अब्दुल अल-सईद पर इस्लामोफोबिया 20 गुना बढ़ा

Atal Hind Team Online1 September 202612 min read36 viewsअमेरिका
अब्दुल अल-सईद पर इस्लामोफोबिया 20 गुना बढ़ा

मिशिगन सीनेट प्राइमरी चुनाव में डॉक्टर अब्दुल अल-सईद की जीत के बाद सोशल मीडिया पर नफरती पोस्ट्स में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सेंटॉर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट की रिपोर्ट के अनुसार यह हमला एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है।

वाशिंगटन डीसी /01 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

अमेरिका में 2026 का साल मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए काफी चुनौती भरा रहा है। मिशिगन में डेमोक्रेटिक पार्टी की सीनेट प्राइमरी जीत के बाद डॉक्टर अब्दुल अल-सईद पर ऑनलाइन नफरत का सिलसिला तेज हो गया।

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सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट यानी CSOH की रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी जीत के बाद सात दिनों में उनके नाम वाले एंटी-मुस्लिम पोस्ट पहले के मुकाबले करीब बीस गुना बढ़ गए।

जून से अगस्त की शुरुआत तक रोजाना औसतन 155 ऐसे पोस्ट आते थे। 4 अगस्त की जीत के बाद 4 से 10 अगस्त के बीच यह आंकड़ा रोजाना 3099 तक पहुंच गया। यानी करीब 1895 प्रतिशत की बढ़ोतरी।

इन सात दिनों में ही 21700 से ज्यादा पोस्ट दर्ज हुए। यह जनवरी से अगस्त तक उनके खिलाफ कुल 38280 इस्लामोफोबिक पोस्ट का 56.7 प्रतिशत हिस्सा है।

5 अगस्त को एक दिन में अकेले 6923 पोस्ट आए। उसी दिन एक्स प्लेटफॉर्म पर कुल एंटी-मुस्लिम पोस्ट भी गर्मी के मौसम का सबसे ऊंचा स्तर 11883 पर पहुंच गए।

CSOH ने एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, रेडिट और ब्लूस्काई जैसे प्लेटफॉर्म्स के पोस्ट का विश्लेषण किया। रिपोर्ट साफ बताती है कि नफरत सिर्फ उनकी नीतियों पर नहीं, बल्कि उनकी मुस्लिम पहचान पर केंद्रित थी।

मुख्य थीम में सबसे बड़ा हिस्सा आतंकवाद और मुस्लिम ब्रदरहुड से जोड़ने वाले आरोपों का था। कई पोस्ट में उन्हें हैमास, हिजबुल्लाह या जिहादी बताया गया। कुछ में शरिया कानून लागू करने की साजिश का दावा किया गया।

कुछ पोस्ट में कम्युनिज्म और इस्लाम को मिलाकर “इस्लामिस्ट-कम्युनिस्ट गठजोड़” की बात कही गई। मुस्लिम संगठनों के चंदे को आतंकी फंडिंग बताने वाले पोस्ट भी काफी थे। दोहरी वफादारी का आरोप और 9/11 का जिक्र करके उन्हें विदेशी और अमेरिका-विरोधी बताने की कोशिश भी हुई। कुछ पोस्ट में मुसलमानों को पश्चिमी देशों से निकालने यानी “रेमिग्रेशन” की मांग तक की गई। ये थीम नई नहीं हैं। पिछले साल न्यूयॉर्क मेयर चुनाव में जोहरान ममदानी के खिलाफ भी लगभग वही आरोप लगे थे। CSOH का कहना है कि जब कोई मुस्लिम उम्मीदवार आगे बढ़ता है तो यही पैटर्न दोहराया जाता है। अन्य स्रोतों से पता चलता है कि यह सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा। अल जजीरा की जांच में बताया गया कि चुनाव नतीजे की रात अल-सईद के भाषण से “इंशाल्लाह” शब्द को काटकर इस्तेमाल किया गया। बेनी जॉनसन जैसे प्रभावशाली अकाउंट्स ने इसे “मुस्लिम सोशलिस्ट” के रूप में पेश किया। क्लिप वायरल हुई और उसे धार्मिक खतरे का सबूत बताया गया।

वॉशिंगटन पोस्ट के विश्लेषण में पाया गया कि प्राइमरी जीत के बाद दाहिने खेमे के पोस्ट में लगभग एक तिहाई में इस्लाम, मुस्लिम या शरिया का जिक्र था। सीनेटर टॉमी ट्यूबरविल ने उन्हें “टेररिस्ट” और “रेडिकल इस्लामिस्ट” कहा। पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने हैमास समर्थक का आरोप लगाया।

ट्रंप ने उन्हें यहूदियों और इजरायल से नफरत करने वाला बताया। कुछ पोस्ट में उनके पूरे नाम अब्दुलरहमान मोहम्मद अल-सईद का इस्तेमाल करके विदेशी होने का आभास देने की कोशिश हुई।

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट में भी यही बात सामने आई कि मुस्लिम राजनेताओं की बढ़ती मौजूदगी के साथ इस्लामोफोबिया भी बढ़ रहा है। रैशिदा तलैब और इल्हान ओमर जैसे अन्य मुस्लिम डेमोक्रेट्स पर भी इसी तरह के हमले होते रहे हैं।

अल-सईद खुद इन आरोपों पर शांत रहे। उन्होंने कहा कि विरोधियों के पास सिर्फ यही तरीका बचा है। नाम और पहचान पर हमला करके असली मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि उनका नाम पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ा रहा, युद्ध नहीं छेड़ रहा और किराने का सामान महंगा नहीं कर रहा। लोग असली समस्याओं पर बात करें।

मीडिया मैटर्स की रिपोर्ट में बताया गया कि राइट-विंग मीडिया ने उन्हें विदेशी, जिहादी और इस्लामो-मार्क्सवादी जैसे शब्दों से नवाजा। लौरा लूमर जैसी हस्तियों ने जिहादी कहकर हमला किया। कुछ चैनलों पर उनके नाम के उच्चारण को लेकर भी कटाक्ष किए गए। ट्रंप की टिप्पणियों और आरएससी के विज्ञापनों में भी पूरा नाम इस्तेमाल करके विदेशी होने का संदेश देने की कोशिश दिखी।

अल-सईद मिशिगन में जन्मे और पले-बढ़े हैं। उनके माता-पिता मिस्र से आए थे। वे डॉक्टर हैं और पहले पब्लिक हेल्थ डायरेक्टर रह चुके हैं। उनकी कैंपेन मुख्य रूप से महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाएं और विदेश नीति में संयम पर केंद्रित रही। फिर भी पहचान को केंद्र में रखकर हमले किए गए।

CSOH की रिपोर्ट में पहले भी बताया गया था कि 89 चुने हुए अधिकारियों ने तेरह महीनों में 1111 सोशल मीडिया पोस्ट, आठ बिल और शरिया-फ्री अमेरिका कॉकस बनाकर एंटी-मुस्लिम माहौल बनाया। यह माहौल अचानक नहीं बना। मध्य पूर्व के तनाव और मुस्लिम उम्मीदवारों की बढ़ती भूमिका के साथ यह और तेज होता दिख रहा है। एक्स पर जून से अगस्त के बीच 4 लाख से ज्यादा एंटी-मुस्लिम पोस्ट दर्ज हुए। 5 अगस्त को यह आंकड़ा गर्मी का सबसे ऊंचा रहा।

रिपोर्ट कहती है कि मिडटर्म चुनाव आगे बढ़ने के साथ यह पैटर्न और बढ़ सकता है। अल-सईद की जीत को कई लोगों ने ऐतिहासिक माना क्योंकि वे सीनेट में जाने वाले पहले मुस्लिम डेमोक्रेट हो सकते हैं। लेकिन खुशी के साथ चिंता भी जुड़ी रही कि नफरत का स्तर कितना ऊंचा जा सकता है। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये असली जीवन में भी असर डाल सकते हैं। कुछ पोस्ट में मस्जिदों और मुस्लिम समुदाय पर सामान्य आरोप भी जुड़े रहे।

अल-सईद ने साफ कहा कि वे मिशिगन के लोगों को जानते हैं। लोग नाम से ज्यादा काम देखते हैं। उन्होंने विरोधियों को चुनौती दी कि असली मुद्दों पर बहस करें। अन्य रिपोर्टों में भी यही बात दोहराई गई कि आरोप ज्यादातर बिना सबूत के हैं। हैमास या ब्रदरहुड से कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ।

श्रिया लागू करने का दावा भी उनके बयानों से मेल नहीं खाता। फिर भी सोशल मीडिया पर ये आरोप तेजी से फैले। वॉशिंगटन पोस्ट और अन्य मीडिया हाउस ने भी इसी लहर को दर्ज किया। कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने खुलेआम मुस्लिम पब्लिक ऑफिस होल्डर्स को खतरा बताया। नैंसी मेस जैसी हस्तियों के बयान भी चर्चा में रहे।

अल-सईद ने कहा कि ऐसे हमले कमजोरी दिखाते हैं। जब विचार कमजोर पड़ते हैं तो पहचान पर हमला होता है। उन्होंने यहूदी समुदाय के साथ खड़े रहने की बात भी कही। आरोपों में उन्हें यहूदी-विरोधी बताने की कोशिश भी हुई थी। CSOH की रिपोर्ट साफ चेतावनी देती है कि यह पैटर्न स्थिर है। जब भी मुस्लिम उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा में आते हैं, यही ट्रॉप्स सक्रिय हो जाते हैं।

2026 के मिडटर्म चुनाव में यह और दिख सकता है। ऑनलाइन नफरत का यह स्तर पिछले कुछ सालों में सबसे ऊंचा रहा। रिपोर्ट में कहा गया कि सामान्य एंटी-मुस्लिम पोस्ट भी प्राइमरी के बाद 59 प्रतिशत ऊपर बने रहे। अल-सईद के खिलाफ रोजाना का आंकड़ा जून-जुलाई के स्तर से कई गुना ऊपर बना हुआ है। कई विश्लेषक कहते हैं कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम भी ऐसे पोस्ट को बढ़ावा देते हैं। भावनात्मक और भय पैदा करने वाले कंटेंट ज्यादा फैलते हैं।

अल-सईद की टीम ने इन हमलों को नजरअंदाज करते हुए मुद्दों पर फोकस रखने की कोशिश की। वे बार-बार कहते रहे कि लोग उनकी नीतियों को देखें, नाम को नहीं। मिशिगन में मुस्लिम समुदाय की अच्छी उपस्थिति है। वहां के मतदाताओं ने उन्हें प्राइमरी में समर्थन दिया। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर नफरत का माहौल अलग तस्वीर पेश करता है। ट्रट वर्ल्ड और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी CSOH रिपोर्ट को प्रमुखता दी। उन्होंने बताया कि एक हफ्ते में पिछले सात महीनों से ज्यादा पोस्ट आए। यह आंकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला है।

अल जजीरा ने “इंशाल्लाह” वाले क्लिप को लेकर अलग जांच की। आम अरबी अभिव्यक्ति को खतरे का सबूत बना दिया गया। यह तरीका पहले भी इस्तेमाल हो चुका है। शब्दों को संदर्भ से काटकर पेश करना। कुछ पोस्ट में 9/11 का जिक्र करके भावनात्मक हमला किया गया। अल-सईद ने पहले कोविड मौतों की तुलना में 9/11 का जिक्र किया था। उसे भी गलत तरीके से पेश किया गया। मीडिया मैटर्स ने सीबीएस की एक रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए जहां 9/11 से जोड़ने की कोशिश हुई। वास्तव में उनके बयान सामान्य राजनीतिक चर्चा के दायरे में थे। फिर भी मुस्लिम पहचान के कारण उन्हें अलग तरीके से पेश किया गया।

विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ट्रेंड खतरनाक है क्योंकि यह लोकतंत्र में भागीदारी को प्रभावित कर सकता है। जब कोई उम्मीदवार सिर्फ अपनी पहचान के कारण निशाने पर आए तो दूसरे भी हिचकिचा सकते हैं। अल-सईद ने खुद कहा कि मिशिगन के लोग खुले दिमाग वाले हैं। वे प्रार्थना के तरीके से ज्यादा प्रार्थना के मकसद को देखते हैं। सब एक जैसी चीजें चाहते हैं—बच्चों का भविष्य, परिवार की सुरक्षा और बेहतर जीवन।

CSOH की रिपोर्ट अप्रैल में भी प्रकाशित हुई थी जिसमें संगठित एंटी-मुस्लिम अभियान का जिक्र था। 89 अधिकारियों द्वारा समन्वित अभियान चलाया गया। श्रिया-फ्री अमेरिका कॉकस भी बनाया गया। यह सब मिलाकर माहौल तैयार करता है जिसमें कोई मुस्लिम उम्मीदवार आसानी से निशाना बन जाता है। 2026 में मध्य पूर्व के तनाव ने भी इस माहौल को और तेज किया। इस्लामोफोबिया के आंकड़े लगातार ऊपर जा रहे हैं।

अल-सईद की कहानी सिर्फ एक उम्मीदवार की नहीं है। यह बड़े पैटर्न का हिस्सा है। जब मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यक उम्मीदवार आगे बढ़ते हैं तो इसी तरह के आरोप दोहराए जाते हैं। दोहरी वफादारी, विदेशी एजेंट, शरिया और आतंक—ये शब्द बार-बार आते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि ये आरोप नीतिगत आलोचना से ज्यादा साजिशी कथा पर आधारित हैं।

अल-सईद ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि विरोधियों को बेहतर बातें चाहिए। नाम पुकारने से काम नहीं चलेगा। असली मुद्दों पर बात करनी होगी। उनकी कैंपेन महंगाई नियंत्रण, स्वास्थ्य सुविधाएं और शांतिपूर्ण विदेश नीति पर टिकी रही। फिर भी मीडिया और सोशल मीडिया का बड़ा हिस्सा पहचान पर केंद्रित रहा।

वॉशिंगटन पोस्ट ने बताया कि दाहिने खेमे की टिप्पणियों में इस्लाम का जिक्र तेजी से बढ़ा। लगभग एक तिहाई पोस्ट में यह विषय प्रमुख था। यह बदलाव जीत के कुछ घंटों में ही दिखने लगा। ट्यूबरविल का पोस्ट जल्दी आया। ट्रंप की टिप्पणी भी आई। आरएससी का विज्ञापन भी पूरा नाम इस्तेमाल करके निकला। अल-सईद ने जवाब में कहा कि अगर नाम लेना है तो सही उच्चारण करें। उन्होंने विरोधियों को चुनौती दी कि नाम छोड़कर नीतियों पर बात करें। कई मुस्लिम अमेरिकी संगठनों ने भी चिंता जताई।

सीएआईआर जैसे संगठन ने कहा कि मुस्लिमों ने काफी प्रगति की है लेकिन नफरत अभी भी बनी हुई है। कुछ समुदायों में नई मस्जिद बनाने के विरोध में भी इसी तरह की भावनाएं दिखीं। अल-सईद की जीत को कई लोगों ने बाधा तोड़ने वाला कदम माना। लेकिन साथ में यह भी याद दिलाया गया कि रास्ता अभी आसान नहीं है।

CSOH की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि मिडटर्म के आगे बढ़ने के साथ नफरत और बढ़ सकती है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर यह लहर अभी पूरी तरह थमी नहीं है। छह दिन बाद भी सामान्य एंटी-मुस्लिम पोस्ट प्री-प्राइमरी स्तर से 59 प्रतिशत ऊपर थे। अल-सईद के खिलाफ रोजाना का आंकड़ा अभी भी काफी ऊंचा है। यह स्थिति दिखाती है कि संगठित नफरत कितनी तेजी से सक्रिय हो सकती है। रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए आंकड़े कई प्लेटफॉर्म्स से लिए गए हैं। इसलिए तस्वीर व्यापक है। सिर्फ एक प्लेटफॉर्म की बात नहीं। कई स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स ने भी इसी निष्कर्ष को समर्थन दिया।

ट्रट वर्ल्ड, मोंडोवेस, न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और अल जजीरा जैसी जगहों पर अलग-अलग कोण से कवरेज आई। सबमें एक बात समान थी—पहचान को केंद्र में रखकर हमले। अल-सईद ने इन सबके बीच अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मिशिगन के लोग उन्हें जानते हैं। वे सालों से वहां काम कर रहे हैं। पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में उनका काम जाना-माना है। नाम बदलने या छिपाने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने कहा कि लोग देखेंगे कि कौन असली मुद्दों पर बात करता है। यह रुख कई युवा मतदाताओं और प्रगतिशील समूहों को पसंद आया। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर नफरत का माहौल चुनौती बना हुआ है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि सोशल मीडिया पर ऐसी लहरें सिर्फ आंकड़े नहीं छोड़तीं। ये असली बातचीत और सुरक्षा पर भी असर डाल सकती हैं। कुछ पोस्ट में खुलेआम हिंसा या निष्कासन की भाषा भी आई। CSOH ने इन पोस्ट को भी दर्ज किया। रेमिग्रेशन की मांग वाले पोस्ट खास तौर पर चिंताजनक थे। ये ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी से जुड़े होते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम उम्मीदवारों की सफलता के समय ये कथाएं सक्रिय हो जाती हैं। 2025 में न्यूयॉर्क और 2026 में मिशिगन—दो अलग जगहों पर एक जैसा पैटर्न। यह संयोग नहीं लगता।

अल-सईद की कहानी हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र में भागीदारी के साथ-साथ नफरत का मुकाबला भी करना पड़ता है। वे खुद कहते हैं कि विरोधियों के पास सिर्फ यही तरीका बचा है। नाम और पहचान पर हमला करके असली बहस से बचना। मिशिगन के मतदाताओं ने प्राइमरी में अपना फैसला दिया। अब नवंबर के चुनाव में यह देखना होगा कि राष्ट्रीय स्तर की नफरत स्थानीय मतदाताओं को कितना प्रभावित करती है।

CSOH की रिपोर्ट और अन्य स्रोतों से साफ है कि ऑनलाइन नफरत का स्तर असामान्य रूप से ऊंचा गया। बीस गुना बढ़ोतरी कोई छोटी बात नहीं। सात दिनों में पिछले सात महीनों से ज्यादा पोस्ट। यह आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कहता है। अल-सईद और उनके समर्थक इन आंकड़ों को देखकर भी आगे बढ़ रहे हैं। वे मुद्दों पर फोकस रखने की कोशिश कर रहे हैं। महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और शांति—ये उनके मुख्य विषय रहे। नफरत की लहर के बावजूद उन्होंने अपना रुख नहीं बदला। यह रुख कई लोगों को प्रेरणा भी देता है।

अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है। लेकिन साथ में चुनौतियां भी बढ़ रही हैं।

CSOH जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें इन चुनौतियों को आंकड़ों के साथ सामने लाती हैं। वे सिर्फ शिकायत नहीं करतीं। वे पैटर्न दिखाती हैं। और पैटर्न साफ है—जब मुस्लिम उम्मीदवार जीतते हैं या आगे बढ़ते हैं, तो इस्लामोफोबिया का स्तर तेजी से ऊपर जाता है। अब्दुल अल-सईद की कहानी 2026 की इस सच्चाई का एक प्रमुख उदाहरण बन गई है।

अंग्रेजी में पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ---CSOH पर क्लिक करे---

https://www.csohate.org/2026/08/12/abdul-el-sayed-islamophobia/

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