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Gurugram- नप में कमाई  420 करोड़ , खर्चा लगभग 870 करोड़ बाकी खर्च किए गए 450 करोड़ कहां से आए ?

आय 420 करोड़ रुपये, खर्चा लगभग 870 करोड़ रुपये,खर्च किए गए 450 करोड़ कहां से आए ?

नगर निगम इस साल 450 करोड़ घाटे में रही, अधिकारियों ने नहीं बताया घाटे का पैसा कहां से किए खर्च
500 करोड़ के कोरपस को छेड़ा तो 2 साल में उत्पन्न होंगे फरीदाबाद जैसे हालात
Gurugram (atal hind )शनिवार को वर्ष 2020-21 के प्रस्तावित बजट पर चर्चा व सुझावों के लिए निगम अधिकारी एवं पार्षदों के बीच हुई बैठक में वार्ड-34 के निगम पार्षद आरएस राठी ने प्रस्तावित बजट को महज आकंडो का खेल बताया। उन्होंने अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाते हुए स्पष्ट कहा कि इस बजट से पढक़र अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले दो साल के भीतर गुरुग्राम नगर निगम की हालत भी फरीदाबाद निगम जैसी होगी।
राठी ने बजट पर मेयर और अधिकारियों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि निगम ने संपत्ति कर से 1100 करोड़ रुपये की आय प्रस्तावित की है जबकि 2017 में 2008-2017 तक का लगभग पिछले बकाया भी इकठ्ठे किया जा चुका है तब भी 800 करोड़ से अधिक नहीं आए। पिछले साल नगर निगम 350 करोड़ रुपये मुनाफ में थी और इस बार आय 420 करोड़ रुपये हुई और खर्चा लगभग 870 करोड़ रुपये कर दिया, यानि लगभग 450 करोड़ का सीधा घाटा। निगम अधिकारियों ने यह भी नहीं बताया कि खर्च किए गए 450 करोड़ कहां से आए। कोई लोन लिया है या एफडी तोड़ी है। यदि इसी प्रकार अगले साल भी एफडी तोड़ी तो निगम के बचे 500 करोड़ का कोरपस भी खत्म और हालात फरीदाबाद जैसे बन जाएंगे।

राठी ने बैठक में निगम की आय बढ़ाने के लिए लिखित में विभिन्न सुझाव भी दिए जिनकी मदद से निगम के राजस्व को बढ़ा हालात सुधारे जा सकते है।
सुझावों पर एक नजर:-
-नगर निगम डीएचबीवीएनएल को बिल के नाम पर सालाना 30 करोड़ रुपये से अधिक की अदायगी की जा रही है लेकिन वहीं डीएचबीवीएनएल से नगर निगम को 192 करोड़ लेने भी है। ऐसे में सालाना बिल की अदायगी करने की बजाय ये एडजस्मटंट होनी चाहिए।

-लाइसेंस कालोनियों में सभी कालोनाइजर पानी शुल्क लेते है और सभी लाइसेंस कालोनियों से 50 करोड़ की अदायगी एचएसवीपी (अब जीएमडीए)को होती रही है। जबकि नगर निगम सिर्फ पानी के लिए जीएमडीए को सालाना 100 करोड़ रुपये देते है। ऐसे में सिस्टम विकसित कर पानी का शुल्क लिया जा सकता है। इससे पानी बर्बादी रोकने पर भी मदद मिलेगी।
-टाउन एंड कंट्री प्लानिंग व एचएसवीपी ने एफएआर शुल्क से लगभग 2500 एकड़ में फैली सभी लाइसेंस कालोनियों से बीते डेढ़ साल में 200 करोड़ से अधिक इकठ्ठे किए है जबकि नगर की कालोनियां 20000 एकड़ से अधिक में फैली है जिसमें एफएआर से केवल 25 करोड़ रुपये ही प्रस्तावित किए है। निगम की टाउन प्लानिंग विंग को एफएआर के नियम सख्ती से लागू करने चाहिए। इस हेड में राजस्व को बढ़ाया जा सकता है।

– विज्ञापन शुल्क में निजी बिल्डर लाइसेंस कालोनियों में 100 करोड़ से अधिक कमा रहे है जबकि नगर निगम ने इस हेड में 20 करोड़ की आय प्रस्तावित की है। पॉलिसी में बदलाव कर राजस्व को आसानी से बढ़ाया जा सकता है।

-टाउन प्लानिंग एवं एचएसवीपी में लंबित एफएआर शुल्क को नगर निगम में ट्रांस्फर करवाया जाना चाहिए।

-मैसूर और पूने निगम की तर्ज पर यहां भी म्यूनीसिपल बोंड जारी किए जाने चाहिए। यह लोगों को जोडऩे और राजस्व बढ़ाने में मदद करेगा।

-शहर में नगर निगम की 200 एकड़ से अधिक जमीन है जिन्हें लीज पर देकर राजस्व मिल सकता है। इसके अलावा डीएलएफ साइबर सिटी की तर्ज पर कमर्शियल एवं लॉ कास्ट हाउसिंग विकसित कर आय मिल सकती है।
-नगर निगम अधिनियम के हिसाब से जिस वार्ड से जितना राजस्व मिल रह है उसका लगभग 20-25 प्रतिशत वहीं पर खर्च होना चाहिए। वार्ड-34 से 60 करोड़ से अधिक का राजस्व है लेकिन साल में खर्च 10 प्रतिशत भी नहींं करते। जबकि कुछ वार्ड से राजस्व नहीं है और वहां खर्च 20-20 करोड़ रुपये सालाना हो रहे है।

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