लिए यथासंभव उपाय करने की प्रेरणा भी केतु देता है। शान्ति की तलाश में व्यक्ति को एकांत में लेकर जाता है।
मोक्ष और शान्ति की प्राप्ति के लिए व्यक्ति तीथों पर भटकता है। संतों, महात्माओं, सन्यासियों और धर्म गुरुओं के सानिंध्य में समय व्यतीत करता है। कई बार व्यक्ति अपने दायित्वों से भागकर संन्यास जीवन का रुख लेता है। परिवार की जिम्मेदारियों से भागने वालों को मोक्ष की प्राप्ति से जीवन में कष्ट का आगमन होने पर ही व्यक्ति ईश्वर को याद करता है। सुख के समय में व्यक्ति धर्म, आस्था, विश्वास और भक्ति को संदेह की निगाहों से देखता है, केतु का रोग, शोक और व्यय भाव में होने का अर्थ यह है की व्यक्ति का जन्म दूसरों के ऋण चुकाने के उद्देश्यों से ही हुआ है। ऐसे में व्यक्ति देश सेवा, समाज सेवा के कार्यों से जोड़ता है। व्यक्ति ऐसे काम पूर्ण करें इसके लिए प्रशासनिक, सरकारी शक्तियों से युक्त भी करता है। किसी उच्च पद पर आसीन कर देता है। समाज, संसार और शरीर के दोषों को दूर करने का कार्य करता है। केतु कष्ट देने से पूर्व व्यक्ति का ध्यान भटकाता है। सामने होते हुए भी चीजे दिखाई नहीं देती है। दृष्टिभ्रम देकर दुर्घटनाएं कराता है। ज्ञानभ्रम देकर सम्मान हानि की स्थिति बनाता है। अज्ञानी होने पर भी व्यक्ति ज्ञान और सीख देने लगता है।
अब प्रश्न यह उठता है की आखिर केतु को ही क्यों मोक्ष का कारक कहा जाता है। जैसा की हम जानते है की राहु सिर है और केतु गर्दन से नीचे का भाग है। मोक्ष से क्या अभिप्राय है – मोक्ष दुखों की पूर्ण निवृत्ति है, यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है, इस लक्ष्य को इसी जीवन में पाया जा सकता है, मोक्ष जन्म मरण चक्र का समाप्त हो जाना है। मोक्ष का सामान्य अर्थ दुखों का विनाश है। मोक्ष का विचार बन्धन से जुड़ा हुआ है। आत्मा का सांसारिक दुखों से ग्रस्त होना ही उसका बन्धन है और इन दुखों से सर्वथा मुक्त हो जाना मोक्ष। व्यावहारिक जीवन में प्राय: हर कोई कहता है कि मैं दुखी हूँ, मुझे दुख है, यहाँ मैं प्रश्न यह है कि ‘मैं का अर्थ क्या है? व्यक्ति का अहं ही ‘मैं है। अहम् होने के लिए मस्तिष्क होना अनिवार्य है। और केतु के पास सिर नहीं है इसलिए केतु ग्रह अहंकार से रहित है। उसे आत्मज्ञान है। केतु को सांसारिक सम्मान, पद, पदवी और ताज की कामना नहीं रहती। केतु अपने प्रभाव से व्यक्ति को तख्तोताज को छोड़कर शान्ति के मार्ग पर लेकर जाता है। जैसे -महात्मा गौतम बुद्ध ताज का त्याग कर रातोंरात घर से निकल गए थे, भगवान् श्रीराम ताज छोड़कर वचन पालन के लिए वनवास चले गए थे।
केतु बारहवें भाव में ही क्यों मोक्ष देता है। यह पुनर्जन्म के चक्र से बाहर कर जीवन मृत्यु पर विराम लगाता है। यहाँ भी एक अन्य प्रश्न जन्म लेता है की यदि केतु बारहवें भाव में मोक्ष प्रदायक है तो क्या यहां “कारकाय भाव नाशाय” सिद्धांत के विपरीत कार्य कर रहा है। अनुभव में यह पाया गया है की शनि आठवें भाव का कारक होकर इस भाव में होने पर आयु वृद्धि देता है, ठीक इसी तरह से केतु का बारहवें भाव में होना मोक्ष कारक है। गुरु ग्रह धर्म और आध्यात्म देने वाले ग्रह है और केतु को भी आध्यात्मिक उन्नति देने वाला ग्रह कहा गया है। गुरु सांसारिक रिश्तों को निभाते हुए जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए धर्म पालन देता है। इसके विपरीत केतु संसारिकता का त्याग कर व्यक्ति को साधना जीवन की ओर अग्रसर करता है। केतु प्रभावित व्यक्ति के लिए रिश्तों के मोह से मुक्त होता है, वह रिश्तों को तुच्छ मानता है। केतु की अपेक्षा गुरु का प्रभाव अधिक हो तो व्यक्ति जनकल्याण और धर्मार्थ विषयों में धन एवं सेवा कार्य करता है। मंदिरों का निर्माण करता है। प्याऊ लगवाता है, धर्मशालाओं का निर्माण करता है, निर्माण कार्य बशर्ते शनि ग्रह ही कराते है परन्तु धर्म से संबंधित इमारतों का निर्माण विचार गुरु ग्रह ही देता है। अब यदि केतु की बात करें तो केतु संसार से दूर ले जाकर आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त हो जाने के बावजूद व्यक्ति को आगे से आगे आध्यात्मिक उन्नति पर आगे बढ़ता है।

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