जब जलवायु घर छीन रही हो, कानून को छत बनना होगा

जब जलवायु घर छीन रही हो, कानून को छत बनना होगा

जब जलवायु घर छीन रही हो, कानून को छत बनना होगा

जलवायु विस्थापित — न शरणार्थी, न नागरिक; सिर्फ़ लापता

विकास के विस्थापितों का हक है, तो जलवायु पीड़ितों का क्यों नहीं 

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बाढ़ और कटाव से घर उजड़ते हैं, परिवारों का भविष्य भी बह जाता है; लेकिन कानून में उनके लिए कोई ठिकाना नहीं। भारत में जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चेतावनी नहीं, लाखों लोगों की वर्तमान त्रासदी है। 2024 में जलवायु संबंधी आपदाओं से 54 लाख आंतरिक विस्थापन दर्ज हुए—दक्षिण एशिया में सबसे अधिक। करीब दो-तिहाई बाढ़ से जुड़े थे। 2022 में यह आंकड़ा 25 लाख था। असम, सुंदरबन, ओडिशा और बिहार के नदी-तटीय इलाकों में परिवार हर साल घर, खेत और पहचान खो रहे हैं। फिर भी अब तक (2026) ऐसा कोई कानून नहीं, जो उन्हें ‘जलवायु विस्थापित’ मानकर अधिकार तय करे। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 तत्काल राहत तक सीमित है; स्थायी पुनर्वास और मुआवजे का अधिकार कानून से बाहर है।

नदी का पानी उतर जाए तो आदमी घर लौट सकता है, लेकिन कटाव जमीन निगल जाए तो लौटने को कुछ बचता नहीं। यही नदी-कटाव को बाढ़ से अधिक क्रूर बनाता है। ब्रह्मपुत्र 1950 के बाद से असम की 4.27 लाख हेक्टेयर जमीन निगल चुकी है। माजुली द्वीप 1970 के दशक में 1,250 वर्ग किलोमीटर था, जो अब 350-600 वर्ग किलोमीटर रह गया है। सरकारी आंकड़े 2014-24 के बीच 17,390 लोगों के विस्थापन की बात करते हैं, जबकि संसद में दिए जवाब 86 हजार से अधिक लोगों की भूमिहीनता बताते हैं। तटबंधों या सरकारी जमीन पर बसे परिवार ‘अतिक्रमणकारी’ कहलाते हैं। भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में राज्य जमीन ले तो मुआवजा है; नदी ले जाए तो न अधिग्रहण माना जाता है, न मुआवजा।

सबसे गहरी चोट तब लगती है, जब जमीन का अस्तित्व मिट गया हो और उसी का कागज मांगकर इंसान को राहत से बाहर कर दिया जाए। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन, आजीविका और आश्रय का अधिकार देता है, लेकिन अदालतें भी इस संकट का व्यापक समाधान नहीं कर पाई हैं। गौहाटी उच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में राहत दी है, पर व्यापक नीति नहीं बनी। असम की 2020 की पुनर्वास नीति 2023 में संशोधित/आंशिक रूप से वापस ली गई। पंद्रहवें वित्त आयोग ने कटाव प्रभावितों के लिए अलग फंड की सिफारिश की थी और 2024 में केंद्र ने कुछ दिशानिर्देश जारी किए, मगर जमीनी पहुंच सीमित है। दस्तावेजों की शर्त उस परिवार के सामने है, जिसकी जमीन और कागज दोनों नदी में समा चुके हैं।

उजड़ना केवल गांव छोड़ना नहीं है; यह आदमी को उसकी पुरानी पहचान से भी बेदखल कर देता है। सुंदरबन में बढ़ती लवणता खेती और मछली पालन खत्म कर रही है। खेत और पानी जब रोजी छीन लेते हैं, तो परिवार शहरों की ओर जाता है। वहां झुग्गियों में नई जिंदगी शुरू होती है—मगर अधिकारों के बिना। कोई राष्ट्रीय रजिस्टर, स्पष्ट नोडल एजेंसी नहीं है। 2022 का निजी सदस्य विधेयक—क्लाइमेट माइग्रेंट्स (प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) बिल—संसद में आगे नहीं बढ़ सका। इस बीच जलवायु विस्थापन अस्थायी घटना नहीं, स्थायी और संरचनात्मक संकट बनता जा रहा है। व्यवस्था फिर भी उसे ‘आपदा’ की छोटी अवधि में बांधकर देख रही है।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में कानून ने बदलती जलवायु की आहट सुन ली है, लेकिन भारत में उजड़े लोगों की आवाज व्यवस्था की दीवारों से टकराकर लौट आती है। बांग्लादेश और फिजी ने जलवायु विस्थापितों को कानूनी पहचान देने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऑस्ट्रेलिया-तुवालु समझौता बताता है कि जलवायु आवागमन को कानूनी ढांचे में जगह दी जा सकती है। भारत में कार्बन सेस और पर्यावरणीय जुर्माने से समर्पित फंड बनाने के प्रस्ताव हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। जब बांध या हाईवे परियोजना से विस्थापित व्यक्ति को मुआवजा और पुनर्वास मिलता है, तो प्रकृति से उजड़े परिवार को क्यों नहीं? जमीन जाने का दर्द उसके कारण से कम नहीं होता।

इस कानून-विहीनता का सबसे भारी बोझ उन्हीं पर पड़ता है, जो पहले ही गरीबी ढो रहे हैं। आदिवासी, दलित और गरीब किसान जलवायु विस्थापन के सबसे असुरक्षित शिकार हैं। उनके लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और पीढ़ियों की पहचान है। जमीन जाने के साथ बच्चों की पढ़ाई, रोजी और समुदाय से जुड़ाव टूटता है। उनकी आवाज संसद तक पहुंचना कठिन है। चुनावी घोषणापत्रों में जलवायु विस्थापन का उल्लेख नहीं के बराबर है और सरकारी सर्वेक्षणों में भी यह प्राथमिकता नहीं बन पाया। जब विस्थापितों को कानून कोई नाम नहीं देता, तो उनके अधिकारों की मांग भी अनसुनी रह जाती है। यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं, संवैधानिक समानता का गंभीर प्रश्न है।

अब राहत की घोषणा से आगे बढ़कर ऐसे कानून की जरूरत है, जो उजड़ने के बाद भी नागरिक को अकेला न छोड़े। समर्पित कानून जलवायु विस्थापितों को स्पष्ट पहचान दे, पंजीकरण करे, पुनर्वास को अधिकार बनाए और स्थायी फंड सुनिश्चित करे। भूमि खोने वालों को दस्तावेजी अड़चनों से राहत मिले तथा आवास, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था हो। अनुच्छेद 21 और राज्य के नीति-निर्देशक तत्व इसका संवैधानिक आधार दे सकते हैं। पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुरूप अलग कोष बनाया जा सकता है। कार्बन सेस और पर्यावरणीय जुर्मानों से भी संसाधन जुटाए जा सकते हैं। सवाल यह नहीं कि उपाय संभव हैं या नहीं; सवाल है कि राजनीतिक इच्छा कब पैदा होगी।

सवाल अब यह है कि हर साल उजड़ रहे लाखों लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा? वे किसी युद्ध के शरणार्थी नहीं, फिर भी विस्थापित हैं; उन्होंने जमीन बेची नहीं, फिर भी भूमिहीन हैं; उन्होंने शहर चुना नहीं, फिर भी पलायन को मजबूर हैं। नदी को दोष देकर राज्य अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। यदि कानून उन्हें पहचान नहीं देता, तो मुआवजा अपवाद और पुनर्वास एहसान बन जाता है। तब बाढ़ और कटाव महज प्राकृतिक आपदाएं नहीं रहते, वे संवैधानिक अन्याय की शक्ल लेते हैं। नदी जमीन छीन ले, यह प्रकृति की विवशता हो सकती है; लेकिन उसके साथ इंसान का अधिकार भी बह जाए, यह राज्य की विफलता होगी।

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)

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