नेताओं की मेज पर दुनिया और जनता की मेज पर सवाल, ब्रिक्स सम्मेलन से क्या उम्मीद?

दिल्ली इन दिनों देश की राजधानी नहीं बल्कि दुनिया की कूटनीति का एक बड़ा पड़ाव बन गई है। सड़कों पर झंडे लहरा रहे हैं और होटलों में विदेशी मेहमान ठहरे हुए हैं। भारत मंडपम में ब्रिक्स का मंच पूरी तरह से तैयार हो चुका है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन पहुंच चुके हैं और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आने वाले हैं जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके मेजबान हैं। कैमरे इस मुलाकात को दर्ज कर रहे हैं और पूरी दुनिया इसके नतीजों को देखना चाहती है।
पुतिन शी और मोदी की यह बैठक ब्रिक्स को एक नई दिशा दे सकती है लेकिन दिशा की असल परीक्षा मंजिल पर जाकर होती है। सवाल यह नहीं है कि यह बैठक कितनी देर तक चलेगी या इससे कितनी तस्वीरें सामने आएंगी। असल सवाल यह है कि बंद कमरे में लिया गया फैसला उस आम आदमी तक कब पहुंचेगा जो तेल का भाव सुनकर अपनी जेब टटोलने लगता है। क्या महंगाई से कोई राहत मिलेगी और क्या ऊर्जा संकट का कोई रास्ता निकलेगा या फिर अंत में सिर्फ एक चमकदार बयान ही सामने आएगा।
इस त्रिकोण की सबसे बड़ी अहमियत यह है कि तीनों देशों के हित पूरी तरह से अलग हैं। रूस इस समय यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है जबकि चीन अपनी सीमाओं और व्यापारिक विस्तार में बहुत व्यस्त है। इसके विपरीत भारत इन दोनों देशों से अपने रिश्ते निभाते हुए अपनी एक स्वतंत्र राह तलाश कर रहा है। गलवान घाटी की कड़वी यादों के बाद करीब सात साल में शी जिनपिंग का दिल्ली आना कोई आम यात्रा नहीं है। यह भरोसे की वापसी है या फिर किसी मजबूरी या रणनीतिक जरूरत का नतीजा है यह आने वाला समय ही बताएगा।
ईरान के साथ चल रहे युद्ध ने पश्चिम एशिया को पूरी तरह से अस्थिर कर दिया है और कच्चा तेल सौ डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। पूरी दुनिया इस समय महंगाई की चक्की में बुरी तरह पिस रही है। ऐसे हालात में अगर ब्रिक्स की मेज पर केवल सहयोग और बहुपक्षवाद जैसे शब्द ही गूंजते रहे तो पेट्रोल कभी सस्ता नहीं हो सकता है। देश की जनता को किसी भी तरह के नारों की जरूरत नहीं है बल्कि उन्हें ठोस नतीजों की तलाश है।
ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का पुराना क्लब नहीं रह गया है क्योंकि इसमें ग्यारह नए सदस्य और पार्टनर देश जुड़ चुके हैं। जैसे-जैसे इसका दायरा बढ़ा है वैसे-वैसे इसकी चुनौतियां भी काफी बढ़ गई हैं। खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के साथ सप्लाई चेन आज के समय में बहुत बड़े सवाल बन चुके हैं। युद्ध की मार अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह खेत कारखाने रसोई और बाजार तक पहुंच चुकी है। इतने सारे देशों के बीच आपसी सहमति बनाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं है।
ईरान और यूएई के बीच के मतभेद इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण हैं। इस मंच पर एक साझा बयान तो तैयार हो सकता है लेकिन एक साझा रास्ता निकालना बहुत कठिन काम है। भारत यह चाहता है कि ब्रिक्स किसी भी कीमत पर पश्चिम-विरोधी गुट न बने बल्कि दुनिया के लिए एक पूरक शक्ति बने। भारत को अमेरिका के साथ भी अपने रिश्ते बनाए रखने हैं और रूस तथा चीन के साथ भी संवाद जारी रखना है। भारत की कूटनीति इस समय इसी नाजुक रस्सी पर चल रही है।
इस सम्मेलन की भारी कीमत दिल्ली का आम नागरिक चुका रहा है। शहर की कई सड़कें बंद हैं और ट्रैफिक पूरी तरह से थमा हुआ है तथा मेट्रो में भी भारी भीड़ है। सुरक्षा का इंतजाम बहुत जरूरी है लेकिन अगर मेहमानों के स्वागत में मेजबान का रास्ता ही बंद हो जाए तो सवाल उठना लाजिमी है। महंगाई और बारिश के इस दौर में आम परिवार पहले से ही काफी ज्यादा परेशान हैं। इस समय बच्चों के स्वास्थ्य की बात हो रही है लेकिन महंगाई के कारण पौष्टिक भोजन जुटाना भी मुश्किल हो रहा है।
ब्रिक्स की सफलता तभी मानी जाएगी जब इसकी गूंज टीवी स्टूडियो से निकलकर बाहर आए। यह गूंज गांव की चौपाल किसान के खेत मजदूर की थाली और मध्यमवर्ग की रसोई तक पहुंचनी चाहिए। वरना केवल मंच ही चमकता रहेगा और जनता की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आएगा। रूस के साथ रक्षा सहयोग भारत और रूस के रिश्तों की एक बहुत बड़ी ताकत है। ब्रह्मोस सुखोई और एस-400 जैसे हथियार केवल रक्षा उपकरण नहीं हैं बल्कि ये दोनों देशों के सामरिक रिश्तों की बड़ी पहचान हैं।
भारत आत्मनिर्भर बनना चाहता है लेकिन इसका मतलब सिर्फ देश के अंदर उत्पादन करना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि संकट के समय किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न रहा जाए। रूस के साथ सहयोग बढ़ाते हुए यह भी देखना होगा कि निर्भरता कम हो रही है या उसका रूप बदल रहा है। शी जिनपिंग के साथ बातचीत करना और भी ज्यादा संवेदनशील मामला है। सीमा विवाद और व्यापार घाटे के मुद्दों पर मुस्कान से काम नहीं चलेगा बल्कि इस पर पूरी स्पष्टता की बहुत जरूरत है।
गलवान के बाद हाथ मिलाना एक अच्छी तस्वीर है लेकिन रिश्ते तभी सुधरेंगे जब ज़मीन पर भरोसा दिखेगा। मौसम ने भी इस बात की याद दिला दी है कि दुनिया की समस्याएं सिर्फ बड़ी राजधानियों में बैठकर नहीं सुलझाई जा सकती हैं। देश के कई हिस्सों में भारी बारिश का अलर्ट जारी है और चक्रवातों का खतरा भी लगातार मंडरा रहा है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन ब्रिक्स के एजेंडे में केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई बनना चाहिए। प्रकृति कभी किसी के भाषण नहीं सुनती है।
जब बाढ़ आती है तो गरीब का घर उजड़ता है और किसान की फसल डूब जाती है। राहत की सबसे ज्यादा जरूरत असल में उसी पीड़ित इंसान को होती है। जब खाद्य सुरक्षा की बात हो तो मदद सीधे किसान तक पहुंचनी चाहिए। जब ऊर्जा सुरक्षा की चर्चा हो तो तेल संकट के समय विकासशील देशों को वास्तविक राहत मिलनी चाहिए। आपदा प्रबंधन पर बनी सहमति को चेतावनी से समय पर मिलने वाली राहत में बदलना जरूरी है। वरना सरकारी फाइलें तो मोटी होती रहेंगी लेकिन आम जनता के संकट कभी कम नहीं होंगे।
यहीं पर भारत की सबसे बड़ी और असली परीक्षा हो रही है। भारत को रूस से अपनी मित्रता चीन से मिलने वाली चुनौती और अमेरिका से अपने रणनीतिक रिश्तों को साधना है। इसके साथ ही ब्रिक्स को किसी भी एक खेमे का औजार बनने से रोकना भी बहुत जरूरी है। भारत को रूस और चीन के बीच संवाद का एक मजबूत पुल बनना चाहिए। ऊर्जा और खाद्य संकट पर व्यावहारिक सहयोग जुटाना होगा और अपने हितों को स्पष्ट रखते हुए सभी से रिश्ते निभाने होंगे।
ब्रिक्स की नई दिशा तभी देश की एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि साबित होगी। एक पुल की अपनी विडंबना यह होती है कि सब लोग उस पर से गुजर जाते हैं लेकिन वह हमेशा दो अलग किनारों के बीच ही खड़ा रहता है। भारत को केवल एक पुल नहीं बनना है बल्कि अपनी जमीन को भी बहुत मजबूत करना है। यही इस सम्मेलन की सबसे कठिन और बड़ी कसौटी है। फैसले मंच की चमक से नहीं तय होते बल्कि उनके असर से तय होते हैं।
पुतिन आए और शी जिनपिंग आए तथा प्रधानमंत्री मोदी ने उनका स्वागत किया। कैमरे चमके और तस्वीरें आईं लेकिन सिर्फ इतने भर से कोई इतिहास नहीं बनता है। इतिहास हमेशा उन फैसलों को याद रखता है जो इंसानों की जिंदगी को बदलते हैं। ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की एक मजबूत आवाज बनना होगा। इसके लिए व्यापार को आसान बनाना ऊर्जा संकट का पक्का हल निकालना और खाद्य सुरक्षा को किसान से जोड़ना जरूरी है। दिल्ली सज चुकी है और दुनिया की नजर इस मंच पर टिकी हुई है।