गिरगिट की तरह रंग बदलती राजनैतिक पार्टियों से कार्यकर्ताओं का होता मोहभंग….. कार्यकर्ता ! नाम तो सुना ही होगा.

गिरगिट की तरह रंग बदलती राजनैतिक पार्टियों से कार्यकर्ताओं का होता मोहभंग…..

कार्यकर्ता ! नाम तो सुना ही होगा….

प्रीति दलाल

कार्यकर्ता, नाम तो सुना ही होगा। ये हर पार्टी में पाए जाते हैं लेकिन इनकी बात अक्सर चुनावों में ही होती है। इन्हें भक्त, अंधभक्त, सपोर्टर, कार्यकर्ता और भी न जाने कितने ही नामों और विभूतियों से विभूषित किया जाता है। हो भी क्यों ना राजनैतिक पार्टियों का रास्ता सत्ता की ओर कार्यकर्ताओं के सहारे ही होकर जाता है और अगर कार्यकर्ता ही नहीं हो तो राजनीतिक पार्टियों का वजूद संभव हो ही नहीं सकता। कार्यकर्ता नेता बनने का सपना तो देखते हैं लेकिन चुनावों के दौरान दल बदलू नेता इन कार्यकर्ताओं का नेता बनने का सपना हर बार चकनाचूर कर देते हैं और ये फिर से अपमान का कड़वा घूंट पीकर नेताओं के पीछे जयकारे लगाने में व्यस्त हो जाते हैं। नेता कार्यकर्ताओं के बिना नेता हो ही नहीं सकता, यह कार्यकर्ता ही होते हैं। जो जयकारे लगाकर, चाटुकारिता के कसीदे पढ़कर उन्हें नेता होने का अहसास करवाते हैं। जो घर-घर घूम कर नेताओं का प्रचार कर उन्हें नेता बनाते हैं। जो चुनावी दफ्तरों में दरी बिछाने से लेकर, पोस्टर बैनर लगाने, सोशल मीडिया पर जमकर प्रचार करने, रैलियों में अपने पैसे खर्च कर भीड़ जुटाने और अंत में नेताओं से जूत खाने का कार्य किसी से छिपा नहीं है लेकिन अब देश की सभी राजनैतिक पार्टियों से कार्यकर्ताओं का होता मोहभंग किसी से छिपा नहीं है। सत्ता में आते ही नेता सबसे पहला काम उम्मीदों के मीनार सजाए बैठे कार्यकर्ताओं को ही ठिकाने लगाना शुरु करते हैं। पुराने लोग कहते हैं कि पहले के नेता अब के नेताओं की तुलना में जुबान के पक्के होते थे लेकिन अब के नेता हैं कि सत्ता मिलते ही कार्यकर्ताओं को झिड़कना शुरू कर देते हैं। जिस नेता के लिए कार्यकर्ता अपना तन मन धन सब कुछ लगा देता हो और बदले में उसे इज्जत भी ना मिले। ये किसे गवारा होगा। अब नेताओं का लोभ और लालच ही इतना बढ़ चुका है कि उन्हें जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की सुध लेने भर का भी समय नहीं होता। वर्तमान में बदलते समय के साथ युवा पीढ़ी नेताओं के पीछे घूमने की बजाय खुद को इस काबिल बनाने में लगी है कि उन्हें नेताओं के पीछे चाकरी ना करनी पड़े। जहां पहले नेताओं के पीछे लंबी-लंबी लाइनें लगी होती थी लेकिन अब नेताओं का नाम लेवा कोई-कोई ही बचा है। बदलते समय के साथ और नेताओं का गिरगिट की तरह बदलते रंग को देखकर अब कार्यकर्ता राजनीतिक पार्टियों से दूर हो अपनी रोजी रोटी के जुगाड़ में लगा है। अब कार्यकर्ता भी इस बात को समझ चुके हैं कि नेताओं और सत्ता को उनकी जरुरत केवल और केवल इलेक्शन के पहले चंद महीनों में ही होती है। उसके बाद तो वे सरकारों और नेताओं के लिए किसी खरपतवार के समान हो जाते हैं। जिसे नेता सरकार आते ही उखाड़ कर फेंक देते हैं। इतना तो है कि जिस पार्टी के पास कार्यकर्ताओं की कमी या कार्यकर्ता नहीं है वे सत्ता के सपने जरूर ले सकते हैं लेकिन सत्ता में नहीं आ सकते। खैर जो भी है बदलते समय के साथ-साथ ट्रेंड भी बदलना चाहिए। किसी के पीछे घूम घूम कर उनके जयकारे और उनके नाम की धुन बजाने से अच्छा है कि वह कार्य किया जाए जिसमें वह पारंगत और सक्षम हों। इससे व्यक्ति का जमीर भी बचा रहता है और उसे किसी से झूठी उम्मीदें या आकांक्षाएं भी नहीं रहती। अच्छा है भेड़चाल छोड़कर नेताओं की रैलियों में पहुंचने की बजाए अपना काम किया जाए। अपना व अपने आसपास के लोगों का वोट उसी को दिया जाए जो विकास और अन्य मुद्दों शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पानी की बात करता हो। न कि उसे जो इलेक्शन के दिनों में शराब या अन्य प्रलोभन की वस्तुएं व पैसे बांट कर कुछ लोगों के वोट तो जरूर खरीद लेता है लेकिन बाद में लोगों के काम नहीं करता और ना ही उसे जो धर्म, जाति, वर्ग, क्षेत्र की बात करता हो। दूसरों के सपनों को पूरा करने के लिए सीढ़ी बनने की बजाय खुद के सपनों पर केंद्रण कीजिए तो शायद आप अपने सपनों को साकार कर सकें। गिरगिट की तरह रंग बदलते नेताओं के पीछे भागने की बजाय सही चुनिये और अपने काम में मस्त रहिए। क्यों नेताओं की चाटुकारिता कर इस मूल्यवान जीवन को बर्बाद किया जाए। चाटुकारिता ही करनी है तो बस ऊपर वाले की चाटुकारिता करिए इसके अलावा किसी की नहीं…..

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