अनिल पहलवान उर्फ गंजा का अपराध से जुड़ा इतिहास,

अनिल लीला पहलवान उर्फ गंजा है. बहादुरगढ़ जिला झज्जर हरियाणा का रहने वाला है. अनिल पर दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस नेता, रोहतक पुलिस इंस्पेक्टर समेत कई लोगों की हत्या और अपहरण जैसे कई संगीन मुकदमे दर्ज है
अनिल पहलवान और बिक्का बालू कांड का पूरा सच
चंडीगढ़ /03 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
हरियाणा के बहादुरगढ़ और दिल्ली-एनसीआर के अपराध जगत में अनिल पहलवान उर्फ अनिल लीला या अनिल गंजा का नाम लंबे समय तक चर्चा में रहा। उसका नाम हत्या, अपहरण, फिरौती और रंगदारी जैसे कई गंभीर मामलों से जोड़ा गया।
अनिल पहलवान मूल रूप से बहादुरगढ़ के नूना माजरा गांव का रहने वाला बताया गया है। पुलिस रिकॉर्ड और पुराने समाचारों के मुताबिक उसके खिलाफ दिल्ली और हरियाणा में कई आपराधिक मामले दर्ज थे।
उसकी कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि एक समय वह खेल से जुड़ा हुआ था। उपलब्ध रिपोर्टों में उसे वेटलिफ्टिंग में राष्ट्रीय स्तर पर हिस्सा लेने वाला और हरियाणा स्तर का चैंपियन बताया गया है।
लेकिन समय के साथ उसका नाम खेल के बजाय अपराध की दुनिया से जुड़ता चला गया। कार लूट से शुरू हुई गतिविधियां कथित तौर पर आगे चलकर अपहरण, फिरौती और रंगदारी तक पहुंचीं।
शुरुआत कहां से हुई
पुरानी पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अनिल पहलवान ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी। इसके बाद उसने अपने रिश्ते के भाई बबलू के साथ जिम शुरू किया था।
यहीं से उसके जीवन का रास्ता धीरे-धीरे बदलने की बात सामने आती है। पुलिस रिकॉर्ड में उसके खिलाफ बाद के वर्षों में कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हुए।
साल 2011 उसके आपराधिक इतिहास में खास तौर पर सामने आता है। रिपोर्टों के अनुसार इसी दौरान दिल्ली और हरियाणा में अपहरण की कई वारदातों में उसका नाम आया।
एक मामले में दिल्ली के रामलाल आनंद कॉलेज के सामने से एक छात्र को उसकी कार सहित अगवा करने का आरोप लगा। इस मामले में बड़ी रकम की फिरौती मांगे जाने की बात रिपोर्टों में दर्ज है।
इसी दौर में बहादुरगढ़ की पीडीएम यूनिवर्सिटी से जुड़े एक लेक्चरर के अपहरण का मामला भी सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार इस मामले में 20 लाख रुपये की फिरौती वसूली गई थी।
इसके अलावा दिल्ली के प्रशांत विहार इलाके से एक कपड़ा कारोबारी के बेटे के अपहरण का मामला भी उसके गिरोह से जोड़ा गया। इस मामले में भी बड़ी फिरौती की बात सामने आई थी।
फिरौती से बढ़ी अपराध की पहचान
पुलिस के मुताबिक अनिल पहलवान और उसके साथियों की गतिविधियां केवल अपहरण तक सीमित नहीं रहीं। बाद में दिल्ली-एनसीआर में कथित तौर पर रंगदारी और प्रोटेक्शन मनी से जुड़े मामलों में भी उसका नाम सामने आया।
उसके खिलाफ जमीन और संपत्ति से जुड़े विवादों में दखल देने के आरोप भी रिपोर्टों में बताए गए हैं। यही वह दौर था जब उसका नाम स्थानीय स्तर के अपराध से निकलकर बड़े अपराध नेटवर्क से जोड़ा जाने लगा।
बहादुरगढ़ और रोहतक के आसपास की आपराधिक घटनाओं में उसका नाम लगातार सामने आने लगा। पुलिस की नजर में वह धीरे-धीरे एक बड़ा अपराधी बन चुका था।
पुरानी रिपोर्टों के अनुसार उसके खिलाफ दिल्ली, गुरुग्राम, रोहतक और बहादुरगढ़ में कुल 14 मामले दर्ज होने की जानकारी पुलिस ने दी थी। इन मामलों में हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और फिरौती जैसे गंभीर आरोप शामिल बताए गए थे।
रामकिशन दहिया हत्याकांड से जुड़ी कहानी
अनिल पहलवान की कहानी में रोहतक के सेवानिवृत्त पुलिस इंस्पेक्टर रामकिशन दहिया की हत्या का मामला सबसे गंभीर घटनाओं में गिना जाता है।
पुरानी पुलिस रिपोर्टों के अनुसार साल 2011 में रामकिशन दहिया के साथ मुठभेड़ में अनिल के साथी मनोज मोरखेड़ी के रिश्तेदार की मौत हुई थी।
इसके बाद पुलिस ने दावा किया कि इस घटना को लेकर बदले की भावना पैदा हुई। साल 2013 में रोहतक शहर में सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर रामकिशन दहिया की हत्या कर दी गई।
इस हत्या में अनिल पहलवान और मनोज मोरखेड़ी का नाम सामने आया। बाद की रिपोर्टों में पुलिस ने इसे पुरानी दुश्मनी और मुठभेड़ का बदला बताया।
यह मामला अनिल पहलवान के आपराधिक इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बन गया। इसके बाद पुलिस और अपराध जगत दोनों में उसका नाम और ज्यादा चर्चा में आया।
गांव की रंजिश भी बनी वजह
अनिल पहलवान का नाम केवल बड़े शहरों की वारदातों तक सीमित नहीं था। उसके अपने गांव नूना माजरा में भी पुरानी रंजिश से जुड़े हत्या के मामलों में उसका नाम सामने आया।
रिपोर्टों के मुताबिक गांव के सरपंच देवेंद्र दलाल की हत्या के मामले में भी अनिल और उसके साथियों पर आरोप लगा था।
इसके अलावा सतीश उर्फ काणा की हत्या में भी उसका नाम जोड़ा गया। यह मामला भी गांव की पुरानी रंजिश से जुड़ा बताया गया था।
इस तरह उसके खिलाफ दर्ज मामलों में व्यक्तिगत दुश्मनी, आपराधिक नेटवर्क और कथित रंगदारी जैसे अलग-अलग पहलू सामने आते हैं।
हालांकि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप और अदालत में साबित अपराध को अलग-अलग समझना जरूरी है। पुलिस रिकॉर्ड में नाम आना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं होता।
2014 में हुई गिरफ्तारी
अनिल पहलवान को साल 2014 में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया था। उस समय वह दिल्ली और हरियाणा में वांछित था।
नवभारत टाइम्स की पुरानी रिपोर्ट के अनुसार उस पर दिल्ली पुलिस की ओर से एक लाख रुपये और हरियाणा में 50 हजार रुपये का इनाम घोषित था।
गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने दावा किया था कि उसने टीम पर गोली चलाने की कोशिश की। उसे दिल्ली के द्वारका इलाके से गिरफ्तार किए जाने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई थी।
उस समय पुलिस ने उसके आपराधिक इतिहास को देखते हुए उसे बेहद गंभीर आरोपी बताया था। उसके खिलाफ हत्या और अपहरण समेत कई मामले बताए गए थे।
दिलचस्प बात यह थी कि पुलिस रिकॉर्ड में आने वाले इस व्यक्ति की शुरुआत खेल और जिम से हुई थी। लेकिन बाद में वही नाम दिल्ली-एनसीआर के अपराध मामलों में लगातार सामने आने लगा।
जेल से बाहर आया तो फिर रंगदारी का आरोप
गिरफ्तारी के बाद अनिल पहलवान जेल गया। लेकिन जेल से बाहर आने के बाद भी उसका नाम एक नए मामले में सामने आया।
रिपोर्टों के अनुसार साल 2017 में पैरोल पर बाहर आने के बाद उस पर बहादुरगढ़ के एक डिस्को संचालक से 50 लाख रुपये की रंगदारी मांगने का आरोप लगा।
इस मामले के बाद उसे दोबारा गिरफ्तार किए जाने की जानकारी सामने आई। पुलिस के लिए यह संकेत था कि जेल से बाहर आने के बाद भी उसके खिलाफ आपराधिक गतिविधियों के आरोप खत्म नहीं हुए थे।
इसके बाद वह दोबारा जेल चला गया। लेकिन उसकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
2018 में पैरोल और फिर फरारी
साल 2018 के अंत में अनिल पहलवान फिर पैरोल पर बाहर आया। इस बार वह जेल वापस नहीं लौटा और फरार हो गया।
पुलिस के मुताबिक वह अपनी पहचान छिपाकर अलग-अलग राज्यों में घूमता रहा। उसके संभावित ठिकानों की तलाश दिल्ली और हरियाणा से बाहर भी की गई।
पुरानी रिपोर्टों में नेपाल, सिक्किम, असम, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे स्थानों का उल्लेख मिलता है।
फरारी के दौरान पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसका नया ठिकाना पता करना था। वह अपनी पहचान बदलकर रहने की कोशिश करता रहा।
इसी वजह से उसकी गिरफ्तारी में काफी समय लगा। आखिरकार उसकी तलाश उत्तराखंड तक पहुंची।
देहरादून में बदली पहचान
फरवरी 2020 में देहरादून पुलिस ने अनिल पहलवान को गिरफ्तार करने का दावा किया।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार वह करीब एक साल से देहरादून के दून विहार इलाके में पहचान छिपाकर रह रहा था। पुलिस ने उसके पास से एक पिस्टल और कार बरामद किए जाने की बात कही थी।
पुलिस के मुताबिक वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ वहां रह रहा था। उसकी पहचान का पता लगाने के लिए पुलिस ने काफी समय तक स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाई।
रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने उसकी पत्नी से जुड़े सुरागों के आधार पर उसके ठिकाने तक पहुंचने की कार्रवाई की।
पुलिस को आशंका थी कि गिरफ्तारी के दौरान वह हथियार का इस्तेमाल कर सकता है। इसलिए इलाके में विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।
इसके बाद उसे देहरादून से गिरफ्तार कर लिया गया और आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू की गई।
2022 में मकान पर प्रशासन की कार्रवाई
अनिल पहलवान का नाम फिर साल 2022 में खबरों में आया। इस बार वजह कोई नई आपराधिक वारदात नहीं बल्कि उसके मकान पर प्रशासन की कार्रवाई थी।
बहादुरगढ़ के नूना माजरा गांव में बने उसके मकान को जिला प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में गिराया गया।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन ने बताया था कि मकान पंचायत की जमीन पर कब्जा कर बनाया गया था। रिपोर्ट में मकान का क्षेत्रफल 567 गज बताया गया था।
कार्रवाई के दौरान ड्यूटी मजिस्ट्रेट, तहसीलदार, पुलिस अधिकारी, बीडीपीओ, पटवारी और पुलिस बल मौजूद था।
प्रशासन की कार्रवाई को अवैध कब्जे और निर्माण के खिलाफ कदम बताया गया। यह घटना इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि जिस व्यक्ति के खिलाफ पहले से कई गंभीर मामले दर्ज थे, उसके खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की गई।
अब बात बिक्का बालू कांड की
अनिल पहलवान के साथ “बिक्का बालू कांड” का नाम भी कई स्थानीय चर्चाओं में सुनने को मिलता है। लेकिन उपलब्ध प्रमुख समाचार स्रोतों में इस नाम से कोई स्पष्ट और प्रमाणित केस रिकॉर्ड मुझे नहीं मिला।
वेब पर “बिक्का” और “बालू” नाम से जो रिपोर्ट मिली, वह एक अलग घटना की है। साल 2021 में कैथल जिले के गांव बालू निवासी 26 वर्षीय बिक्का की बलियाला हेड के पास आत्महत्या की खबर प्रकाशित हुई थी।
उस रिपोर्ट में पुलिस ने मामले को इत्तफाकिया कार्रवाई बताया था और परिजनों के हवाले से मानसिक परेशानी की बात कही गई थी। उस घटना का अनिल पहलवान से कोई संबंध रिपोर्ट में नहीं बताया गया है।
इसलिए उस घटना को अनिल पहलवान से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
यही वह जगह है जहां सोशल मीडिया, स्थानीय चर्चाओं और पुराने अपराध मामलों की जानकारी को अलग-अलग करना जरूरी हो जाता है।
क्या बिक्का बालू कांड और अनिल पहलवान का सीधा संबंध था?
अभी उपलब्ध विश्वसनीय ऑनलाइन स्रोतों के आधार पर इसका सीधा प्रमाण नहीं मिलता।
अनिल पहलवान से जुड़े मामलों में पुलिस और मीडिया ने कई नाम और घटनाएं दर्ज की हैं। लेकिन “बिक्का बालू कांड” नाम से ऐसा कोई प्रमाणित विवरण नहीं मिला जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया हो कि अनिल पहलवान इस घटना का आरोपी था।
इसलिए इस मामले में बिना एफआईआर, पुलिस रिकॉर्ड, कोर्ट दस्तावेज या विश्वसनीय पुराने समाचार के कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा।
किसी अपराध की कहानी को रोचक बनाने के लिए उसमें अपुष्ट नाम और घटनाएं जोड़ना पत्रकारिता के लिहाज से भी सही नहीं है।
अगर स्थानीय स्तर पर “बिक्का बालू कांड” किसी दूसरी घटना के लिए इस्तेमाल होता है, तो उसकी पहचान मूल तारीख, गांव, थाना, पीड़ित या केस नंबर से ही ठीक तरह से हो सकती है।
अनिल पहलवान की कहानी से क्या सामने आता है
अनिल पहलवान की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसकी पहचान शुरुआत में खेल से जुड़ी थी, लेकिन बाद में उसका नाम गंभीर आपराधिक मामलों में सामने आने लगा।
कार लूट और कथित अपहरण से शुरू हुई गतिविधियों का जिक्र पुलिस रिकॉर्ड में आगे चलकर हत्या और रंगदारी जैसे गंभीर मामलों के साथ मिलता है।
2014 की गिरफ्तारी के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ। पैरोल पर बाहर आने के बाद फिर रंगदारी के आरोप सामने आए और 2018 में वह फरार हो गया।
करीब एक साल तक देहरादून में पहचान छिपाकर रहने के बाद फरवरी 2020 में उसकी गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 2022 में नूना माजरा स्थित उसके मकान पर प्रशासन की कार्रवाई हुई।
अपराध की दुनिया में नाम से ज्यादा जरूरी रिकॉर्ड
अनिल पहलवान से जुड़ी कहानी में एक बात साफ दिखाई देती है कि अपराध के मामलों में केवल चर्चित नामों के आधार पर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता।
किसी व्यक्ति के खिलाफ कितने मामले दर्ज हैं, उनमें क्या आरोप हैं, किन मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई, किस मामले में अदालत ने क्या फैसला दिया और कौन से मामले अभी लंबित हैं—इन सभी बातों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
इसी तरह “बिक्का बालू कांड” जैसे स्थानीय नामों को भी आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलाना जरूरी है।
आज सोशल मीडिया पर पुरानी घटनाओं के नाम बदलकर या अलग-अलग मामलों को जोड़कर कई तरह की कहानियां सामने आती हैं। ऐसे में पाठक के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन सी बात पुलिस रिकॉर्ड से आती है और कौन सी केवल स्थानीय चर्चा है।
पूरी तस्वीर अभी कहां अधूरी है
अनिल पहलवान के बारे में पुराने समाचार स्रोतों से उसका आपराधिक इतिहास, गिरफ्तारी, फरारी और प्रशासनिक कार्रवाई का काफी हिस्सा सामने आता है।
लेकिन “बिक्का बालू कांड” की वास्तविक पहचान के लिए अभी एक भरोसेमंद प्राथमिक स्रोत की जरूरत है।
अगर यह किसी पुराने हत्या, गैंगवार, अपहरण या रंजिश का स्थानीय नाम है तो उसके बारे में थाना, वर्ष, गांव या पीड़ित का नाम मिलना जरूरी होगा।
उस जानकारी के बाद ही दोनों घटनाओं के बीच संबंध की पुष्टि की जा सकती है।
इसलिए फिलहाल इतना कहना ज्यादा सही है कि अनिल पहलवान का आपराधिक इतिहास दस्तावेजों और पुराने समाचारों में दर्ज है, लेकिन बिक्का बालू कांड के साथ उसका सीधा संबंध उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों से साबित नहीं होता।
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
अनिल पहलवान उर्फ गंजा की कहानी बहादुरगढ़, रोहतक और दिल्ली-एनसीआर में अपराध के बदलते स्वरूप को समझने का एक उदाहरण है।
वेटलिफ्टिंग से जुड़े एक व्यक्ति का नाम बाद में अपहरण, फिरौती, हत्या और रंगदारी के मामलों में सामने आया। पुलिस ने उसे कई बार गिरफ्तार किया और उसके फरार होने के बाद दूसरे राज्यों तक तलाश की।
2020 में देहरादून से गिरफ्तारी और 2022 में नूना माजरा स्थित मकान पर प्रशासन की कार्रवाई इस कहानी के प्रमुख पड़ाव रहे।
लेकिन “बिक्का बालू कांड” को इस कहानी का हिस्सा बताते समय सावधानी जरूरी है। उपलब्ध ऑनलाइन रिकॉर्ड इस संबंध की पुष्टि नहीं करते।
इसलिए इस कांड का “पूरा सच” बताने के लिए केवल चर्चाओं पर नहीं बल्कि एफआईआर, अदालत के दस्तावेज, पुलिस रिकॉर्ड और उस समय की स्थानीय खबरों को आधार बनाना जरूरी होगा।
यही फर्क एक सनसनीखेज कहानी और तथ्य आधारित पत्रकारिता के बीच होता है।