कृत्रिम सूर्य के निर्माण में भारतीय उद्यम की ऐतिहासिक दस्तक, बेंगलुरु की कंपनी ने प्लाज्मा का किया निर्माण

कृत्रिम सूर्य के निर्माण में भारतीय उद्यम की ऐतिहासिक दस्तक, बेंगलुरु की कंपनी ने प्लाज्मा का किया निर्माण

मानव सभ्यता का विकास हमेशा ऊर्जा के स्रोतों पर निर्भर रहा है। आग की खोज से लेकर आज के परमाणु युग तक ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। प्रकृति में ऊर्जा का सबसे विशाल और निरंतर स्रोत सूर्य है जो अरबों वर्षों से बिना रुके प्रकाश और ऊष्मा प्रदान कर रहा है। सूर्य की ऊर्जा का रहस्य नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में छिपा है। वैज्ञानिक दशकों से इसे पृथ्वी पर दोहराने का सपना देख रहे हैं ताकि मानव जाति को ऊर्जा का ऐसा स्रोत मिल सके जो कभी समाप्त न हो। इसी सपने को साकार करने की दिशा में भारत ने बहुत बड़ी छलांग लगाई है। यह छलांग केवल सरकारी प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है बल्कि पहली बार भारत की एक निजी कंपनी ने ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है। बेंगलुरु स्थित गहन तकनीकी कंपनी प्रनोस फ्यूजन ने अपने टोकामक संयंत्र प्रज्ञा में प्लाज्मा का निर्माण करके विज्ञान क्षेत्र में नया अध्याय जोड़ा है।

वर्तमान वैश्विक ऊर्जा संकट और नाभिकीय संलयन की आवश्यकता

इस महान उपलब्धि का महत्व समझने के लिए वर्तमान वैश्विक ऊर्जा संकट पर विचार करना आवश्यक है। आज दुनिया में बिजली उत्पादन का अधिकांश हिस्सा कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है। इनके जलने से ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है जिससे जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। विकल्प के रूप में पारंपरिक परमाणु ऊर्जा का उपयोग होता है जो नाभिकीय विखंडन पर आधारित है। इसमें भारी तत्वों को तोड़ा जाता है जिससे ऊर्जा मिलती है लेकिन खतरनाक रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न होता है जिसका सुरक्षित निपटान अत्यंत जटिल है। पवन और सौर ऊर्जा स्वच्छ हैं लेकिन मौसम और दिन रात के चक्र पर निर्भर हैं। ऐसे में नाभिकीय संलयन एकमात्र विकल्प है जो पूर्णतः स्वच्छ, सुरक्षित और असीमित है। इसमें कोई खतरनाक कचरा नहीं निकलता और दुर्घटना की संभावना नहीं होती क्योंकि तकनीकी खराबी आने पर संलयन प्रक्रिया स्वतः रुक जाती है।

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नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया और टोकामक तकनीक

नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में दो हल्के परमाणुओं मुख्य रूप से हाइड्रोजन के समस्थानिकों को अत्यधिक उच्च तापमान पर आपस में जोड़ा जाता है। जब ये परमाणु मिलते हैं तो भारी तत्व बनता है और अपार ऊर्जा मुक्त होती है। लेकिन पृथ्वी पर इसे अंजाम देना अत्यंत कठिन है। सूर्य के केंद्र में भारी गुरुत्वाकर्षण के कारण संलयन आसानी से होता है लेकिन पृथ्वी पर ऐसा करने के लिए हमें 15 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। इतने उच्च तापमान पर कोई भी ठोस पदार्थ पिघल कर वाष्प बन जाएगा। पदार्थ की इस गर्म अवस्था को प्लाज्मा कहा जाता है जो पदार्थ की चौथी अवस्था है। इस अति तप्त प्लाज्मा को किसी सामान्य बर्तन में नहीं रखा जा सकता और यहीं पर टोकामक नामक विशेष तकनीक काम आती है। टोकामक डोनट के आकार की मशीन है जो शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। इसी चुंबकीय क्षेत्र की मदद से अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को हवा में नियंत्रित रखा जाता है ताकि वह मशीन की दीवारों को स्पर्श न करे।

भारत में नाभिकीय संलयन शोध और निजी क्षेत्र की भूमिका

भारत के लिए यह उपलब्धि विशेष है क्योंकि अब तक नाभिकीय संलयन के क्षेत्र में देश का शोध केवल सरकारी संस्थानों के अधीन था। गुजरात के गांधीनगर स्थित प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान दशकों से इस दिशा में काम कर रहा है। वहां आदित्य और उन्नत टोकामक स्थापित किए गए जिन्होंने भारत को वैश्विक पहचान दिलाई। भारत दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय ताप नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर का भागीदार भी है। लेकिन वर्तमान में विज्ञान का स्वरूप बदल रहा है। अब अंतरिक्ष से लेकर परमाणु ऊर्जा तक निजी कंपनियां आगे आ रही हैं। प्रनोस फ्यूजन की सफलता इसी बदलते परिवेश का प्रत्यक्ष प्रमाण है। किसी निजी भारतीय कंपनी द्वारा स्वयं का टोकामक डिजाइन करना, उसे बनाना और सफलतापूर्वक प्लाज्मा उत्पन्न करना दर्शाता है कि भारत में अब नवाचार और तकनीकी क्षमता की कोई कमी नहीं है।

प्रज्ञा टोकामक की विशेषताएं और आगामी परीक्षण योजना

बेंगलुरु की इस कंपनी ने प्रज्ञा टोकामक को केवल 8 महीने में तैयार किया है। यह विश्व रिकॉर्ड जैसी उपलब्धि है क्योंकि ऐसी मशीनों के निर्माण में कई वर्ष लग जाते हैं। प्रज्ञा कम आयाम अनुपात वाला आधुनिक टोकामक है। इसकी मुख्य विशेषताओं में इसका मुख्य अर्धव्यास 0.40 मीटर और छोटा अर्धव्यास 0.18 मीटर है। यह 0.1 टेस्ला का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है और इसमें 20 से 25 किलोएम्पीयर तक प्लाज्मा करंट उत्पन्न करने की क्षमता है। फिलहाल प्रज्ञा का उद्देश्य बिजली उत्पादन करना नहीं है बल्कि यह एक उन्नत परीक्षण मंच है। इसका उपयोग यह समझने के लिए होगा कि अत्यधिक तापमान पर प्लाज्मा का व्यवहार कैसा होता है और उसे कैसे स्थिर रखा जा सकता है। यह मशीन उच्च तापमान वाले अतिचालक चुंबकों का परीक्षण करने के भी काम आएगी। भविष्य के ऊर्जा संयंत्रों को स्वचालित बनाने के लिए इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन अधिगम जैसी आधुनिक तकनीकों का गहन परीक्षण किया जाएगा। आने वाले वर्षों में इस मशीन पर हर साल लगभग 3000 बार प्लाज्मा परीक्षण किए जाएंगे।

भविष्य के लक्ष्य और प्राणिक वाणिज्यिक संलयन रिएक्टर

प्रनोस फ्यूजन की यह सफलता गहन तकनीकी आधारित नए उद्यमों के लिए पूंजीगत निवेश के द्वार खोल रही है। हाल ही में इस कंपनी ने निवेशकों से 6.8 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता प्राप्त की है। यह धनराशि अनुसंधान और विकास कार्यों को नई गति प्रदान करेगी। भारत सरकार ने भी परमाणु ऊर्जा नियमों में ढील दी है जिससे निजी क्षेत्र के लिए काम करना आसान हो गया है। प्रज्ञा टोकामक के सफल संचालन के बाद कंपनी ने भविष्य के लक्ष्य भी निर्धारित कर लिए हैं। उनका अगला कदम प्राणिक नामक पूर्ण पैमाने का वाणिज्यिक संलयन रिएक्टर बनाना है। कंपनी का लक्ष्य वर्ष 2030 तक इसे तैयार करना है। प्राणिक रिएक्टर का उद्देश्य केवल प्लाज्मा बनाना नहीं बल्कि शुद्ध ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना होगा। संलयन प्रक्रिया को शुरू करने के लिए जितनी ऊर्जा मशीन में डाली जाएगी, उससे अधिक ऊर्जा रिएक्टर स्वयं उत्पन्न करेगा। जिस दिन यह मुकाम हासिल होगा वह मानव इतिहास का सबसे बड़ा दिन होगा क्योंकि ऊर्जा समस्याएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी।

भारत का आत्मनिर्भर और स्वच्छ ऊर्जा वाला भविष्य

भारत जैसे विकासशील देश के लिए स्वच्छ और प्रचुर ऊर्जा आर्थिक विकास की सबसे बड़ी कुंजी है। अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और ऊर्जा की मांग आसमान छू रही है। हम हमेशा केवल कोयले और आयातित तेल पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। अगर भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह तकनीक पूर्णतः सफल होती है तो भारत न केवल अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतें पूरी करेगा बल्कि दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा तकनीक का प्रमुख निर्यातक भी बन सकता है। कृत्रिम सूर्य बनाने की दौड़ में अमेरिका और चीन की निजी कंपनियां पहले से लगी हैं जिनके पास असीमित वित्तीय संसाधन हैं। लेकिन प्रनोस फ्यूजन ने सीमित संसाधनों के बावजूद जो अद्भुत तकनीकी दक्षता दिखाई है वह भारतीय युवाओं की मजबूत इच्छाशक्ति का प्रमाण है। प्रज्ञा टोकामक के भीतर चमकता प्लाज्मा केवल वैज्ञानिक प्रयोग का परिणाम नहीं है बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भर और स्वच्छ ऊर्जा वाले भविष्य की आशा की किरण है। यह अभूतपूर्व सफलता एक उद्घोषणा है कि भारत अब जटिल इंजीनियरिंग चुनौतियों का खुद समाधान खोजकर पूरी मानवता को नई राह दिखाएगा।

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