543 सांसद पर्याप्त हैं, जरूरत संसद को सक्षम बनाने की है और कार्यसंस्कृति सुधारने की है

543 सांसद पर्याप्त हैं, जरूरत संसद को सक्षम बनाने की है!
लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की कांग्रेस कार्यसमिति की मांग ने परिसीमन की बहस को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। कांग्रेस ने 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग भी की है। दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय भी इससे पहले लोकसभा की सदस्य संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने और राज्यों के बीच मौजूदा सीट-वितरण को कायम रखने की मांग कर चुके हैं।
दरअसल, सवाल केवल यह नहीं है कि लोकसभा में सांसदों की संख्या कितनी होनी चाहिए, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि जितने सांसद देश ने चुने हैं, वे अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता और प्रभावशीलता से निभा रहे हैं। देश में लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के अलावा हर राज्य में विधायक और गांवों में सरपंच तथा स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि मौजूद हैं। यानी जनता के प्रतिनिधित्व का ढांचा पहले से ही काफी व्यापक है। ऐसे में सांसदों की संख्या बढ़ाने से पहले यह देखना अधिक जरूरी है कि वर्तमान सांसदों की कार्यक्षमता कैसे बढ़ाई जाए।
आज एक सांसद के सामने संसदीय जिम्मेदारियों के साथ अपने विशाल निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को देखने की चुनौती भी रहती है। इसलिए सांसदों की संख्या बढ़ाने के बजाय प्रत्येक सांसद को अधिक सक्षम कार्यालय, पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ, शोधकर्ता, विधायी विशेषज्ञ और आधुनिक डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। एक सांसद यदि अपने क्षेत्र की समस्याओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करने और उन्हें संसद में प्रभावी ढंग से उठाने में सक्षम हो, तो उसकी कार्यक्षमता कई गुना बढ़ सकती है। सांसद को केवल चुनाव जीतने वाला जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र और संसद के बीच सक्रिय सेतु बनाया जाना चाहिए।
सबसे बड़ी चिंता संसद की कार्यवाही को लेकर है। 2026 के मानसून सत्र में लोकसभा निर्धारित समय का केवल 15 प्रतिशत और राज्यसभा 33 प्रतिशत समय ही काम कर सकी। प्रश्नकाल भी लोकसभा में निर्धारित समय के केवल एक प्रतिशत तक सीमित रह गया। ऐसे में यदि संसद का कीमती समय हंगामे, नारेबाजी और लगातार स्थगन में चला जाए तो सांसदों की संख्या बढ़ाने का औचित्य समझना कठिन है। इससे पहले 2026 के बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता लगभग 93 प्रतिशत और राज्यसभा की 110 प्रतिशत रही थी। यानी समस्या संख्या की नहीं, कार्यसंस्कृति की भी है।
इसलिए एक व्यापक संसदीय सुधार की जरूरत है। सांसदों के लिए निर्वाचन क्षेत्र में नियमित जनसंपर्क और दौरे की न्यूनतम अनिवार्यता तय हो। संसद में उनकी उपस्थिति, प्रश्न पूछने, बहस में भाग लेने, समितियों के काम और निर्वाचन क्षेत्र में किए गए कार्यों का सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड जारी हो। जिस प्रकार सरकारी कर्मचारियों और संस्थाओं के काम का मूल्यांकन होता है, उसी प्रकार जनता को भी अपने सांसद के पांच वर्ष के काम का हिसाब देखने का अधिकार होना चाहिए।
संसद में जानबूझकर व्यवधान पैदा करना भी लोकतांत्रिक अधिकार की आड़ में स्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि किसी सांसद को केवल विरोध करने के कारण चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करना संवैधानिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर प्रश्न पैदा करेगा, लेकिन लगातार व्यवधान डालने वालों पर स्पष्ट आचार-संहिता, वेतन-भत्तों से संबंधित दंड और सदन की सदस्यता संबंधी कठोर लेकिन न्यायसंगत नियम बनाए जा सकते हैं। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन विरोध का अर्थ संसद को निष्क्रिय करना नहीं हो सकता।
जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है, 2023 के 106वें संविधान संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया था। मौजूदा व्यवस्था में इसका क्रियान्वयन जनगणना और उसके बाद परिसीमन से जुड़ा हुआ है। 2026 में सरकार द्वारा लाए गए संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव में इसी प्रक्रिया को बदलने और परिसीमन के लिए अलग व्यवस्था बनाने का प्रयास किया गया था, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका और उससे जुड़े विधेयक भी आगे नहीं बढ़ सके।
यहीं से सरकार और राजनीतिक दलों के सामने एक व्यावहारिक रास्ता निकलता है—यदि राजनीतिक सहमति बनती है तो महिलाओं को 2029 से ही पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए संवैधानिक रास्ता तलाशा जा सकता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व टालना उचित नहीं है। लेकिन इसके लिए परिसीमन, राज्यों के प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन पर व्यापक सहमति भी आवश्यक है।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति सांसदों की गिनती में नहीं, उनके काम की गुणवत्ता में है। 543 सांसद यदि पूरी क्षमता से काम करें, उन्हें आधुनिक संसाधन और विशेषज्ञ सहयोग मिले, उनके निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय रहना अनिवार्य हो और संसद के प्रत्येक मिनट का उपयोग जनता के मुद्दों पर हो, तो वर्तमान संख्या कम नहीं कही जा सकती। इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि सांसद कितने बढ़ाए जाएं; बहस यह होनी चाहिए कि 543 सांसदों को 543 गुना जिम्मेदार कैसे बनाया जाए। यही संसदीय सुधार का वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए।-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.