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नवरात्र-इस बार पूरे 9 दिनों की पूजा होगी और 10 वें दिन देवी की विदाई होगी

माता गज यानी हाथी पर सवार होकर आ रही हैं जो अच्छी वर्षा और उन्नत कृषि का सूचक है।

29 सितंबर से आरंभ होने वाले शारदीय नवरात्र इस बार पूरेे 9 दिन

मदन गुप्ता सपाटू,ज्योतिर्विद्, चंडीगढ़

नवरात्र का बहुत महत्व है। 9 से 10 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में शक्ति की देवी मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। साल में 4 नवरात्र पड़ते हैं लेकिन इनमें सबसे अधिक मान्यता चैत्र और शारदीय नवरात्र की है। चैत्र नवरात्र चैत्र महीने में जबकि शारदीय नवरात्र अश्विन मास में पड़ता है। इसके अलावा आषाढ़ और पौष माह में भी गुप्त नवरात्र पड़ते हैं।

 

नवरात्र 9 दिनों का होता है और दसवें दिन देवी वसर्जन के साथ नवरात्र का समापन होता है। लेकिन ऐसा हो पाना दुर्लभ संयोग माना गया है क्योंकि कई बार तिथियों का क्षय हो जाने से नवरात्र के दिन कम हो जाते हैं। लेकिन इस बार पूरे 9 दिनों की पूजा होगी और 10 वें दिन देवी की विदाई होगी। यानी 29 सितंबर से आरंभ होकर 7 अक्टूबर को नवमी की पूजा होगी और 8 अक्टूबर को देवी वसर्जन होगा।
शारदीय नवरात्र का आरंभ 29 सितंबर रविवार को हो रहा है। इसका समापन मंगलवार को होगा। ऐसे में नवरात्र में दो सोमवार और दो रविवार आने वाले हैं। अबकी माता गज यानी हाथी पर सवार होकर आ रही हैं जो अच्छी वर्षा और उन्नत कृषि का सूचक है। इसके साथ ही इस बार नवरात्र में 8 बेहद शुभ संयोग बने हैं जो साधकों और माता के भक्तों के लिए शुभ फलदायी हैं।
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
सुबह 6.16 बजे से 7.40 बजे (सुबह) के बीच है।
अभिजीत मुहूर्त -दोपहर में 11.48 बजे से 12.35 के बीच भी है।
इस बार कलश स्थापना के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और द्विपुष्कर नामक शुभ योग बन रहा है। ये सभी घटनाएं नवरात्र का शुभारंभ कर रहे हैं।
पहले सोमवार को देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी और अंतिम सोमवार को महानवमी के दिन सिद्धिदात्री की पूजा होगी। नवरात्र में दो सोमवार का होना शुभ फलदायी माना गया है।
नवरात्रि में इस दिन करें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना-

29 सितंबर, प्रतिपदा – नवरात्रि के पहले दिन घट या कलश स्थापना की जाती है। इस दिन मां के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा की जाती है।

30 सितंबर, द्वितीया – नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान है।

1 अक्टूबर, तृतीया – नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है।

2 अक्टूबर, चतुर्थी – नवरात्रि के चौथे दिन मां के कुष्मांडा स्वरुप की पूजा की जाती है।

3 अक्टूबर, पंचमी – नवरात्रि के 5वें दिन मां स्कंदमाता की पूजा करने का विधान है।

4 अक्टूबर, षष्ठी – नवरात्रि के छठें दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है।

5 अक्टूबर, सप्तमी – नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा होती है।

6 अक्टूबर, अष्टमी – नवरात्रि के आठवें दिन माता के भक्त महागौरी की अराधना करते हैं।

7 अक्टूबर, नवमी – नवरात्रि का नौवें दिन नवमी हवन करके नवरात्रि पारण किया जाता है।

8 अक्टूबर, दशमी – दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी

कलश स्थापना एवं शक्ति पूजा की संपूर्ण विधि

 

नवरात्र के दिन आप सुबह स्नान-ध्यान करके माता दुर्गा, भगवान् गणेश नवग्रह कुबेरादि की मूर्ति के साथ साथ कलश स्थापना करें, कलश सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का होना चाहिए। लोहे अथवा स्टील का कलश पूजा मे प्रयोग नहीं करना चाहिए। कलश के ऊपर रोली से ॐ और स्वास्तिक आदि लिख दें। आप को कोई भी मंत्र आता हो या नहीं आता आता हो इस विषय को लेकर चिंता न करें। कलश स्थापना के समय अपने पूजा गृह में पूर्व के कोण की तरफ अथवा घर के आँगन से पूर्वोत्तर भाग में पृथ्वी पर सात प्रकार के अनाज रखें। संभव हो तो नदी की रेत रखें। इसके पश्चात् जौ भी डालें और कलश में जल-गंगाजल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, मोली, चन्दन, अक्षत, हल्दी, रुपया पुष्पादि डालें। फिर ॐ भूम्यै नमः कहते हुए कलश को सात अनाजों सहित रेत के ऊपर स्थापित करें। अब कलश में थोड़ा और जल-गंगाजल डालते हुए ॐ वरुणाय नमः कहते हुए पूर्ण रूप से भरदें। इसके बाद आम कि पल्लव डालें, यदि आम की पल्लव न हो तो पीपल, बरगद, गूलर अथवा पाकर की पल्लव कलश के ऊपर रखने का बिधान है। जौ अथवा कच्चा चावल कटोरे मे भरकर कलश के ऊपर रखें। अब उसके ऊपर चुन्नी से लिपटा हुआ नारियल रखें। साथ ही नवग्रह भी बनाएं और अपने हाथ में हल्दी अक्षत पुष्प लेकर मन में ही संकल्प लें कि माँ मैं आज नवरात्रि की प्रतिपदा से आप की आराधना अमुक कार्य के लिए कर रहा-रही हूँ, मेरी पूजा स्वीकार करो और मेरे ईष्ट कार्य को सिद्ध करो माँ। अपने पूजा स्थल से दक्षिण और पूर्व की तरफ घी का दीपक जलाते हुए, ॐ दीपो ज्योतिः परब्रह्म दीपो ज्योतिर्र जनार्दनः! दीपो हरतु में पापं पूजा दीप नमोस्तु ते यह मंत्र पढ़ें!

 

शक्ति की साधना की सबसे सरल विधि

माता की आराधना के समय यदि आप को कोई भी मन्त्र नहीं आता हो तो आप केवल दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे से सभी पूजा कर सकते हैं। यही मंत्र पढ़ते हुए सामग्री चढ़ाएं। माता शक्ति का यह अमोघ मन्त्र है। जो भी यथा संभव सामग्री हो आप उसकी चिंता न करें कुछ भी सुलभ न हो तो केवल हल्दी अक्षत और पुष्प से ही माता की आराधना करें संभव हो श्रृंगार का सामान और नारियल-चुन्नी जरुर चढ़ाएं। एक ही बात का ध्यान रखें माँ शक्ति ही परब्रह्म हैं, उन्हें आप के भाव और भक्ति चाहिए सामग्री नहीं। इसलिए जो भी सामग्री आप के पास उपलब्ध हो वही बिलकुल भक्ति भाव और समर्पण के साथ माँ को अर्पित करें। धन और सामग्री के अभाव में अपने मन में दुख अथवा ग्लानि को स्थान न दें। आप एक ही मंत्र से पूजा और आरती तक कर सकते हैं।

 

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