20 दिन में पूरी तरह बदल गया हरियाणा का चुनावी नजारा, नहीं चल पाया 75 पार का नारा, 

20 दिन में पूरी तरह बदल गया हरियाणा का चुनावी नजारा, नहीं चल पाया 75 पार का नारा,

= राजकुमार अग्रवाल
चंडीगढ़। हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर जारी महाभारत में जंग का नजारा पिछले 20 दिन के दौरान पूरी तरह से बदल गया है।
1 अक्टूबर को प्रदेश में पूरी तरह से भाजपा का पलड़ा भारी नजर आ रहा था और “अबकी बार-75 पार” का नारा साकार होता दिख रहा था लेकिन उसके बाद एक-एक दिन करके माहौल में बदलाव आता चला गया और चुनावी जंग का पासा पलटता गया।
मिशन 75 अचानक ही चमक होने लगा और 20 अक्टूबर आते आते “75 पार” की गाड़ी आधे रास्ते में ही पंक्चर हो कर खड़ी हो गई। सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिए भाजपा को अब किसी दूसरे ड्राइवर को गाड़ी सौंपनी पड़ेगी।
कांग्रेस ने मोदी की मार से बचने के लिए समझदारी की रणनीति अपनाते हुए चुपचाप चुनावी जंग में बड़ी सफलता का सफर तय किया। कांग्रेस और बीजेपी के दमखम के बीच में अचानक ही दुष्यंत चौटाला की जेजेपी चकाचौंध करने लगी और उसकी करंट मारती रैलियों ने पूरे चुनाव का नजारा बदल कर रख दिया।
चुनावी बिसात के पलटने के कई कारण रहे।
भाजपा हुई ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार

लोकसभा चुनाव में सभी 10 सीटें जीतकर इतिहास रचने वाली भाजपा ओवरकॉन्फिडेंस का शिकार हो गई और “75 पार” के नारे के साथ जोर-शोर से चुनावी जंग में उतर गई।
मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में नया इतिहास रचने की हसरत में जन आशीर्वाद यात्रा के जरिए पूरे प्रदेश का सफर तय किया लेकिन यह “जन आशीर्वाद यात्रा” कब “सत्यानाश यात्रा” में तब्दील हो गई पता ही नहीं चला।
प्रचंड बहुमत के अहंकार में आकर भाजपा कई जीतने वाले चेहरों के टिकट काटकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार गई। जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान टिकटार्थियों में हुई तनातनी का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा जिसके चलते टिकट हासिल करने वाले नेताओं को साथी नेताओं का सहयोग और समर्थन नहीं मिला जिसके चलते चुनाव प्रचार अभियान में भाजपा का ग्राफ उठने की बजाय नीचे बैठ गया।
टिकट कटने वाले नेताओं ने खुली बगावत या भितरघात करते हुए भाजपा के प्रति बने माहौल का बंटाधार कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की रैली भी भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में नाकाम रही। मोदी और अमित शाह की रैलियों के फीका रहने के चलते भाजपा का मिशन 75 अभियान खतरे में पड़ गया है। भाजपा के लिए अब बहुमत हासिल होने का रास्ता बंद होता दिख रहा है। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट भी यह इशारा कर रही हैं कि मामला गड़बड़ में है।

कांग्रेस ने खुद किया अपना बंटाधार

चुनावी महाभारत में कांग्रेस ने अपना बंटाधार खुद ही करने का काम किया। कांग्रेस ने जिताऊ चेहरों के टिकट काटकर सत्ता को ठोकर मार दी। भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी शैलजा ने दमदार चेहरों को टिकट देने की बजाय अपने मनमर्जी के लोगों को टिकट देकर पार्टी को पहले ही झटके में सत्ता की दौड़ से बाहर कर दिया। अगर जीत के दावेदार नेताओं को टिकट दी जाती तो कांग्रेस अपने बलबूते पर भी बहुमत हासिल कर जाती। कांग्रेस से बागी हुए कई लोग जीत की मजबूत ताल ठोंक रहे हैं।पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर जैसे मजबूत नेता का पार्टी छोड़ना और कई मजबूत चेहरों का बगावत करना भी कांग्रेस के समीकरणों को खराब करने का काम कर गया।
बड़ी गलतियों के बावजूद कांग्रेस मजबूत उपस्थिति इसलिए दर्ज करा रही है कि कांग्रेस ने राहुल गांधी को चुनावी जंग से दूर रख कर मुकाबले को मोदी और राहुल गांधी में नहीं बदलने दिया।

जेजेपी ने किया सबको हैरान

चुनाव प्रचार के दौरान जननायक जनता पार्टी ने सबको हैरानी में डाल दिया। 1 अक्टूबर को जीरो सीट पर नजर आने वाले जेजेपी 20 अक्टूबर को सत्ता की प्रबल दावेदारी पेश कर रही है।
दुष्यंत चौटाला की अगुवाई में जेजेपी ने जनता का सबसे अधिक समर्थन हासिल करने में सफलता हासिल की जेजेपी की रैलियों में उमड़ी भारी भीड़ और दुष्यंत की लोकप्रियता ने पूरे चुनावी माहौल को बदल कर रख दिया‌। जेजेपी की उठती हुई आंधी ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही परेशानी में डाल दिया।
जेजेपी के डर के कारण ही पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा को यह कहना पड़ा कि वोट कांग्रेस को नहीं देना है तो बीजेपी को वोट डाल दें।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी जेजेपी का चुनावी रैलियों में जिक्रा करके यह इशारा कर दिया कि भाजपा उसे अपने लिए खतरा मान रही है।
जेजेपी का ग्राफ ऊपर उठाने में दुष्यंत चौटाला के साथ साथ पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर का भी बड़ा योगदान रहा। अशोक तंवर का समर्थन मिलने के चलते प्रदेश के 26 लाख एससी वोटरों में जेजेपी के प्रति सकारात्मक संकेत गया है। ब्राह्मण नेताओं रामकुमार गौतम, शिवशंकर भारद्वाज, बृज शर्मा के अलावा पूर्व मंत्री मांगेराम गुप्ता और सतपाल सांगवान जैसे बड़े चेहरों के जेजेपी के चुनावी सिपहसालार बनने के कारण जीजेपी चुनावी महाभारत में मजबूत विकल्प के रूप में उभर गई है। एक दर्जन बड़े चेहरों के जेजेपी के टिकट पर चुनाव होने के कारण दुष्यंत चौटाला अपनी पार्टी को भाजपा और कांग्रेस के बराबर खड़ी करने में सफल रहे।
बात यह है कि प्रदेश के चुनावी इतिहास में पहली बार 3 सप्ताह के अंदर पूरा चुनावी माहौल पलट गया है। भाजपा के लिए “75 पार” का नारा हासिल करना तो दूर बहुमत पाना भी बड़ी चुनौती हो गया है।
लोकसभा चुनाव में मिली बंपर सफलता को भाजपा हजम नहीं कर पाई और उसी गलतफहमी के माहौल में उसने विधानसभा चुनाव की डलय रणनीति तैयार की। दलबदलुओं की फौज तैयार करने और कई सीटों पर गलत प्रत्याशियों को उतारने के कारण भाजपा का बना बनाया खेल खराब हो गया।
मोदी और अमित शाह का दमखम फेल होने के कारण भाजपा के लिए दोबारा सत्ता का सरताज बनने के दावों पर सवालिया निशान खड़ा हो गया है।
कांग्रेस ने आत्मघाती गलती करते हुए जितने वाले नेताओं की टिकट काटकर दरवाजे पर खड़ी सत्ता को ठोकर मार दी है। इसका खामियाजा उसे चुनावी महाभारत में भुगतना पड़ रहा है।
दुष्यंत चौटाला की अगवाई में जननायक जनता पार्टी ने सबसे अधिक चर्चा हासिल की है और सत्ता ताले की चाबी उसी के हाथ में नजर आ रही है। जेजेपी के बिना सरकार नहीं बन पाएगी।कांग्रेस और भाजपा को एक दूसरे को सत्ता से बाहर रखने के लिए दुष्यंत चौटाला को मुख्यमंत्री बनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

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