मेरा गांव

शहर क्या आज गांव भी विराना लगता है ।
आफत क्या आई खमोश ठिकाना लगता है ।
कहाँ चला गई वो चकाचौंध जमाने की ,
जाना नामुमकिन वो गुलशन बेगाना लगता है ॥
हर मोहल्ले की अलग सी खूबी व अंदाज है ।
आज फीकी पड़ी है रौनक ऐसा कहाँ रिवाज है,
हसीन वादियां, ऊंचे पर्वत , झरने गहरी नदियां ,
हिम का आंचल देश का ये सरताज है ॥
शहर मेरा फिर चमकेगा थोड़ा सब्र सा कर लो ।
माटी देगी फिर से खुशबू हिम्मत जहन भर लो ,
घने जंगलों की फगडंडी से आना तुम यहाँ,
इन्तजार में मीलने  की उम्मीद ठान ग़र लो ॥
रचनाकार :- दिलाराम भारद्वाज ‘ दिल ,
करसोग , मण्डी (हिमाचल प्रदेश )
8278819997

बनावटी प्यार

लाख मिन्नतें मांग कर जो तुझको पाया ,
थी भूल मेरी जो अब था पछताय़ा ।
हुई थी मुलाकात रहा में जो तुमसे ,
झुकी नजरों से प्यार था जताया ।
दिन बीत जाता था कठिन डगर में ,
रातों ने हमको जगना सिखाया ।
यादों में तेरी दिल में थी जो लपटें ,
जाने कैसे था ये शोला दबाया ।
घड़ी पल तब तो लगती थी साले ,
जानें वो वक़्त कैसे था हमने बिताया ।
न जानें कैसे थी जोड़ी वो दौलत ,
रात दिन था हमने लहू बहाया ।
बड़ी मूश्क्त से जगह झोंपड़ी की ,
तेरे लिए था एक आशियाँ बनाया ।
आज रहते हो तुम रजो महल में ,
दुनिया को था हमने आईना दिखाया।
रहती थी हमसे लिपट कर ए जालिम ,
आज लगता है दुश्मन मेरा साया ।
देह जर जर हुई जो मेरी अब ,
तूने मुझपर जो कहर था ढ़ाया ।
आज मेरी चौखट हुई मुझे पराई ,
भाग दुश्मन से दामन बचाया ।
न रहा अब आसरा उसको अपने घर,
आशिक उसके ने था घर से भगाया ।
पकड़े जो तूने आवारा आशिक ,
तेरी शैह पर था मुझको डराया ।
न रह सकोगी चैन से तुम उम्र भर ,
सरे राह से था जो मुझको भटकाय़ा ।

दिलाराम भारद्वाज ‘ दिल ,
करसोग , मण्डी हिमाचल प्रदेश♥

साहित्यकार दिलाराम भारद्वाज ‘ दिल , की कलम से एक रचना

जीत जाएंगे हम हर जंग जीत ही जाएंगे हम । मंजर में पीठ न दिखाएंगे हम।…

बिन्दिया
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बिन्दिया तू कितनी छोटी सी है
पर माथे पर दो भौंहों के बीच तू खूब सजती है।
तेरे होने से रुप द्विगुणित हो जाता है,
तू चेहरे की आभा बढ़ा देती है।
यूँ लगे चेहरे पर माहताब जड़ा है
चांद की चांदनी छिटकती पूरे चेहरे पर
तू रुप का नूर बढ़ा देती है।
तेरा दो भौंहों के बीच जो स्थान है
मानों सिंहासन पर बैठा कोई राजकुमार है।
तुझसे ही तो औरत का शृंगार है।
लाख पहने हो गहने उसने,पर
तेरे बिना सारा शृंगार बेकार है।
माथे पर तू लगे इस कदर
मानों चमका है नभ में आफताब है।
बिन्दिया प्रीत की मिसाल है
औरत के सौभाग्य का प्रतीक है।
इसके बगैर उसका रुप लगे बेरंग है।
लगा के बिन्दिया पहन के पायल,
इतराती-बलखाती फिरती सजना के अंगना।
कर देती बिन्दिया साजन को मदहोश,
उड़ा ले जाती उसकी निन्दिया।
बिन्दिया तू छोटी सी है पर,
कर कितने बड़े काम तू कर जाती है!

अनिता निधि
जमशेदपुर,झारखंड

अनीता निधि की रचनाएँ आप विभिन्न रचनाकार मंच में पढ़ व सून सकते है व इन्हे कई सम्मान भी प्राप्त है ।

किताब और गुलाब

चल पड़े वो नन्हें बाल, पीठ में धरे बैग बन ठन के ।
लगते हैं जैसे नवेली दुल्हन के पैरों की पायल खनके ।
चलते हुए राह में मिला उन्हें गुलाब का फूल ।
लेकर नन्हें हाथों से रख पन्नों के बीच यही इनका उसूल ।
ये प्रथा पुरानी रखना किताब के पन्ने के बीच गुलाब ।
कोई हमें बताएं, क्या है इसका मतलब और इसका जवाब ।
वो बाल अब बन गया, बड़ा बनकर साहब ।
घर में दादी मां को मिली उसकी वो किताब ।
यादें बचपन की ताजा हुई जब देख वो रखा हुआ गुलाब ।
समझ न पाया आज तलक क्या होगा इसका जवाब !
आकर साहब से पूछे दादी मां याद है वो बालपन ।
देख किताब के बीच वो गुलाब और खुशी से हो गया मन प्रसन्न ।
तब चला देखने महबूबा, लेकर हाथ में एक गुलाब ।
हो गई मोहब्बत, आज समझा कि ये ‘गुलाब’ , क्या लाजवाब!

दिलाराम भारद्वाज ‘ दिल ‘
मण्डी , हिमाचल प्रदेश ।

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