कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ अपनों ने खोला मोर्चा, कोर कमेटी को लेकर बढ़ा विवाद

छत्रपति संभाजीनगर में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ विरोध बहुत ज्यादा तेज हो गया है। पिछले पांच दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे दो आंदोलनकारी मनीष ब्रह्मभट्ट और राहुल पांडे की तबीयत ज्यादा खराब होने के बाद उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि पार्टी की कोर कमेटी में अभिजीत दीपके ने अपने करीबी लोगों को जगह दी है, जबकि जंतर-मंतर आंदोलन में साथ रहे कई लोगों को कमेटी से बाहर कर दिया गया है। इसी बात के विरोध में भूख हड़ताल शुरू की गई थी। अब मनीष और राहुल के अस्पताल में भर्ती होने के बाद फारुक खान ने भूख हड़ताल की कमान संभाल ली है। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि जब तक कोर कमेटी के गठन और नामों को लेकर पूरी पारदर्शिता नहीं आती, तब तक उनका यह आंदोलन लगातार जारी रहेगा।
जंतर-मंतर आंदोलन और पुलिस कार्रवाई का किया जिक्र
दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन में पुलिस का लाठीचार्ज झेलने और आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने का दावा करने वाले दो कार्यकर्ताओं ने कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यहां संभागीय आयुक्त कार्यालय के सामने दूसरे दिन भी आमरण अनशन पर डटे मनीष ब्रह्मभट्ट और राहुल पांड्या ने दावा किया कि वे 6 जून से आंदोलन में सक्रिय थे। बाद में दीपके अमेरिका से भारत लौटे और जब सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे तो उनके नेतृत्व में आंदोलन को गति मिली। आंदोलनकारियों ने कहा कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे देश का था और आज भी है, यह किसी दीपके की जागीर नहीं है। आंदोलन किसी व्यक्ति की लोकप्रियता बढ़ाने का साधन नहीं बनना चाहिए और इसमें देश की बात होनी चाहिए, किसी एक चेहरे की नहीं। दोनों ने दीपके पर आंदोलन को व्यक्तिगत प्रभाव का मंच बताने, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करने और अपने करीबी लोगों को संगठन में महत्वपूर्ण पद देने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
कोर कमेटी के गठन में पारदर्शिता की मांग
मनीष और राहुल ने बताया कि आंदोलन को सफल बनाने में हजारों छात्रों और कार्यकर्ताओं के साथ उन्होंने भी पुलिस की लाठियां खाईं, भूख-प्यास झेली और जंतर-मंतर पर रातें गुजारीं। आज भी आंदोलन के दौरान घायल हुए कुछ छात्र अस्पताल में अपना उपचार करा रहे हैं। अनशनकारियों ने आरोप लगाया कि आंदोलन के बाद गठित कोर कमेटी में देशभर से लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के बजाय दीपके ने अपनी पसंद के लोगों को शामिल किया है। उनका यह दावा है कि कॉलेज के मित्रों, करीबी लोगों, रिश्तेदारों, गर्लफ्रेंड और चापलूसी करने वालों को संगठन में जगह दी गई, जबकि आंदोलन के लिए पुलिस की मार और भूख हड़ताल झेलने वाले कार्यकर्ताओं को पूरी तरह किनारे कर दिया गया। मनीष और राहुल ने यह बड़ा सवाल उठाया कि जब यह देशव्यापी आंदोलन है तो इसकी टीम भी देशव्यापी और लोकतांत्रिक क्यों नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक, देश के प्रत्येक राज्य से कम से कम पांच प्रतिनिधियों को कार्यकारी समिति में शामिल कर एक ऐसी टीम बनाई जा सकती थी, जो अलग-अलग राज्यों के छात्रों और आम लोगों के मुद्दों पर काम करती।
तानाशाही छोड़ने और राजनीति से जोड़ने के आरोपों पर सफाई
दोनों आंदोलनकारियों ने कहा कि दीपके अब तानाशाह बन गए हैं। इस आंदोलन का एक बहुत बड़ा उद्देश्य सरकार को पेपर लीक, बेरोजगारी और गरीबी जैसे गंभीर मुद्दों पर जवाबदेह बनाना था। उनके अनुसार, आंदोलन के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद छात्रों में यह उम्मीद जगी है कि अब परीक्षा व्यवस्था अधिक पारदर्शी होगी और योग्य विद्यार्थियों को मेरिट के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि जब यह आंदोलन देश के छात्रों का था, तो संगठन भी छात्रों और राज्यों की भागीदारी से बनना चाहिए और दीपके को व्यक्ति-केंद्रित राजनीति छोड़कर मुद्दा-केंद्रित तथा पारदर्शी व्यवस्था अपनानी चाहिए। इसके अलावा, मनीष ब्रह्मभट्ट ने खुद पर लगाए जा रहे राजनीतिक आरोपों को भी सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें गुजराती होने के कारण भाजपा से जोड़ना पूरी तरह गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे गुजरात से जरूर हैं, लेकिन भाजपा से नहीं हैं और सरकार के खिलाफ आंदोलन करने के कारण उनके खिलाफ गुजरात में 12 एफआईआर दर्ज हैं। उन्होंने जिला को ड्रग्स मुक्त बनाने की मांग को लेकर गुजरात विधानसभा के सामने भी आंदोलन किया है और किसी भी राजनीतिक दल के लिए प्रचार नहीं किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि दीपके उन्हें बदनाम करने के लिए इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं।