जातिगत भेदभाव की सोच लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है: कांग्रेस नेता जितेंद्र बघेल

जातिगत भेदभाव की सोच लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है: कांग्रेस नेता जितेंद्र बघेल

कांग्रेस के हरियाणा सह प्रभारी और राष्ट्रीय सचिव जितेंद्र बघेल ने हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के संबोधन के बाद हुए मंच के शुद्धिकरण मामले पर भाजपा सरकार को घेरा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जातिगत भेदभाव की सोच लोकतंत्र के लिए खतरा है। राजनीतिक विरोध की आड़ में सामाजिक अपमान किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

मंच का शुद्धिकरण संविधान और सामाजिक न्याय के खिलाफ

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जितेंद्र बघेल ने इस घटना को संविधान की समानता और सामाजिक न्याय की भावना के पूरी तरह विपरीत बताया है। उन्होंने कहा है कि यदि यह घटना सामने आए तथ्यों के अनुरूप हुई है, तो यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं है। बल्कि यह सामाजिक भेदभाव की मानसिकता का एक गंभीर उदाहरण है। उन्होंने भाजपा से अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट करने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने नैनीताल पुलिस से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी की है। बघेल ने कहा है कि दोष साबित होने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

मल्लिकार्जुन खड़गे का देश के लिए योगदान

उन्होंने कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे देश के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। इसके साथ ही वे कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उनका लंबा सार्वजनिक जीवन सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों के प्रति पूरी तरह समर्पित रहा है। संसद से लेकर जन आंदोलनों तक उन्होंने हमेशा गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों की आवाज को मजबूती से उठाया है। ऐसे वरिष्ठ नेता के जनता को संबोधित करने के बाद मंच का कथित रूप से शुद्धिकरण किया जाना चिंताजनक है। यह केवल राजनीतिक विरोध का विषय नहीं है, बल्कि इससे सामाजिक समरसता और समानता को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं

देश के सामने कई गंभीर मुद्दे मौजूद हैं

उन्होंने कहा कि इस समय देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनहित से जुड़े अनेक गंभीर मुद्दे हैं। कांग्रेस पार्टी सामाजिक न्याय, समानता और संविधान की मूल भावना की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारतीय संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को समानता और सम्मान का अधिकार देता है। इसके अलावा संविधान देश से छुआछूत को पूरी तरह समाप्त करता है। आजादी के दशकों बाद भी यदि किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान के आधार पर शुद्ध और अशुद्ध जैसी सोच सामने आती है, तो यह पूरे समाज के लिए बेहद चिंताजनक बात है।

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