कॉकरोच आंदोलन पर सवालों से घिरी सरकार

कॉकरोच आंदोलन पर सवालों से घिरी सरकार: जंतर मंतर से धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा तक की सच्चाई
संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां
जंतर मंतर पर हुए छात्र युवा आंदोलन और इसके देशव्यापी फैलाव के साथ मोदी सरकार ने जिस तरह से निपटने की कोशिश की है, उससे समूची सरकार कई तरह के सवालों से घिर गई है, संसद में उससे जवाब देते नहीं बन रहा है और इस सरकार की विश्वसनीयता पूरी तरह से खत्म हो गई लगती है।
लगता है कि मोदी सरकार ने इस आंदोलन से कोई सबक नहीं सीखा है। नीट के पेपर लीक को केंद्र में रखकर कॉकरोच आंदोलन मोदी सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहा था, जिसके दबाव में आकर धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन जिस प्रकार भाजपा सांसदों ने उन्हें पगड़ी और हार पहनाकर संसद में उनका भव्य स्वागत किया है, उससे साफ है कि यह सरकार किसी भी स्तर पर उन्हें जवाबदेह नहीं मानती।उनका इस्तीफा सिर्फ कॉकरोच आंदोलन की आंखों में धूल झोंकने के लिए है।
प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्री बनाना भी बहुत कुछ कहता है, जिन्होंने बिलकिस बानो मामले के दोषियों की समय-पूर्व रिहाई का समर्थन किया था। सत्ता पक्ष द्वारा इससे इंकार किए जाने के तुरंत बाद ही उनका पुराना वीडियो मीडिया में फिर से वायरल होने लगा है। यह इस सरकार के लिए शर्मनाक से कम कुछ भी नहीं है कि उसे बलात्कार का समर्थन करने वाले व्यक्ति के सिवा और कोई अन्य व्यक्ति शिक्षा मंत्री बनाने के लिए नहीं मिला है। वैसे, जिस प्रकार प्रधान खांटी संघी हैं, उसी प्रकार जोशी भी है और आरएसएस की सिफारिश के बिना उनका शिक्षा मंत्री बनना संभव नहीं था। संघी गिरोह जिस तरह शिक्षा के क्षेत्र को हिंदुत्व की अपनी व्यापक परियोजना से जोड़ रहा है, उसके चलते किसी गैर-संघी व्यक्ति का शिक्षा मंत्री बनना संभव भी नहीं है।
संसद में भी विपक्ष ने छात्र-युवाओं के कॉकरोच आंदोलन और उससे जुड़े घटनाक्रम को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने संसद में छात्र, इडियट और अंधभक्त के एक रूपक के माध्यम से सत्ता पक्ष पर जिस तरह निशाना साधा है, उससे पूरा संघी गिरोह तिलमिलाया हुआ है और यह रूपक देश की आम जनता की जुबान बन गया है। इसके बाद राहुल गांधी को बोलने से रोकने के लिए सत्ता पक्ष को हंगामा करना ही था। वैसा ही हुआ भी।
यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है कि यदि पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा दिल्ली में आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी। पुलिस और अर्धसैनिक बल अंततः केंद्र सरकार की प्रशासनिक कमान के अंतर्गत ही काम करते हैं।
जिस तरह कॉकरोचों के खिलाफ पैलेट गन, कीलों, करंट वाली लाठियों तथा अन्य घातक हथियारों के इस्तेमाल किया गया है, इस सरकार प्रायोजित हिंसा की जवाबदेही से गृह मंत्री अमित शाह बरी नहीं हो सकते। उन्हें और प्रधानमंत्री मोदी को अपनी कारगुजातियों के लिए स्पष्ट रूप से देश की आम जनता से माफी मांगनी चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, दोनों संसद से 'तड़ीपार' हैं और पूरी संसदीय नैतिकता को ताक पर रखकर किरण रिजूजी यह कह रहे हैं कि विपक्ष का बुलावा किसी भी मंत्री को संसद में आने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
डिजिटल पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया है कि 19–20 जुलाई को जंतर-मंतर तथा बाद में एनएसयूआई कार्यालय के सामने खड़ा मिला पत्थरों से भरा ट्रक पहले से ही संसद मार्ग थाने द्वारा एक रोडरेज मामले में जब्त किया जा चुका था। इस खोजी रिपोर्ट से सरकार के इस दावे पर पानी फिर गया है कि पुलिस बल पर हमला करने के लिए आंदोलनकारियों ने एक ट्रक पत्थर इकट्ठा करके रखा था। अब वास्तविकता यही है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा मोदी सरकार ने ही आयोजित की थी, ताकि आंदोलन को बदनाम करके उसे कुचला जा सके।
जंतर-मंतर पर धरना समाप्त होने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में छात्रों को गिरफ्तार करने और उनके खिलाफ मुकदमें लादने की खबरें आ रही हैं, जो इस सरकार की वादाखिलाफी को ही सामने लाता है। इस सरकार ने आंदोलन में शामिल छात्र युवाओं के खिलाफ दायर एफआईआर वापस लेने का समझौता किया था। अब वह इस समझौते से उसी प्रकार मुकर रही है, जैसे किसान आंदोलन के साथ किए गए समझौते से मुकरी थी।
जेएनयू की छात्र नेता आईशी घोष को किसी लंबित मामले के बहाने गिरफ्तार करने पुलिस माकपा के केंद्रीय कार्यालय में घुस गई। याने अब विपक्षी राजनीतिक दलों के कार्यालय भी सत्ता पक्ष के निशाने पर आ चुके हैं। इस पर हंगामा होने पर जेपी नड्डा ने सफाई दी है कि आपातकाल के दौरान, जब वे छात्र थे, उन्हें दो बार कक्षा के भीतर से गिरफ्तार किया गया था। इसका साफ मतलब है कि आज भारत की समूची जनता एक अघोषित आपातकाल के साए में जी रही है।
जंतर मंतर पर कॉकरोचों और देशव्यापी छात्र-युवा आंदोलन के खिलाफ संघी गिरोह के दुष्प्रचार के नाकाम होने के बाद लगता है संघ सरदार मोहन भागवत का अक्ल भी ठिकाने आ गया है। संघी गिरोह मोहन भागवत की नाक के ठीक नीचे इस आंदोलन को एंटी-सोशल, एंटी-नेशनल, एंटी-सनातन, वायरस, जनरेशन गटर, पंचर बनाने वालों की औलाद, एंटी-इंडिया साजिश, विदेशी फंडिंग, 'धरने पर बैठी छात्राओं को सामूहिक बलात्कार से भी दिक्कत नहीं', जैसी उपाधियां दे रहा था।
भाजपा का सोशल मीडिया सेल ऑनलाइन ट्रोलिंग और लिंचिंग कर रहा था। पुलिस आंदोलनकारी छात्र छात्राओं के घरों में घुसकर उनके माता-पिताओं को डरा धमका रही थी। 15 साल की एक नाबालिगा की रोते हुए माफी मांगने की तस्वीर वायरल की गई। इतने सारे धत्कर्मों के बाद भी मिली नाकामयाबी के बाद मोहन भागवत बोले हैं कि जेन-जी और जेन-अल्फा हमसे ज्यादा देशभक्त हैं! इस पर केवल यही टिप्पणी की जा सकती है कि इस देश का हर नागरिक संघी गिरोह से ज्यादा देशभक्त है।
अब एक बात स्पष्ट है। बहुसंख्यक जनता, और इनमें अधिकांश युवा हैं, के दिलो-दिमाग से संघी गिरोह के फासीवादी आतंक का डर निकल रहा है। अब वे अपने भविष्य के वास्तविक सवालों को सामने रखकर इस सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं। और यही से मोदी सरकार के अंत की शुरुआत होती है।
(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)