गूगल गुरु हो गए, घर-मोहल्ले के बुजुर्गों के अनुभव से परहेज

Atal Hind Team Online21 August 20266 min read46 viewsलेख
गूगल गुरु हो गए, घर-मोहल्ले के बुजुर्गों के अनुभव से परहेज

बुजुर्गों की सीख: समाज में नैतिक पतन को कैसे रोकें?

संजय सक्सेना,लखनऊ,वरिष्ठ पत्रकार

मोहल्ले के नुक्कड़ पर बिछी वह लकड़ी की बेंच आज भी वहीं है, लेकिन उस पर बैठने वाले खादी के कुर्ते और सफेद धोती वाले वे बाबा अब कहीं दिखाई नहीं देते। वे बुजुर्ग, जिनकी आंखें पूरे मोहल्ले के लिए पहरेदार का काम करती थीं, आज आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गए हैं। दोपहर की चिलचिलाती धूप में जब मां-बाप घर के भीतर सो रहे होते थे, तब यही बुजुर्ग गली के मोड़ पर बैठकर हर आते-जाते बच्चे पर अपनी पैनी नजर रखते थे। किसी बच्चे का हाथ साइकिल के पैडल से फिसला नहीं कि उनकी तरफ से एक चीख गूंज उठती थी, संभलकर चल। स्कूल बंक करके कंचे खेलने वाले या किसी बाग से अमरूद चुराने वाले बच्चों के लिए वे साक्षात यमराज की तरह प्रकट हो जाते थे।

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गलती देखते ही वहीं डांट लगाना, कान उमठना और फिर शाम को सीधे उस बच्चे के घर पहुंचकर उसके मां-बाप को आगाह करना उनकी दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा था। वे इसे अपना अधिकार और सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी मानते थे। सबसे खूबसूरत बात यह थी कि जब वे घर पर शिकायत लेकर पहुंचते थे, तो कोई मां-बाप उनसे लड़ता नहीं था। समाज में एक अटूट विश्वास था कि अगर मोहल्ले के किसी बुजुर्ग ने बच्चे को टोका है, तो वह बच्चे के भले के लिए ही होगा। मां-बाप उनकी बातों को पूरे सम्मान के साथ सुनते, उनका आभार जताते और फिर अपने बच्चे को समझाते-बुझाते थे। पूरा मोहल्ला एक संयुक्त परिवार की तरह सांस लेता था, जहां हर बच्चा पूरे मोहल्ले का बच्चा होता था।

लेकिन आज समय का पहिया ऐसा घूमा कि मोहल्ले तो दूर, खुद घर के भीतर भी बच्चों को कुछ समझाने या टोकने की हिमाकत कोई नहीं कर पाता। आधुनिकता के नाम पर हमने जिस नई दुनिया का निर्माण किया है, उसने हमारे रहने के ढंग के साथ-साथ हमारी सोच को भी पूरी तरह बदल दिया है। पुराने आत्मीय मोहल्लों का स्वरूप अब तेजी से सिकुड़ रहा है और उनकी जगह चमचमाती कंक्रीट की कॉलोनियों और गगनचुंबी अपार्टमेंट्स ने ले ली है।

इन बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स के बंद फ्लैटों में लोग खुद को कैद कर चुके हैं। आज की स्थिति यह है कि एक ही मंजिल पर रहने वाला पड़ोसी सालों-साल दूसरे पड़ोसी का नाम तक नहीं जानता। हर घर के दरवाजे पर एक अदृश्य बोर्ड टंगा है, जिस पर लिखा है कि कृपया हमारे निजी जीवन में दखल न दें। इस तथाकथित प्राइवेसी या निजता की संस्कृति ने समाज के उस ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है, जो कभी हमें एक सूत्र में बांधकर रखता था।

जब पड़ोसी ही पड़ोसी से बेगाना हो गया, तो भला कोई किसी के बच्चे की गलती पर जुबान खोलने का जोखिम क्यों उठाएगा। आज अगर कोई बुजुर्ग किसी बच्चे को उसकी भलाई के लिए भी टोक दे, तो बच्चे के माता-पिता ही लाठी-डंडा लेकर या पुलिस की धमकी देते हुए बुजुर्ग के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं कि आपने हमारे बच्चे को बोलने की हिम्मत कैसे की।

यह बदलाव किसी एक व्यक्ति, परिवार या मोहल्ले की निजी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक गहरे सामाजिक पतन की शुरुआत है, जिसका खामियाजा आज देश और समाज दोनों को भुगतना पड़ रहा है। इसका सबसे जीवंत और डरावना प्रमाण हमें देश की राजधानी के जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील स्थलों पर देखने को मिलता है। जंतर-मंतर पर जब युवा और बच्चे किसी आंदोलन या धरने के नाम पर इकट्ठा होते हैं, तो वहां से निकलने वाली गालियां और अमर्यादित भाषा सुनकर रूह कांप जाती है।

वे धरने और प्रदर्शन चाहे समाज के जितने भी अच्छे और ऊंचे उद्देश्यों के लिए आयोजित किए गए हों, लेकिन वहां मौजूद युवाओं के मुंह से टपकती बदजुबानी और गाली-गलौज इस बात का साफ अहसास कराती है कि हमारी महान भारतीय संस्कृति किस तरह दूषित की जा रही है। जंतर-मंतर तो महज एक राष्ट्रीय मंच है, जो मीडिया की नजरों में आ जाता है, अन्यथा पूरे देश के हर शहर, हर गली और हर चौराहे पर आज ऐसा ही माहौल बन चुका है। स्कूल और कॉलेज की वर्दी पहने बच्चे सरेआम सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए ऐसी गंदी भाषा का इस्तेमाल करते हैं कि वहां से किसी सभ्य राहगीर का गुजरना मुहाल हो जाता है।

इस सांस्कृतिक और नैतिक पतन के पीछे पाश्चात्य सभ्यता की वह अंधी नकल है, जिसने हमारे युवाओं को पूरी तरह से 'जेन जी' यानी एक ऐसी नई पीढ़ी में बदल दिया है, जो जड़ों से कटी हुई है। पश्चिमी देशों की व्यक्तिवादी सोच को अपनाकर यह पीढ़ी मानती है कि वे पूरी दुनिया में सबसे अलग और सबसे होशियार हैं। इस पीढ़ी के व्यवहार में एक अजीब-सा उथलापन, अधीरता और अहंकार साफ देखा जा सकता है।

खुद को अपने माता-पिता और दादा-दादी से ज्यादा बुद्धिमान समझना इन युवाओं की फितरत बन चुकी है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में गूगल को अपना गुरु मानने वाले इन युवाओं को लगता है कि जीवन का हर ज्ञान स्क्रीन स्क्रॉल करने से मिल सकता है। वे यह भूल जाते हैं कि ज्ञान और अनुभव में बहुत बड़ा फर्क होता है। जो अनुभव बुजुर्गों के माथे की झुर्रियों और सफेद बालों में छुपा होता है, उसे किसी सर्च इंजन से डाउनलोड नहीं किया जा सकता। बड़ों की सीख को 'ओल्ड स्कूल' या दकियानूसी कहकर खारिज कर देना इस पीढ़ी का फैशन बन गया है, जिसके कारण वे एक वैचारिक और नैतिक शून्य में जी रहे हैं।

जब हम इस पूरे परिदृश्य का एक गंभीर और भावनात्मक अध्ययन करते हैं, तो इसके निष्कर्ष देश और समाज के भविष्य को लेकर गहरी चिंता पैदा करते हैं। एक ऐसा समाज, जहां बड़ों का सम्मान खत्म हो जाए और बच्चों को टोकने वाला कोई न बचे, वह समाज आत्मघाती रास्ते पर चल पड़ता है। जब बच्चों पर से बुजुर्गों की वह तीसरी आंख हट गई, तो युवा पीढ़ी पूरी तरह से निरंकुश हो गई।

आज समाज में जो अपराध, नशाखोरी, मानसिक तनाव और डिप्रेशन की घटनाएं बढ़ रही हैं, उनके पीछे यही अकेलापन और मार्गदर्शन की कमी है। पुराने समय में जब कोई बच्चा रास्ता भटकता था, तो मोहल्ले का बुजुर्ग उसे डांटकर सही रास्ते पर ले आता था, जिससे वह बड़ी मुसीबतों से बच जाता था। आज का युवा अपनी गलतियों को सुधारने के लिए किसी टोकने वाले के न होने के कारण सीधे कानून की गिरफ्त में आता है या फिर खुद को तबाह कर लेता है।

कुल मिलाकर, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया सिर्फ ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़ी कंपनियां बनाने से पूरी नहीं होती, बल्कि इसके लिए नागरिकों के भीतर नैतिक मूल्यों और चरित्र का होना अनिवार्य है। यदि देश की युवा शक्ति संस्कारविहीन, उच्छृंखल और अमर्यादित हो जाएगी, तो आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बाद भी हम एक खोखले राष्ट्र के रूप में खड़े होंगे। बुजुर्ग समाज की वह नींव होते हैं, जो अदृश्य रहकर भी पूरे मकान का बोझ संभाले रखते हैं।

उनकी डांट में कोई दुश्मनी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को तराशने की ममता छुपी होती थी। अगर हमें अपनी संस्कृति, अपने देश और अपने समाज को इस गर्त में गिरने से बचाना है, तो हमें कॉलोनियों और अपार्टमेंट्स की बंद दीवारों को तोड़कर फिर से उस मोहल्ला संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि बड़ों का टोकना उनकी आजादी पर हमला नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा का कवच है। जब तक समाज में बुजुर्गों को उनका वह पुराना पहरेदार वाला हक वापस नहीं मिलेगा, तब तक जंतर-मंतर से लेकर देश के कोने-कोने तक मर्यादाएं ऐसे ही तार-तार होती रहेंगी और हम असहाय होकर अपने ही भविष्य को बिखरते देखते रहेंगे।

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