राजकीय संग्रहालय विदिशा में सुरक्षित हैं जैन शासनदेवी अम्बिका की दो अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन प्रतिमाएं

Team Atal Hind8 August 20263 min read35 viewsमध्यप्रदेश
राजकीय संग्रहालय विदिशा में सुरक्षित हैं जैन शासनदेवी अम्बिका की दो अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन प्रतिमाएं

मध्य प्रदेश के विदिशा नगर में पुरातात्त्विक कला और शिल्पकला का एक विशिष्ट केंद्र होने के कारण सैकड़ों जैन मंदिर और प्रतिमाएं निर्मित और स्थापित हुई हैं, जिनकी गौरवगाथा आज पुरावशेषों के रूप में परिलक्षित है। विदिशा राजकीय पुरातात्त्विक संग्रहालय भी मध्य प्रदेश के समृद्ध संग्रहालयों में से एक है, जिसमें तीर्थंकरों और उनके शासनदेव-देवियों की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं अभिरक्षित हैं। इस संग्रहालय में सुरक्षित जैन शासनदेवी अम्बिका की दो पुरातन प्रतिमाओं का विस्तृत परिचय डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

प्रथम अम्बिका प्रतिमा की विशेषता और शिल्प कला

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तीर्थंकर नेमिनाथ की शासनदेवी अम्बिका यक्षिणी की यह प्रतिमा द्विभुजी और ललितासन में बैठी है। वे अपने दाहिने हाथ में आम्रलुम्बी लिये हैं जिसका लुम्बन खण्डित है और बायें हाथ से अपने कनिष्ठ पुत्र प्रियंकर को संभाले हुए हैं। इनका द्वितीय ज्येष्ठ पुत्र शुभंकर मां के दाहिने पैर के समीप खड़ा है जो ऊपर को मां के आनन की ओर देखता हुआ दर्शाया गया है। नीचे उनका वाहन सिंह बैठा है। प्रतिमा के ऊर्ध्व भाग में आम्रलुम्बी की आठ अलंकृत शाखाओं से यक्षी का सुन्दर मुकुट जैसा शिल्पित किया गया है और इसका अलंकरण उच्चकोटि का है। आकर्षक केश विन्यास, एकावली हार, मुक्ताहार, उपग्रीवा, हक्कीसूत्र, कण्ठिका, द्विलड़िका हार और कुच-हार पहने अंकित है। कानों में कुण्डल, कटिमेखला, भुजबंध, कंकण, चूड़ा एवं पैजनियां सुशोभित हैं, उत्तरीय व अधोवस्त्र धारण किए है। परिकर में अधोभाग में दायीं ओर गवासन में एक अंजलिबद्ध आराधिका बैठी हुई है। बायीं एवं दायीं ओर एक-एक नारी परिचारिका चाँवरधारिणी के रूप में माला लिए खड़ी है। वितान अर्थात् ऊर्ध्व भाग के शिल्पन में मध्य में एक लघु जिन पद्मासनस्थ प्रतिमा है, इनके दोनों ओर विद्याधर युगल मालाओं से युक्त प्रदर्शित किए गए हैं। उनके भी वाह्य भाग में एक-एक पद्मासनस्थ जिन प्रतिमाएँ अंकित हैं। इन प्रतिमाओं के निचले भाग में भी एक-एक पद्मासन में जिन प्रतिमाएँ शिल्पिम है। इस तरह इस अम्बिका यक्षी के परिकर में पांच जिन प्रतिमाएँ हैं। यह प्रतिमा लाल बलुआ पत्थर पर निर्मित है और इसका समय 10वीं शती ईस्वी अनुमानित किया गया है। यह संग्रहालय की लगभग 14 यक्ष-यक्षी प्रतिमाओं में यह सर्वोत्कृष्ट प्रतिमा है।

द्वितीय अम्बिका प्रतिमा और उसकी विशेषताएं

बलुआ पाषाणफलक में शिल्पित शासन देवी अम्बिका ललितासन में अपने वाहन सिंह पर आसीन है, और सिंह भी बैठा हुआ है। द्विभुजी देवी अपने दाहिने हाथ में आम्रलुम्बी लिये हैं, यह भुजा भग्न है किन्तु आम्रलुम्बी सुरक्षित है, बायें हाथ से अपने लघु शिशु को बायीं जंघा पर बैठा कर संम्भाले हुए हैं। इनका द्वितीय ज्येष्ठ पुत्र मां के दाहिने ओर समीप खड़ा है। उसके एक हाथ में एक फल है तथा दूसरे हाथ से मां को पकड़े है। आम्रगुच्छकों से ही इनका सुन्दर सर्पफणावली जैसा छत्र दर्शाया गया है। इसके वाह्य भाग में आम्रपत्रों का विशाल प्रभावल है। सुन्दर मुकुट, कर्णावतंस, चार तरह के गलहार आभूषित हैं। चार लड़ी की कटिमेखला से अलंकृत है। अधोवस्त्र की सलवटें कटि से दोनों पैरों तक स्पष्ट हैं। पैरों में पैजनियां हैं। परिकर में दोनों ओर ऊपर-नीचे दो-दो कायोत्सर्गस्थ दिगम्बर तीर्थंकर प्रतिमाएं हैं। चार जिन प्रतिमाएं होने से इस निर्मिति को चतुःतीर्थी प्रतिमा भी कहा जाता है। यह जानकारी डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, रामगंज, जिंसी, इन्दौर द्वारा प्रेषित की गई है।

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