एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट से विश्व समुदाय में भारत की थू-थू!

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट से विश्व समुदाय में भारत की थू-थू!

एमनेस्टी रिपोर्ट से भारत की थू-थू! मोदी राज में इजरायल को हथियार सप्लाई का खुलासा

आलेख : संजय पराते

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संघ-संचालित भाजपा के मोदी राज में भारत सरकार ने आजादी के बाद से अपनाई गई सर्वसम्मत स्वतंत्र विदेश नीति को जिस तरह तिलांजलि दी है, उसके कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सिवा बदनामी के उसे कुछ नहीं मिला है। नतीजन, विश्व समुदाय के बीच भारत की साख गिरी है और उसकी विश्वसनीयता कमजोर हुई है।

फिलिस्तीन के मामले में मोदी राज का दोमुंहापन साफ हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर सहित 2014 के पहले हमारा रुख यही था कि फिलिस्तीन की भूमि पर इजरायल ने कब्जा करके रखा हुआ है, इसलिए दो-राज्य के समाधान और पवित्र येरूशलम को फिलिस्तीन को सौंपे जाने के साथ फिलिस्तीन को आजाद किया जाना चाहिए। आजादी के बाद और मोदी राज से पहले तक हम इसी नीति पर चलते रहे हैं। हमारी यह नीति उस भारतीय राष्ट्रवाद की उपज थी, जो धर्मनिरपेक्षता और उपनिवेशवाद के प्रति वचनबद्ध थी। गुटनिरपेक्षता की नीति ने इसे और मजबूती दी थी। इसी नीति के कारण हमने दक्षिण अफ्रीका में चल रहे जन संघर्षों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की थी और वहां औपनिवेशिक वर्चस्व का विरोध किया था। यही कारण है कि हमारी सहानुभूति कभी भी इजरायल के साथ नहीं रही, जिसने साम्राज्यवादी अमेरिका के साथ मिलकर आक्रामक विस्तारवादी रवैया अपनाया हुआ है। भले ही हमने इजरायल के अस्तित्व को 1950 में मान्यता दे दी थी, लेकिन यह मान्यता फिलिस्तीन जनता के विनाश की कीमत पर नहीं था और फिलिस्तीन जनता के आत्मनिर्णय और उसकी स्वतंत्रता का भारत हमेशा पक्षधर रहा। 2014 से पहले तक हमने इजरायल के साथ एक सचेत दूरी बनाकर रखी थी, उसके साथ कूटनीतिक संबंधों को कायम रखते हुए भी। फिलिस्तीन पर किसी भी रूप में इजरायली हमले का, उन्हें अपनी मातृभूमि से भगाए जाने का भारत ने कभी समर्थन नहीं किया था।

लेकिन मोदी राज के नए भारत में ये सब बातें पुराने जमाने की हो गई हैं। अब नेतन्याहू जनाब मोदी के प्रिय मित्र हैं। हमारी जनता अपनी मातृभूमि का कर्ज भी नहीं चुका पा रही है, ऊपर से उस पर मोदी की कृपा से पितृभूमि का बोझ भी चढ़ गया है। स्वाभाविक है कि इस पितृभूमि की करतूतों पर विश्व समुदाय की ओर से संयुक्त राष्ट्र संघ में उसके खिलाफ जो प्रस्ताव पेश हुए हैं, अब हमारी मातृभूमि को चुप रहना ही था। भारत सरकार ने यही किया है और संयुक्त राष्ट्र संघ में मतदान से कई बार अनुपस्थित होकर पिछले दरवाजे से इजरायल का समर्थन किया है। संघी गिरोह पितृसत्तात्मकता पर विश्वास करता है और भाजपा का आचरण इसी के अनुरूप है।

अब इजरायल के साथ नए रक्षा समझौते हो रहे हैं और इन समझौतों के तहत फिलिस्तीनियों के जनसंहार के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों की आपूर्ति कर रही है, जबकि यूरोप के कई देशों ने गाजा युद्ध के बाद हथियार निर्यात रोक दिए हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट संघी गिरोह के इसी दावे को बेनकाब करती है कि आज भी भारत फिलिस्तीनियों के साथ खड़ा है। 6 जून 2024 को गज़ा के नुसेइरात में एक स्कूल पर इजरायल ने जो हमला किया था और जहां विस्थापित फिलिस्तीनियों ने शरण लिया हुआ था, उसमें 33 फिलिस्तीनी मारे गए थे। यह स्कूल संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा संचालित किया जा रहा था। इस हमले के बाद वहां 'मेड इन इंडिया' वाले मिसाइल के टुकड़े मिले थे। इसी प्रकार, इस वर्ष अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के शुरुआती दिनों में 28 फरवरी 2026 को दक्षिणी ईरान के होर्मोज़्गान प्रांत में मिनाब के एक प्राथमिक स्कूल में हमले में लगभग 175 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें ज्यादातर 7 से 12 साल की स्कूली छात्राएं थीं। खबरें बताती हैं कि इस हमले में भी भारत निर्मित हथियारों का उपयोग किया गया था।इज़राइल को हथियारों की आपूर्ति करने से भारत इंकार करने की भी स्थिति में नहीं है, क्योंकि मई 2024 में चेन्नई से इजराइल के लिए 27 टन विस्फोटक ले जा रहे मेरिआने डानिका नामक एक जहाज को स्पेन ने अपने बंदरगाह में प्रवेश करने से रोक दिया था, क्योंकि स्पेन और कनाडा जैसे देशों ने भी, इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों के जनसंहार के कारण, उसको हथियारों की आपूर्ति पर रोक लगा रखी है। इससे पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की थू-थू ही हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर 2023 से नवंबर 2025 की अवधि के 26 माह में ही भारत से इजरायल को 2,596 शिपमेंट भेजे गए हैं, यानी हर दिन औसतन 3-4 शिपमेंट। इसके जरिए लाखों की संख्या में हथियारों के पुर्जे, गोला-बारूद के कंपोनेंट्स, सैन्य वाहनों के पुर्जे आदि निर्यात किए गए हैं। ये सामान मुख्य रूप से इज़राइली कंपनियों – एल्बिट सिस्टम्स, रफाएल, और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज को भेजे गए हैं, जो सीधे इज़राइली सेना को सैन्य आपूर्ति करती हैं। ये आपूर्ति म्युनिशंस इंडिया लिमिटेड, प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स, कल्याणी, अदानी-इजरायल ज्वाइंट वेंचर  आदि कंपनियों द्वारा की गई हैं। साफ है कि भारत की सरकारी और निजी दोनों तरह की कंपनियां इजराइल को हथियारों की आपूर्ति कर रही है और इसमें खास तौर से अडानी जैसे दरबारी पूंजीपति भारी-भरकम मुनाफा कमा रहे हैं। सभी जानते हैं कि मोदी सरकार के सत्ता में बने रहने का मुख्य मकसद ही अडानी के तिजोरी की बरकत करना है।  

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने फिलिस्तीन में जारी जनसंहार को रोकने और नेतन्याहू को उसके युद्ध अपराधों के लिए गिरफ्तार करने के आदेश दिए हैं। इसी समय भारत का इजरायल को हथियारों की आपूर्ति करना नैतिक और कानूनी, दोनों नजरियों से गलत है। जबकि मोदी सरकार ने यह दावा किया है कि इजरायल के साथ भारत के संबंध पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप है, भारत सरकार का यह दावा इसलिए गलत है कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ के जनसंहार संबंधी कन्वेंशन के प्रावधानों से बंधी हुई है। इस कन्वेंशन के अनुसार, भारत पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह जनसंहार संबंधी कृत्यों को न सिर्फ रोकें, बल्कि ऐसा करने वाले देशों को दंडित भी करें। लेकिन इजरायल के मामले में तो ठीक उल्टा ही हो रहा है, जिसकी फिलिस्तीनियों के जनसंहार में इजरायल के साथ सीधी मिलीभगत है। इसलिए, फिलिस्तीन में जारी जनसंहार में और युद्ध-अपराध में भारत और इजरायल, दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं।

अमेरिका की शह पर इज़राइल की हिमाकत अब इतनी बढ़ गई है कि वह अब "दो राज्य" वाले समाधान से ही पूरी तरह मुकर गया है और पूरे गज़ा को ही अपना उपनिवेश बनाना चाहता है। इजराइल का यह रुख मोदी सरकार के इस अधिकृत रुख के भी खिलाफ है कि भारत "दो राज्य" वाले समाधान के पक्ष में है। लेकिन मोदी सरकार को इसकी भी परवाह नहीं है, क्योंकि अब वह ऐसा 'गजदंत' बन गई है, जो दिखाने और खाने के लिए अलग-अलग होती है। घोषित नीतियों और जमीनी व्यवहार में यह अंतर इसलिए है कि हिंदुत्व और यहूदीवाद के बीच के संबंध राष्ट्रीय हितों और राष्ट्राभिमान से ऊपर परिभाषित किए जा रहे हैं। संघी राष्ट्रवाद अमेरिका के दुमछल्ला अमीर शेखों को तो गले लगा सकता है, उत्पीड़ित फिलिस्तीनियों के आंसू नहीं पोंछ सकता।

एम्नेस्टी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी शह से इजराइल द्वारा गजा में जारी जनसंहार में अभी तक 73000 से ज्यादा लोगों की हत्या की जा चुकी हैं और 1,73,500 से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं। इन हताहतों में अधिकांश बच्चे, बूढ़े और महिलाएं हैं। विश्व समुदाय की नजरों में, मोदी सरकार ने भारत को भी युद्ध-अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। फिलहाल तो मोदी सरकार ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस रिपोर्ट पर पूरी तरह से चुप्पी साध ली है और इससे उठे सवालों पर कुछ भी कहने से कतरा रहा है। लेकिन अपनी करतूतों के बावजूद वह फिलिस्तीन के पुनर्निर्माण के लिए मानवीय सहायता का दावा कर रही है, तो यह पाखंड की हद है!!

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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