Coronavirus: भारत में अप्रैल-मई में कोरोनावायरस के मामलों में आ सकता है भारी उछाल- रिपोर्ट

Coronavirus: भारत में अप्रैल-मई में कोरोनावायरस के मामलों में आ सकता है भारी उछाल- रिपोर्ट

Coronavirus Cases: इन आंकड़ों की पुष्टि के लिए जॉन्स हॉपकिन्स और सीडीडीईपी- एक पब्लिक हेल्थ रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन – ने इंडियास्म का इस्तेमाल किया, जो भारतीय आबादी का एक अच्छी तरह से मान्य एजेंट-आधारित मॉडल है. यह मॉडल कई सालों से व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ है और सरकार के लिए नर्णय लेने के लिए उपयोगी साबित हुआ. अगले तीन महीनों में देश के लिए वास्तविक परेशानी का कारण क्या हो सकता है, प्रतिष्ठित जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय और सेंटर फॉर डिसीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (सीडीडीईपी) की एक नई रिपोर्ट में भविष्यवाणी की गई है कि भारत में अप्रैल और मई में Covid-19 के मामलों में आने वाले उछाल को रोकने में 21 दिनों का लॉकडाउन (Lockdown) भी अप्रभावी साबित हो सकता है. इस दौरान 12 करोड़ लोगों को इंफेक्शन होने की आशंका जताई है.
एक हाई परिदृश्य में (वर्तमान लॉकडाउन लेकिन अपर्याप्त शारीरिक गड़बड़ी या अनुपालन के चलते), मामलों की कुल संख्या 25 करोड़ का भारी आंकड़ा छू सकती है. वहीं मध्यम परिदृश्य में अगर सावधानयों का अनुपालन किया जाता है या वायरलेंस या तापमान/आर्द्रता संवेदनशीलता में कोई बदलाव न हो तो कुल मामलों की संख्या 18 करोड़ तक बढ़ सकती है.

आशावादी (कम) परिदृश्य का गठन कम होता गया है और तापमान/आर्द्रता संवेदनशीलता पर बनी है. इन आंकड़ों की पुष्टि के लिए जॉन्स हॉपकिन्स और सीडीडीईपी- एक पब्लिक हेल्थ रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन – ने इंडियास्म का इस्तेमाल किया, जो भारतीय आबादी का एक अच्छी तरह से मान्य एजेंट-आधारित मॉडल है. यह मॉडल कई सालों से व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ है और सरकार के लिए नर्णय लेने के लिए उपयोगी साबित हुआ.

रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल में भर्ती होने के मामले उच्च परिदृश्य में 25 लाख लोगों तक, मध्यम परिदृश्य में 17-18 लाख लोगों और कम परिदृश्य में 13 लाख लोगों तक पहुंच सकते हैं. संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया, “वेंटिलेटर की मांग 1 मिलियन होगी. भारत में वर्तमान उपलब्धता 30,000 और 50,000 वेंटिलेटर के बीच होने का अनुमान है”

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है, “स्वास्थ्य कर्मियों की मृत्यु दर सामान्य आबादी में मौतों को और बढ़ा सकती है. स्वास्थ्य कर्मियों को खुद की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (मास्क और गाउन) की आवश्यकता होती है. उनके बिना वे स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की क्षमता का जवाब देने के लिए और अधिक बीमार पड़ जाते हैं,”

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, गुजरात, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में एक-एक मौत के साथ गुरुवार को भारत में कोरोनोवायरस के मामलों की संख्या 649 तक पहुंच गई और मरने वालों की संख्या 13 हो गई. रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षण में देरी खुद को बचाने के लिए जनसंख्या की क्षमता को गंभीरता से कम कर रही है.

“कम समय में पता चले मामलों की आधिकारिक संख्या में वृद्धि से जनसंख्या को अधिक गंभीरता से लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है और यह बाद में एक बड़े स्पाइक की तुलना में घबराहट को कम करेगा. यह सबसे महत्वपूर्ण तरीका है जिसमें हम महामारी निपट सकते हैं”

उन्होंने कहा, “इस स्तर पर सीमा बंद होने का कोई असर नहीं पड़ता है और आर्थिक व्यवधान और दहशत को और मलता है. पहले चरण में अंतरराष्ट्रीय प्रसारण महत्वपूर्ण था, लेकिन घरेलू प्रसारण अब कहीं अधिक प्रासंगिक है.”

जॉन्स हॉपकिन्स-सीडीडीईपी रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ राज्यों में ट्रांसमिशन में 2 सप्ताह के बाद ही वृद्धि देखी जा सकती है. इसे रोकरने के लिए लॉकडाउन को अनुकूलित किया जाना चाहिए, इससे महामारी पर ज्यादा कंट्रोल नहीं होगा, लेकिन आर्थिक नुकसान को कम कर सकते हैं.

लॉकडाउन को परीक्षण और सीरोलॉजिकल सर्वे डेटा द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए और एक रोलिंग के आधार पर योजना बनाई जानी चाहिए, रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि केस लोड के लिए तैयारियों को जोड़ना इस समय सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.

उल्लेखित रिपोर्ट में कहा गया है, “तापमान और आर्द्रता बढ़ने से हमें केस लोड को कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि सबूत सीमित हैं, यह प्रशंसनीय है.”

चीन के साक्ष्य से संकेत मिलता है कि उच्च तापमान और आर्द्रता से संचरण दर कम होने की संभावना है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि “यह भारत के संदर्भ में कैसे अनुवादित होगा”(साभार -एनडीटीवी )

 

 

इस रिपोर्ट ने भारत सरकार को चेताया था

16-04-2019 को

सीडीडीईपी रिपोर्ट: भारत में डॉक्टर्स पर आयी रिपोर्ट क्या कहती है?


जिस देश की आबादी 135 करोड़ से अधिक हो वहां सभी जरूरी सुविधाएं और रोज़गार पैदा करना दुनिया के किसी भी बड़े चैलेंज से कम नहीं है। आज़ादी के बाद हमारे देश में जिस गति से विकास होना चाहिए था नहीं हो पाया। इसका प्रमुख कारण सरकारों का कमजोर विजन रहा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से भारत ने हर क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन अभी भी कई क्षेत्रों में बहुत काम किया जाना बाकी है। मेडिकल क्षेत्र में भी इनमें से एक है। हाल में डॉक्टर्स पर एक रिपोर्ट जारी हुयी है, जिसमें चिकित्सा क्षेत्र के नवीनतम आंकड़ों के बारे में बताया गया है। आइये जानते हैं इस रिपोर्ट में क्या है..

भारत में डॉक्टर्स और नर्सों की भारी कमी
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में अनुमानित तौर पर छह लाख डॉक्टर और 20 लाख नर्सों की कमी है। रिसचर्स का मानना है कि भारत में एंटीबायोटिक दवाएं देने के लिए उचित तरीके से प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है। इसके कारण जीवन बचाने वाली दवाएं मरीजों को नहीं मिल पाती हैं। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (सीडीडीईपी) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लोगों को बीमारी पर होने वाला 65 फीसद खर्च खुद उठाना पड़ता है। इसके कारण हर साल 5.7 करोड़ लोग गरीबी से ज्यादा गरीबी की ओर जा रहे हैं। दुनियाभर में हर साल 57 लाख ऐसे लोगों की मौत होती है, जिन्हें एंटीबायोटिक दवाओं से बचाया जा सकता था। गौरतलब है कि ऐसी मौतें अक्सर कम और मध्यम आय वाले देशों में ज्यादा होती हैं।सीडीडीईपी ने हाल में भारत, यूगांडा और जर्मनी में हितकारों का इं​टरव्यू किया था। इसमें उसने सामग्री का अध्ययन कर कम, मध्य और उच्च आय वाले देशों में उन पहलुओं की पहचान की, जिनके कारण मरीज को एंटीबायोटिक दवाएं नहीं मिलती हैं। सीडीडीईपी में निदेशक रमणन लक्ष्मीनारायण ने कहा कि एंटीबायोटिक दवा के प्रतिरोध से होने वाली मौतों की तुलना में इसके नहीं मिलने के कारण ज्यादा लोगों की डेथ हो रही हैं।एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर की सिफारिश
हमारे देश में फिलहाल करीब 10,189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़ हर एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर की होना चाहिए। इस तरह भारत की जनसंख्या के हिसाब से देश में छह लाख डॉक्टरों की कमी मानी जा सकती है। वहीं, अगर नर्सों की बात करे तो देश में हर 483 लोगों पर एक नर्स है। इस हिसाब से फिलहाल 20 लाख सरकारी नर्सों की कमी चल रही है। हालांकि केन्द्र और राजय सरकारें लगातार प्रयास कर रही है कि मेडिकल स्टाफ की जरूरत को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके

भारत में छह लाख डॉक्टरों और 20 लाख नर्सों की कमी
भारत में छह लाख डॉक्टरों और 20 लाख नर्सों की कमी है. भारत में हर 10,189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हर एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर की सिफारिश की है. इस तरह भारत में छह लाख डॉक्टरों की कमी है. भारत में हर 483 लोगों पर एक नर्स है यानी 20 लाख नर्सों की कमी है.

अमेरिका के ‘सेंटर फॉर डिज़ीज़ डाइनामिक्स, इकॉनॉमिक्स एंड पॉलिसी’ (सीडीडीईपी) की रिपोर्ट के मुताबिक एंटीबायोटिक उपलब्ध हो तब भी भारत में लोगों को बीमारी पर 65 फीसदी खर्च खुद उठाना पड़ता है. यह हर साल 5.7 करोड़ लोगों को गरीबी के गर्त में धकेलता है.

सीडीडीईपी की रिपोर्ट में ये बातें सामने आई हैं:-

1 भारत में छह लाख डॉक्टरों और 20 लाख नर्सों की कमी है

2 भारत में बीमारी पर 65 फीसदी खर्च खुद उठाना पड़ता है.

3 भारत में बीमारी की वजह से 5.7 करोड़ लोग को गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं.

4 एंटीबायोटिक दवाइयों के लिए प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है.

5. एंटीबायोटिक दवाई नहीं मिलने की वजह से दुनियाभर में हर साल 57 लाख लोगों की मौत होती है.

वैज्ञानिकों ने पाया है कि भारत में एंटीबायोटिक दवाइयां देने के लिए उचित तरीके से प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है जिससे जीवन बचाने वाली दवाइयां मरीजों को नहीं मिल पाती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में हर साल 57 लाख ऐसे लोगों की मौत होती है जिन्हें एंटीबायोटिक दवाइयों से बचाया जा सकता था. यह मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं. ये मौतें एंटीबायोटिक प्रतिरोधी संक्रमणों से हर साल होने वाली अनुमानित 700,000 मौतों की तुलना में अधिक हैं.

सीडीडीईपी ने यूगांडा, भारत और जर्मनी में बातचीत और सामग्री का अध्ययन कर कम, मध्य और उच्च आय वाले देशों में उन पहलुओं की पहचान की जिनके चलते मरीज को एंटीबायोटिक दवाएं नहीं मिलती हैं.

सीडीडीईपी के निदेशक रमणन लक्ष्मीनारायण ने कहा कि एंटीबायोटिक दवाई के प्रतिरोध से होने वाली मौतों की तुलना में एंटीबायोटिक नहीं मिलने से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो रही है.

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