फीचर लेख: दूसरों की चमकती जिंदगी में खुद को तलाशते बच्चे और उनका मानसिक तनाव

आज के समय में बच्चों के कंधों पर केवल बस्ते का बोझ नहीं है, बल्कि आने वाले कल का डर और दूसरों से तुलना का दबाव भी है। इस लेख में लेखिका कृति आरके जैन ने बच्चों के मन में चल रहे खालीपन, सोशल मीडिया की चमक-दमक, परीक्षा के दबाव और परिवार से बढ़ती दूरी जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा की है।
बचपन कभी चीजों का हिसाब नहीं रखता था। अब बच्चों को सिखाया जा रहा है कि उनकी पहचान चीजों से बनती है। किसके पास महँगा फोन है, किसके कपड़े बेहतर हैं, कौन कहाँ घूमकर आया—तुलना की यह दौड़ बच्चों के मन तक पहुँच गई है। स्क्रीन पर हर ओर चमकता जीवन दिखाई देता है। इससे बच्चे मानने लगते हैं कि सुख वही है जो दूसरों के पास है। यहीं से कमी वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन में पैदा होने लगती है।
अब बच्चे अपने जीवन को अपनी आँखों से कम, दूसरों की दिखाई हुई जिंदगी से अधिक देखने लगे हैं। सोशल मीडिया का अदृश्य आईना हर दूसरे व्यक्ति को अधिक सुंदर, सफल और खुश दिखाता है। माता-पिता की आर्थिक क्षमता जहाँ इच्छाओं की सीमा तय करती है, इंटरनेट वहाँ कोई सीमा नहीं छोड़ता। किसी चीज का अभाव बच्चे को अपने भीतर का अभाव लगने लगता है। जबकि सच यह है कि बच्चे की कीमत उसके जूते, फोन, कपड़ों या घर की कीमत से नहीं आँकी जा सकती।
स्क्रीन की दुनिया बच्चे को केवल दृश्य नहीं देती, वह उसके मन के लिए नए पैमाने भी गढ़ती है। साइबर बुलिंग के ताने और अपमान भीतर उतरकर आत्मविश्वास को चोट पहुँचाते हैं। फिल्टर और संपादित तस्वीरें चेहरे और शरीर की कृत्रिम कसौटी बनाती हैं। ऑनलाइन गेमिंग और लगातार स्क्रीन से जुड़े रहना नींद, एकाग्रता और दिनचर्या को प्रभावित करता है। बच्चा उस वास्तविक दुनिया से दूर होने लगता है, जहाँ उसके रिश्ते और सपने सचमुच मौजूद हैं।
एक बच्चे के भविष्य पर फैसला सुनाने के लिए हमने एक प्रश्नपत्र को इतनी ताकत दे दी है कि उसके सामने बचपन और सपने छोटे पड़ने लगे हैं। कोचिंग की भीड़, रैंक की होड़, अंकों का दबाव और माता-पिता की अपेक्षाएँ असफलता को अंतिम फैसला बना देती हैं। कोटा जैसे शहरों की घटनाएँ इस संकट का कठोर चेहरा दिखाती हैं। परीक्षा केवल योग्यता की कसौटी है, जिंदगी की नहीं।
घर में दरवाजे होते हैं, पर बच्चों के मन के दरवाजे बंद हो जाएँ तो कोई आवाज सुनाई नहीं देती। माता-पिता काम में और बच्चे स्कूल व कोचिंग में अपनी-अपनी दुनिया में सिमटते जाते हैं। संवाद अब संदेशों में रह गया है। बच्चों को हर बार समाधान नहीं चाहिए; कई बार उन्हें बस ऐसा अपना चाहिए जो बिना टोके उनकी बात सुन सके। उन्हें भरोसा चाहिए कि घर वह जगह है जहाँ वे अपनी हार और कमजोरी लेकर भी लौट सकते हैं।
बच्चे के मन में एआई द्वारा नौकरियाँ बदलने, बढ़ती महँगाई और जलवायु संकट जैसे सवाल भय भर रहे हैं। इस डर में वे परिवार से दूर होने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बड़े उनकी दुनिया समझ नहीं सकते। शिक्षक, अभिभावक और समाज बच्चे के व्यवहार में आए गंभीर बदलावों को अनदेखा न करें। जरूरत हो तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है।
दूसरों की रोशनी में अपना चेहरा मत तलाशो। सोशल मीडिया से थोड़ा दूर हटो और प्रकृति, किताब, खेल या संगीत जैसे कामों में लौटो। जब मन में तूफान उठे, तो चुप मत रहो। माँ-पिता, शिक्षक या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से कहो कि मैं ठीक महसूस नहीं कर रहा हूँ। यह अपने जीवन के पक्ष में उठाया गया साहस है।
बच्चों को आगे बढ़ाना जरूरी है, लेकिन पहले उन्हें भरोसा दें कि पीछे रह जाने पर भी वे हमारे अपने हैं। फोन पुराने होंगे, फैशन बदलेंगे, अंक भूल जाएंगे और लाइक्स का शोर थम जाएगा, मगर आत्मसम्मान और रिश्ते साथ रहेंगे। बच्चे से यह मत कहिए कि वह तभी खास है जब जीते; उसे कहिए कि हार में भी उसकी जगह हमारे दिल में उतनी ही है। जिंदगी की असली जीत दुनिया की नजर में बड़ा दिखना नहीं, अपनी नजर में खुद को छोटा न होने देना है।