पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश: महेंद्रगढ़ में अवैध खनन याचिका की सीबीआई जांच शुरू होगी

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महेंद्रगढ़ जिले में अवैध खनन के संबंध में दाखिल याचिका का कड़ा संज्ञान लिया है। हाईकोर्ट ने सीबीआई को प्राथमिकी दर्ज करके जांच करने के आदेश जारी किए हैं। यह मामला 12 अगस्त को चंडीगढ़ में सामने आया, जहां अदालत ने इस याचिका की सच्चाई पर उठे गंभीर सवालों के बाद यह बड़ा फैसला लिया है।
हाईकोर्ट की प्रारंभिक जांच में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हुई कि जिस व्यक्ति को याचिकाकर्ता बताया गया था, उसे न तो इस याचिका के दाखिल होने की कोई जानकारी थी और न ही उसने ऐसा कोई मामला दर्ज करने के लिए किसी भी व्यक्ति को अधिकृत किया था। इस बेहद गंभीर मामले को देखते हुए कार्यवाहक चीफ जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को प्राथमिकी दर्ज करके जांच करने के सख्त निर्देश दिए हैं। सीबीआई की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में खंडपीठ के समक्ष पेश की गई थी। इस रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता को याचिका दाखिल करने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उसने किसी को भी कोई निर्देश या अधिकार नहीं दिया था।
प्रारंभिक जांच में सामने आए हेरफेर के तथ्य
प्रारंभिक जांच के दौरान अदालत के सामने गलत प्रस्तुतीकरण और रिकार्ड में हेरफेर करने के कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इन तथ्यों से प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध का मामला पूरी तरह से बनता है। इसके बाद पीठ ने याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के खिलाफ चार अप्रैल को दर्ज की गई प्राथमिकी की जांच भी तुरंत सीबीआई को सौंप दी है। अदालत के समक्ष यह अहम बात कही गई थी कि यह प्राथमिकी असल में याचिकाकर्ता पर दबाव बनाने के मुख्य उद्देश्य से ही दर्ज कराई गई थी। पीठ ने यह साफ निर्देश दिया है कि सीबीआई दोनों ही मामलों की जांच एक साथ मिलकर करेगी। इसके साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है कि जांच पूरी होने के बाद तीन महीने के भीतर इसकी रिपोर्ट सीधे हाई कोर्ट में पेश की जाएगी।
महेंद्रगढ़ के बखरीजा गांव का है पूरा मामला
यह पूरा कानूनी मामला महेंद्रगढ़ जिले के बखरीजा गांव में चल रहे कथित अवैध खनन से जुड़ा हुआ है। इस याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया था कि वहां पर खनन योजना, पर्यावरण मंजूरी प्रमाणपत्र और सभी वैधानिक नियमों के पूरी तरह विपरीत जाकर अवैध खनन किया जा रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग की गई थी कि उसे उचित मुआवजा दिलाया जाए और उसके घर से 250 मीटर के दायरे में चल रहे अवैध खनन को तुरंत प्रभाव से रोकने के कड़े निर्देश दिए जाएं।
याचिका वापस लेने की कोशिश से बढ़ा संदेह
इस मामले में याचिका वापस लेने की कोशिश ने पूरी स्थिति को और अधिक संदिग्ध बना दिया। 16 अप्रैल को अदालत को यह जानकारी दी गई कि याचिकाकर्ता अब इस याचिका को आगे बिल्कुल भी चलाना नहीं चाहता है। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का कड़ा निर्देश दिया। कोर्ट में पेश होने पर याचिकाकर्ता ने खुद को पूरी तरह अनपढ़ बताया और वह यह बिल्कुल भी नहीं समझा सका कि आखिर यह याचिका क्यों दाखिल की गई थी और अब इसे क्यों वापस लिया जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में सतपाल सिंह नाम के एक व्यक्ति की भूमिका भी बेहद संदिग्ध पाई गई। पीठ ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि उस व्यक्ति ने याचिकाकर्ता के साथ अपने संबंधों को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं किया। अदालत ने याचिका और उस पर लगे वकालतनामे के हस्ताक्षरों में भी भारी अंतर पाया। इन सभी संदिग्ध परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने याचिका को दाखिल करने और फिर उसे वापस लेने की पूरी प्रक्रिया को 'अत्यधिक संदिग्ध' करार दिया। पीठ ने यह साफ कर दिया कि वह अज्ञात व्यक्तियों द्वारा गलत उद्देश्यों के लिए फर्जी याचिकाएं दाखिल करवाने की प्रक्रिया को कभी स्वीकार नहीं कर सकती है। अब सीबीआई इन दोनों प्राथमिकियों की संयुक्त रूप से जांच करेगी और इस मामले की असली सच्चाई को हाई कोर्ट के सामने पेश करेगी।