अयोध्या में बना राम मंदिर किसका यह सार्वजनिक मंदिर यानी आश्रय स्थल है या बीजेपी और आरएसएस का व्यापारिक स्थल ?

जितेंद्र मिश्रा पत्रकारों की तरफ देखते हुए स्पष्ट शब्दों में कहते नजर आ रहे हैं, "देखिए, मैं आप सबको पहचान रहा हूं, दोबारा आने नहीं दूंगा।" यह बयान देने के तुरंत बाद वे किसी अन्य सवाल का जवाब दिए बिना सीधे ट्रस्ट कार्यालय के भीतर बैठक कक्ष में चले गए। इस पूरी घटना का वीडियो वहां मौजूद कुछ लोगों ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया।
अयोध्या /03 सितंबर 2026 /अटल हिन्द ब्यूरो
अयोध्या में बना राम मंदिर किसका यह सार्वजनिक मंदिर यानी आश्रय स्थल है या बीजेपी और आरएसएस का व्यापारिक स्थल ?भारत की जनता द्वारा दिए गए चंदे से बना राम मंदिर जिसमे पिछले दिनों करोड़ो रूपये चोरी हो गए अब एक मालिक जितेंद्र मिश्रा आया है जिसने आते ही अपनी बातो से स्पष्ट कर दिया की मंदिर अब सार्वजनिक सम्पति नहीं रहा इसलिए भारत की जनता को सम्भल जाना चाहिए जिस तरह भारत में 2014 से इसी मंदिर के नाम पर सरकार बना कर सत्ता में आया नरेंद्र मोदी ने भारत के सारे सिस्टम को करप्ट बना दिया उसी तरफ राम मंदिर भी नहीं बचेगा ?
जितेंद्र मिश्रा को यह समझ जाना चाहिए की यह मंदिर भारत की जनता की पाई पाई से बना है जितेंद्र मिश्रा इसके मालिक नहीं है ज्यादा उछाल मारोगे तो शायद धरती भी नसीब ना हो इसलिए जितेंद्र मिश्रा अपने काम तक सीमित रहे तो बेहतर होगा वरना भारत की जनता जब अपने पर आ जाती है तो जितेंद्र मिश्रा तो किसी खेत की मूली भी नहीं है राजा महाराजाओं को भी झुका देती है ,कॉकरोच आंदोलन याद रखना जितेंद्र मिश्रा साहब !
अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को पहला पूर्णकालिक सीईओ मिला है। पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा गुरुवार को पद संभालने के बाद पहली बार वहां पहुंचे। उनकी मौजूदगी सामान्य नहीं रही। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से फैला जिसमें उन्हें पत्रकारों से कुछ कहते सुना जा सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कहा, “देखिए, मैं आप सबको पहचान रहा हूं, दोबारा आने नहीं दूंगा।”
यह वाक्य सुनकर कई सवाल मन में उठते हैं। क्या नया सीईओ मीडिया से दूरी बनाना चाहता है? या फिर पहले दिन के दबाव में प्रतिक्रिया हो गई? अयोध्या जैसे संवेदनशील स्थान पर हर छोटी बात का असर दूर तक पड़ता है। इसलिए इस घटना को सिर्फ एक वीडियो तक सीमित रखना ठीक नहीं।
जितेंद्र मिश्रा वायुसेना के अनुभवी अधिकारी हैं। उन्होंने Western Air Command की कमान संभाली और ऑपरेशन सिंदूर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अप्रैल 2026 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी मिली। ट्रस्ट ने करीब 5585 आवेदनों में से चयन प्रक्रिया चलाई। एआई स्क्रीनिंग, साक्षात्कार और फिर तीन नामों के पैनल से अंत में उनका चयन हुआ।
उनकी पृष्ठभूमि सैन्य अनुशासन वाली है। बड़े संस्थानों में नेतृत्व का अनुभव भी है। दान संबंधी अनियमितताओं के बाद ट्रस्ट में सुधार की जरूरत महसूस की जा रही थी। ऐसे में एक सख्त और अनुशासित व्यक्ति का आना स्वाभाविक लगता है। लेकिन मंदिर का प्रबंधन सिर्फ अनुशासन से नहीं चलता। यहां श्रद्धा, संवाद और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है।
पत्रकारों से हुई कथित बातचीत पर गौर करें तो साफ लगता है कि संचार की शैली पर ध्यान देने की जरूरत है। राम मंदिर अब सिर्फ पूजा स्थल नहीं रह गया। यह देश की आस्था का बड़ा केंद्र है। रोजाना हजारों भक्त आते हैं। मीडिया भी इस पूरे परिसर की नजर रखती है। सीईओ का मीडिया से रिश्ता सीधा-सादा और सम्मानजनक होना चाहिए। नाराजगी या चेतावनी देने वाला अंदाज गलत संदेश दे सकता है।
जितेंद्र मिश्रा ने अयोध्या पहुंचकर रामलला के दर्शन किए। उन्होंने कहा कि देश सेवा के बाद अब भगवान राम और भक्तों की सेवा का अवसर मिला है। दिल आभार से भरा है। वे खुद को खुशनसीब मानते हैं। उन्होंने समय मांगा ताकि ट्रस्ट की कार्यप्रणाली समझ सकें। ये बातें सकारात्मक हैं। लेकिन वायरल वीडियो के साथ ये बयान एक साथ रखें तो तस्वीर थोड़ी उलझ जाती है।
ट्रस्ट में हाल के बदलाव भी याद रखने लायक हैं। चंपत राय के इस्तीफे, दान के मामले में गिरफ्तारियां और फिर नए पदाधिकारियों की नियुक्ति। गोविंद देव गिरि महासचिव बने, महेश भागचंदका कोषाध्यक्ष। तीन नए सदस्य भी जुड़े। यह साफ संकेत है कि ट्रस्ट पेशेवर तरीके से काम करना चाहता है। सीईओ पद पहली बार इसलिए बनाया गया ताकि दैनिक प्रशासन, सुरक्षा, सुविधा और हिसाब-किताब बेहतर हो सके।
अब सवाल यह है कि नया सीईओ इन उम्मीदों पर कितना खरा उतरेगा। सैन्य अनुभव बड़े स्तर के प्रबंधन में मददगार साबित हो सकता है। लेकिन धार्मिक संस्थान में संवेदनशीलता अलग होती है। भक्तों की सुविधा, दान की पारदर्शिता और मीडिया के साथ खुला संवाद—ये तीन चीजें बहुत मायने रखती हैं। अगर इनमें कोई कमी रही तो आलोचना बढ़ेगी।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं। कुछ लोग सख्ती को जरूरी मान रहे हैं। कुछ इसे अहंकार बता रहे हैं। देवरिया के उनके गांव में खुशी का माहौल था। जय श्री राम के नारे लगे। परिवार और गांव वाले गर्व महसूस कर रहे हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन अयोध्या में जिम्मेदारी सिर्फ गर्व की नहीं, जवाबदेही की भी है।
जितेंद्र मिश्रा ने पहले ही कहा है कि अतीत से सबक लेना चाहिए, लेकिन बोझ नहीं बनने देना चाहिए। यह सही दृष्टिकोण है। अब जरूरत है कि वे अपने शब्दों और व्यवहार से भरोसा पैदा करें। पहले दिन की घटना को लेकर स्पष्टीकरण आना चाहिए। मीडिया से नियमित संवाद स्थापित करना चाहिए। तभी ट्रस्ट की छवि सुधरेगी।
राम मंदिर का प्रबंधन अब नई दिशा में जा रहा है। पेशेवर सीईओ का आना सही कदम है। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अनुशासन के साथ संवाद और संवेदनशीलता कितनी जुड़ती है। जितेंद्र मिश्रा के सामने चुनौती बड़ी है। वे इसे कैसे संभालते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।
अयोध्या की आस्था सिर्फ मंदिर की इमारत तक सीमित नहीं। यह करोड़ों लोगों के विश्वास से जुड़ी है। इसलिए हर फैसला और हर बयान सोच-समझकर होना चाहिए। नया सीईओ अगर इस बात को समझते हैं तो राम मंदिर की व्यवस्था और मजबूत होगी। अगर संवाद की कमी रही तो सवाल और बढ़ेंगे।
इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ निकलती है। बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की हर छोटी प्रतिक्रिया भी मायने रखती है। खासकर तब जब जगह अयोध्या जैसी हो। जितेंद्र मिश्रा के पास अनुभव है, सम्मान है और अवसर भी है। अब जरूरत है कि वे इनका सही इस्तेमाल करें। भक्तों की सुविधा, पारदर्शिता और खुला रवैया—इन तीन बातों पर ध्यान दें तो पहला दिन की चर्चा भी पीछे छूट जाएगी।
अंत में यही कहा जा सकता है कि राम मंदिर ट्रस्ट का नया अध्याय शुरू हो चुका है। उम्मीद है कि यह अध्याय आस्था को और मजबूत करेगा, न कि संदेह पैदा करेगा। जितेंद्र मिश्रा की भूमिका इसमें अहम साबित होगी।