बंदूक से रैंप तक बस्तर की बेटियों ने बदली नक्सलवाद की तस्वीर

बंदूक से रैंप तक बस्तर की बेटियों ने बदली नक्सलवाद की तस्वीर

बस्तर की धरती पर सबसे बड़ी खबर अब यह नहीं है कि कितनी बंदूकें बरामद हुईं, कितने नक्सली मारे गए या कितनों ने आत्मसमर्पण किया। असली खबर वह तस्वीर है, जिसमें कभी जंगलों में हथियार लेकर चलने वाली महिलाएं रायपुर के मंच पर कोसा सिल्क पहनकर रैंप पर उतरती हैं। 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में आत्मसमर्पित पूर्व महिला नक्सलियों की यह रैंप वॉक इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सुरक्षा अभियान के बाद शुरू होने वाली उस असली लड़ाई का चेहरा दिखाती है, जिसे आंकड़ों में नापना कठिन है हिंसा छोड़ चुके इंसान को सम्मान के साथ नई जिंदगी देना।

13 अगस्त को सामने आए इस दृश्य में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इन महिलाओं से मुलाकात की, उनका हौसला बढ़ाया और रैंप पर उनकी मौजूदगी ने पूरे सभागार को तालियों से भर दिया। मुंबई से आई टीम ने उन्हें रैंप वॉक का प्रशिक्षण दिया। जिन हाथों में कभी बंदूक थी, उनमें अब हुनर है। जिन चेहरों से कभी जंगल का भय जुड़ा था, उन चेहरों पर अब आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है। यहीं अमित शाह की 31 मार्च 2026 वाली घोषणा का अर्थ भी बदल जाता है।

केंद्रीय गृह मंत्री ने पहले देश को नक्सलवाद से मुक्त करने की समयसीमा तय की थी और 31 मार्च को बस्तर समेत देश को नक्सलमुक्त घोषित करने की बात सामने आई। लेकिन नक्सलमुक्ति की घोषणा सुरक्षा व्यवस्था का अंत नहीं, विकास की सबसे कठिन शुरुआत है। गोली चलने का खतरा कम करना एक लक्ष्य था; अब ऐसी जिंदगी बनाना लक्ष्य होना चाहिए, जिसमें किसी युवक या युवती को बंदूक उठाने का कारण ही न मिले। आंकड़े बताते हैं कि यह बदलाव अचानक नहीं आया।
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31 मार्च की समयसीमा के आखिरी दिन बस्तर रेंज के चार जिलों में 44 माओवादियों के आत्मसमर्पण की खबर सामने आई और 217 हथियार जमा हुए। उससे पहले जनवरी 2024 से मार्च 2026 तक सुकमा में 38 मुठभेड़ों में 84 नक्सलियों के मारे जाने, 478 गिरफ्तारियों और 743 आत्मसमर्पण की जानकारी सामने आई। ये आंकड़े सुरक्षा बलों के दबाव, खुफिया तंत्र और आत्मसमर्पण नीति के असर को दिखाते हैं। लेकिन इनके पीछे एक सवाल भी होना चाहिए कितनों को स्थायी रोजगार मिला?

यही वह सवाल है जिसे नक्सलमुक्ति के जश्न के बीच दबने नहीं देना चाहिए। बंदूक छोड़ना कठिन है, लेकिन बंदूक छोड़ने के बाद सामान्य नागरिक बनकर जीना उससे भी कठिन हो सकता है। आत्मसमर्पित व्यक्ति को घर चाहिए, कौशल चाहिए, आय चाहिए, शिक्षा चाहिए और समाज का भरोसा चाहिए। अगर उसे हर दिन उसके अतीत से पहचाना जाएगा, तो मुख्यधारा में लौटने की प्रक्रिया अधूरी रहेगी।

कानून अपराध की जवाबदेही तय करे, लेकिन समाज सुधार का दरवाजा बंद कर देगा तो पुनर्वास का अर्थ ही खत्म हो जाएगा। छत्तीसगढ़ में पुनर्वास और कौशल विकास पर जोर इसी कारण निर्णायक है। अप्रैल में सुकमा पहुंचे मुख्यमंत्री ने पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित युवाओं से मुलाकात की थी। उस समय बताया गया कि 2026 में 307 हितग्राहियों को प्रशिक्षण दिया गया और 313 मुख्यधारा में लौटे युवाओं को हर महीने 10 हजार रुपये का स्टाइपेंड दिया जा रहा था।

सरकार का लक्ष्य केवल पुनर्वास नहीं, अवसर देना बताया गया। सहायता किसी को कुछ महीने संभाल सकती है; अवसर उसे वर्षों तक खड़ा रखता है। जून में सुकमा के पुनर्वास केंद्र में 25 आत्मसमर्पित नक्सलियों, जिनमें 13 महिलाएं थीं, को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया गया। यहां कैमरे की चमक नहीं, रोजी-रोटी का सवाल है। अगर किसी पूर्व उग्रवादी के हाथ ईंट जोड़ना, घर बनाना या कपड़ा बुनना सीखते हैं, तो यह केवल कौशल प्रशिक्षण नहीं; यह हिंसा की अर्थव्यवस्था से श्रम की अर्थव्यवस्था में बदलाव है।

बस्तर में महिलाओं की दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है। जून में सुकमा की दो आदिवासी युवतियों पुष्पा माड़काम और दिल्पा किच्चे को प्राथमिक लघु वनोपज समितियों का प्रबंधक बनाया गया और उन्होंने इस सीजन में 4.52 करोड़ रुपये के तेंदूपत्ता कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। इसका मतलब साफ है जिस इलाके को लंबे समय तक बंदूक और भय से पहचाना गया, वहां महिलाएं अब बाजार, प्रशासन और कारोबार की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं। यही बदलाव नक्सलमुक्ति की असली सफलता है।

इसलिए रायपुर की रैंप वॉक को सिर्फ वायरल वीडियो बनाकर छोड़ देना सबसे बड़ी भूल होगी। इसे पुनर्वास मॉडल का हिस्सा बनाना होगा। कोसा सिल्क, बस्तर की बुनाई, हस्तशिल्प, वनोपज और जनजातीय कला को प्रशिक्षण, डिजाइन, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ना होगा। एक दिन की तालियां आत्मविश्वास देती हैं, लेकिन नियमित आमदनी आत्मनिर्भरता देती है। रैंप पर मिली पहचान तभी स्थायी होगी, जब अगले महीने भी इन महिलाओं के घर में उनकी मेहनत की कमाई पहुंचे।

नक्सलमुक्त बस्तर की अगली चुनौती इसलिए सुरक्षा नहीं, अवसर है। सड़कें बन गईं तो उन पर बाजार भी चलना चाहिए। मोबाइल नेटवर्क पहुंचा तो उससे शिक्षा और कारोबार भी जुड़ना चाहिए। सुरक्षा कैंप बने तो उनके आसपास बैंक, स्वास्थ्य, राशन, कौशल और रोजगार की सुविधाएं भी पहुंचनी चाहिए। अगर सरकार बंदूक की जगह विकास चाहती है, तो उसे हर गांव में राज्य की मौजूदगी जमीन तक ले जानी होगी।

सबसे बड़ा बदलाव तब होगा जब बस्तर का युवा भविष्य का फैसला बंदूक नहीं, स्कूल, कौशल और रोजगार से करेगा। जब पूर्व नक्सली महिला को लोग उसके अतीत से नहीं, उसके काम से पहचानेंगे। जब किसी गांव की लड़की यह कह सकेगी कि वह अधिकारी बनेगी, उद्यमी बनेगी, बुनकर बनेगी या फैशन मॉडल बनेगी तब नक्सलवाद की विचारधारा को वास्तविक जवाब मिलेगा। यह बदलाव इसलिए भी निर्णायक है क्योंकि बस्तर की अगली पीढ़ी को अतीत की हिंसा नहीं, भविष्य के अवसर विरासत में मिलने चाहिए।

यही किसी भी शांति अभियान की अंतिम सफलता होगी। और यही राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। अमित शाह ने नक्सलमुक्ति का लक्ष्य हासिल होने की बात कही है। अब सरकार के सामने उससे भी बड़ा लक्ष्य है बस्तर को अवसरमुक्त नहीं, अवसरों से भरपूर बनाना। क्योंकि नक्सलवाद की हार सिर्फ तब नहीं होती जब आखिरी बंदूक खामोश होती है।

उसकी निर्णायक हार तब होती है, जब बंदूक छोड़ चुका हाथ दोबारा हथियार की तरफ देखने की जरूरत महसूस नहीं करता। रायपुर की उस रैंप पर चलती महिलाएं इसलिए बस्तर की नई तस्वीर हैं। तालियों से आगे रोजगार, मंच से आगे बाजार, आत्मसमर्पण से आगे सम्मान और नक्सलमुक्ति से आगे विकास यही वह रास्ता है, जिस पर चलकर सरकार अपने सबसे बड़े दावे को जमीन की सबसे बड़ी सच्चाई में बदल सकती है।

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