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Fake pharmaceutical companies in India,भारत में नकली दवा कंपनियां

               भारत में नकली दवा कंपनियां

Fake pharmaceutical companies in India

भारत में दवा कंपनियों की इस मनमानी का बड़ा कारण इनका विशाल कारोबार है।
Fake pharmaceutical companies in India
BY-स्वदेश कुमार सिन्हा | 16 Feb 2024
भारत की ‘केंद्रीय ड्रग मानक कंट्रोल संस्था’(central drug standards control body) द्वारा ताज़ा जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ अक्टूबर महीने तक भारत में जांच की गई दवाओं के 6% नमूने फेल हो गए हैं। छोटी और मध्यम कंपनियों के मामले में तो 65% कंपनियां तयशुदा मानकों से निचले स्तर की दवाएं बना रही हैं। चाहे अन्य बहुत अहम मामलों की तरह यह रिपोर्ट भी गोदी मीडिया द्वारा दबा दी गई और इस पर कोई चर्चा नहीं हुई। पर इस रिपोर्ट ने फिर से भारत में नक़ली दवाओं और घटिया दवाओं के बेहद बड़े और जानलेवा कारोबार पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारत में नक़ली और घटिया दवाओं (medicine drug)का मुद्दा बार-बार उठता रहा है। दिसंबर 2022 में उज्बेकिस्तान मुल्क़ में खांसी की दवा पीने के कारण 18 बच्चों की मौत हो गई थी। यह दवा ‘भारत में नोएडा स्थित मारिऑन बायोटेक’ (Marion Biotech)द्वारा बनाई गई थी। 2022 में ही अफ़्रीकी मुल्क़ गांबिया में ऐसी दवा पीने से 66 बच्चों की मौत हो गई थी।
Fake pharmaceutical companies इस मामले के बाद ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (World Health Organization)तक ने 4 दवाओं की निशानदेही की थी जो मरीजों के लिए घातक थीं। इन दवाओं के तार भी भारत के ‘हरियाणा स्थित मेडन फ़ार्मा’ (Maiden Pharma)के साथ जुड़े थे। पर इतना सब होने के बावज़ूद भारत सरकार ने इन कंपनियों के नक़ली और घटिया दवाओं के कुल कारोबार पर कोई पुख्ता कार्रवाई करना ज़रूरी नहीं समझा। यह पड़ताल करना भी ज़रूरी नहीं समझा गया कि अगर निर्यात होने वाली दवाओं की गुणवत्ता इतनी घटिया और ज़हरीली है तो भारत के मरीजों को किस तरह की दवाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं?
भारत में दवा कंपनियों की इस मनमानी का बड़ा कारण इनका विशाल कारोबार है। भारत दवाओं की पैदावार के मामले में विश्व स्तर पर काफ़ी आगे आता है। दवाओं की विश्व स्तर की मांग का 20%, टीकों का 60% और जेनरिक दवाओं(generic drugs) का बड़ा हिस्सा भारत से जाता है। 2021 में भारत का दवाओं का यह कारोबार 42 अरब डॉलर का था जिसका 2030 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर तक हो जाने की संभावना है। इन्हीं अरबों डॉलर के सालाना कारोबार के बल पर कंपनियों की सरकार में अच्छी-ख़ासी जान-पहचान है।
अगर इन कंपनियों की कार्यशैली पर नज़र डालें तो पता लगता है कि बहुत सारी कंपनियां अक्सर कच्चे माल और तैयार माल को बाज़ार में बेचने से पहले उनकी जांच ही नहीं करतीं जो कि इस उद्योग के लिए बेहद ज़रूरी होता है क्योंकि दवाएं सीधे तौर पर स्वास्थ्य पर असर डालती हैं।
ज़िंदगी और मौत का सवाल बन सकता है इसलिए इनकी बिक्री से पहले इनकी जाँच ज़रूरी होती है। किसी भी दवा की क्षमता तय करते समय कुछ बुनियादी टेस्ट ज़रूरी होते हैं। ये टेस्ट ना करना लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करना है जो अनेक इंसानी ज़िंदगियों को नुक़सान पहुंचा सकता है इसलिए बहुत सारी कम गुणवत्ता वाली घटिया दवाएं और नक़ली दवाएं बिना जांच के बाज़ार और मरीजों तक पहुंच जाती हैं और उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करती हैं।
यहां नक़ली दवाओं और कम गुणवत्ता वाली दवाओं में फ़र्क़ समझ लेना भी ज़रूरी है। कम गुणवत्ता वाली दवाएं वे होती हैं जिनमें दवा की मात्रा निर्धारित मात्रा से कम होती है या उनकी रासायनिक संरचना सही नहीं होती। दूसरी ओर नक़ली दवाएं (fake medicines)या मिलावटी दवाएं वे होती हैं जिनमें गोलियां, कैप्सूल या टीकों आदि में असली दवा नहीं होती दवा की जगह चॉक पाउडर, पानी या महंगी दवा की जगह सस्ती दवा का पाउडर मिला दिया जाता है इसके अलावा एक्सपायर हो चुकी दवाओं को दोबारा पैक करके बेचने का धंधा भी होता है।
ऐसे हालातों में सरकार को सख़्ती से इन कंपनियों की जांच करनी चाहिए पर भारत के असल हालात तो ये हैं कि इस देश में बनाई जाने वाली बहुत सारी दवाएं तो अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों पर खरी ही नहीं उतरतीं। ऐसी दवाओं को फेंकने की जगह देश में ही बेचा जा रहा है और अगर किसी राज्य में बनाई दवा में कोई ख़राबी पाई जाती है तो उस दवा पर सिर्फ़ उसी राज्य में पाबंदी लग सकती है
अन्य राज्यों में वह पहले की तरह ही बिकती है क्योंकि भारत में ऐसा कोई क़ानून मौजूद ही नहीं है जो इन कंपनियों के लिए बाज़ार में बिक रही ग़लत दवाओं को तुरंत बंद करवा दे और तो और जब गांबिया और उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौत का मामला बढ़ा और बात विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization)तक पहुंची तो भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंसूख मंडवीय ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि दवाओं में कोई ख़राबी नहीं बल्कि बेशर्म भारत सरकार ने 2023 के संसद के मानसून सत्र में पुराने बनाए क़ानून ‘भारतीय ड्रग और कॉस्मेटिक क़ानून’ में संशोधन करके वे दो धाराएं ही बदल दीं जिनके तहत नक़ली दवाओं के दोषी को जेल हो सकती थी।
नए क़ानून के मुताबिक़ दोषी सिर्फ़ कुछ हज़ार रुपए देकर जेल से बच सकता है। वैसे तो पुराने क़ानून के तहत जेल भी मामूली थी पर नए क़ानून से व्यापार करने की छूट के नाम पर ऐसे मगरमच्छों को उससे भी छुटकारा दे दिया गया है।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में ही मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता है। तीसरी दुनिया के अनेकों देशों से लेकर विकसित पूंजीवादी देशों तक दवा उद्योग का तेंदुआ जाल मरीजों की जान के लिए ख़तरा बना हुआ है। हाल ही में ‘अमेरिका की एक कंपनी पर्ड्यू फ़ार्मा एलपी’ का मामला सामने आयादजो ओपिओइड दवा बनाती थी।
ओपिओइड दर्द से आराम देने वाली दवाओं के समूह को कहा जाता है जिन्हें अंग्रेज़ी में ‘पेनकिलर्स’ भी कहा जाता है। ये दवाएं हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों से बनती हैं,जिसके कारण इनकी लत लगने की संभावना होती है। इस कंपनी ने अपने प्रचार द्वारा इस झूठ का प्रचार किया कि उसके द्वारा बनाई जा रही ओपिओइड दवा सुरक्षित है और इसकी लत नहीं लगती,जबकि लैब में इस बात की कोई पुष्टि‍ नहीं हुई थी।
अकादमिक कार्यक्रमों और बड़े स्तर पर डॉक्टरों तक पहुँच करके उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में लोगों को यह दवा देने के लिए मनाया गया (डॉक्टरों को भारी नगदी, तोहफ़े देना और बड़े-बड़े हॉटेलों में पार्टियाँ देना – मनाने के आम ढंग हैं)। नतीजा यह निकला कि जहाँ 1997 में 6,70,000 लोगों को डॉक्टरों द्वारा यह दवा लेने की हिदायत दी गई,वहीं 2002 में यह संख्या 62,00,000 और 2012 में 25.5 करोड़ तक पहुँच गई। जब इस दवा की माँग इतनी बढ़ गई तो अन्य कंपनियाँ भी बड़े स्तर पर यह दवा बनाने लगीं।
थोड़े सालों में ही लोगों को इस दवा की इतनी लत लग गई,कि इस लत को ‘ओपिओइड महामारी’ के नाम से जाना जाने लगा। 1996 से 2016 तक 4,53,300 लोगों की मौत सिर्फ़ इस दवा के ओवरडोस या लत की वजह से हुईं।
Fake pharmaceutical companies in India यह कंपनी कितने ही लोगों की मौतों के लिए और अनगिनत लोगों की ज़िंदगियों के साथ खिलवाड़ करने की दोषी है। इसके बावज़ूद अमेरिकी सरकार द्वारा इस कातिल मालिक पर कोई कार्रवाई नहीं की गई,उसे कोई सज़ा नहीं हुई बल्कि जुर्माना भरवाकर उसे छोड़ दिया।
साफ़ है कि दवाओं का यह सारा खेल मुनाफ़े पर टिका हुआ है। ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में दवाओं की गुणवत्ता के साथ समझौता किया जाता है। मानकों को नीचे लाया जाता है। तय मानकों के अनुसार भी काम नहीं किया जाता। एक तो भारत की बीमार सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पहले ही आम लोगों की ज़रूरतें पूरी नहीं कर रही,दूसरा इन नक़ली और घटिया दवाओं के व्यापार ने उसे बिलकुल अपाहिज बना दिया है।
भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की आम मेहनतकश आबादी को इस सब का नुक़सान झेलना पड़ रहा है। एक तो पहले ही मेहनतकशों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं ऊपर से अगर अपनी दिन-रात की ख़ून-पसीने की कमाई से इलाज के नाम पर दवा ख़रीदनी पड़े,तो उसे मिलता है दवा के रूप में ज़हर। मतलब ग़रीब मज़दूर पर कई तरफ़ से मार पड़ रही है उसे मेहनत की लूट का शिकार होना पड़ता है काम के बोझ और ग़रीबी के चलते स्वास्थ्य गिरता जाता है और फिर मेहनत के पैसे से इलाज के लिए दवा ख़रीदने पर मिलती हैं ज़हरीली-नक़ली दवाएं।bhaarat mein nakalee dava kampaniyaan
दवा कारोबार में इस जानलेवा धोखाधड़ी का सीधा संबंध इससे होने वाले अथाह मुनाफ़े से है। जब तक मुनाफ़े पर टिकी मौजूदा व्यवस्था रहेगी तब तक लोगों का स्वास्थ्य भी मुनाफ़ाखोर पूंजीपतियों के क़ब्ज़े में रहेगा। सभी स्वास्थ्य सुविधाओं समेत दवाइयों के निजी कारोबार को पूरी तरह बंद करके इसे सरकारी कंट्रोल में लाना चाहिए ताकि स्वास्थ्य सेवाओं का काम मुनाफ़ा कमाने का धंधा ना बने। सभी स्वास्थ्य सुविधाओं में निजी मुनाफ़ाखोरी को ख़त्म करके इसे लोगों की सेवा का साधन बनाया जा सकता है।
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