दशलक्षण पर्व 2024: धर्म के दस पड़ाव और खुद से मिलने की एक अनोखी यात्रा

दशलक्षण पर्व 2024: धर्म के दस पड़ाव और खुद से मिलने की एक अनोखी यात्रा

कृति आरके जैन द्वारा लिखित आलेख में बताया गया है कि आज मनुष्य अपने घर और परिवेश को साफ रखने में सजग है, लेकिन अपने भीतर की अशांति से अनजान है। दिगंबर जैन समाज का दशलक्षण पर्व इसी भीतर की सफाई का एक बहुत बड़ा अवसर है। यह पर्व 16 सितंबर से 25 सितंबर तक चलता है। यह पर्व क्रोध, अहंकार, छल, लोभ और आसक्ति जैसी प्रवृत्तियों को पहचानने और उन्हें संयमित करने की पूरी प्रेरणा देता है। भौतिक सुविधाएं बहुत अधिक बढ़ने के बावजूद यदि आज मन अशांत है और रिश्ते लगातार कमजोर हो रहे हैं, तो कमी बाहर बिल्कुल नहीं है बल्कि हमारे भीतर ही है। दशलक्षण पर्व हम सभी को इसी सत्य की ओर वापस लौटने और अपने विचार, व्यवहार व जीवन को गहराई से परखने का अवसर प्रदान करता है।

दशलक्षण के दस जीवन-सूत्र

दशलक्षण पर्व की असली शक्ति उसके दस नामों में नहीं बल्कि उन जीवन-सूत्रों में छिपी है जो मनुष्य की कमजोरियों को कड़ी चुनौती देते हैं। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य—ये सभी किसी आदर्शलोक की बातें नहीं हैं बल्कि हमारे दैनिक जीवन की बहुत बड़ी जरूरत हैं। क्रोध आने के समय क्षमा की जरूरत होती है, अहंकार के बीच में मार्दव की जरूरत होती है, छल के बीच में आर्जव की जरूरत होती है और झूठ के शोर के बीच में केवल सत्य की जरूरत होती है। शौच मन और शरीर दोनों की निर्मलता सिखाता है, संयम और तप हमारी इच्छाओं पर अंकुश लगाते हैं, त्याग और आकिंचन्य संग्रह-वृत्ति से मुक्ति दिलाते हैं तथा ब्रह्मचर्य हमें आत्मनियंत्रण का सही बोध कराता है। इसलिए इन सभी दस धर्मों का क्रम केवल कोई धार्मिक विधान नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के चरित्र को भीतर से अनुशासित करने की एक सुविचारित प्रक्रिया है।

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कर्म-सिद्धांत और आत्मनिरीक्षण

मनुष्य दूसरों की गलतियां गिनने में जितना अधिक तत्पर रहता है, उतना कभी भी अपने भीतर झांकने में तत्पर नहीं होता है। दशलक्षण पर्व हम सबकी इसी आदत को पूरी तरह से बदलने का एक अवसर देता है। दिगंबर दर्शन में कर्म-सिद्धांत इसकी मुख्य दार्शनिक आधारभूमि है जिसके तहत हर विचार और कर्म हमारी आत्मा पर सूक्ष्म कर्म-आवरण डालता है। यह आवरण ही हमारे दुख और पुनर्जन्म के बंधन का मुख्य कारण बनता है। यही कारण है कि इस पर्व के दौरान आत्मनिरीक्षण करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। व्यक्ति अपने दैनिक व्यवहार का पूरा लेखा-जोखा करता है, अपनी भूल को खुले दिल से स्वीकारता है और भविष्य में सुधार करने का पक्का संकल्प लेता है। इसका सामाजिक प्रभाव भी बिल्कुल स्पष्ट है क्योंकि जिम्मेदारी स्वीकार करने से आपसी दोषारोपण और संघर्ष काफी हद तक घट जाते हैं।

इच्छाओं पर नियंत्रण और तप का महत्व

जब आज का बाजार हमारी हर इच्छा को तुरंत पूरा करने का वादा कर रहा हो, तब उपवास एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। यह प्रश्न है कि क्या हमारी हर इच्छा का पूरा होना सचमुच जरूरी है? दशलक्षण पर्व में तप और उपवास इसी एक प्रश्न का सही उत्तर पूरी शिद्दत से खोजते हैं। दिगंबर अनुयायी अपनी व्यक्तिगत क्षमता और अपने दृढ़ संकल्प के अनुसार पूर्ण या आंशिक व्रत को अपनाते हैं। इस सबका मुख्य उद्देश्य शरीर को बिल्कुल भी कष्ट देना नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण पाना है। अपनी इच्छाओं को रोकना हमारे मन को यह पक्का बोध कराता है कि वह इन इच्छाओं का गुलाम नहीं है। ध्यान, स्वाध्याय और तत्त्वार्थ सूत्र जैसे महान ग्रंथों के अध्ययन से हमारा ज्ञान और अधिक गहरा होता जाता है।

क्षमा और आपसी संबंधों की मजबूती

क्षमा मनुष्य द्वारा अपने ही लिए किया जाने वाला सबसे बड़ा और महान उपकार होता है। वैर-भाव दूसरे से कहीं अधिक उस मन को जलाता है जिस मन के भीतर वह लगातार पलता रहता है। दशलक्षण पर्व की क्षमापना हम सबको इसी पुरानी गांठ को पूरी तरह से खोलने का एक बेहतरीन अवसर देती है। उत्तम क्षमा केवल कोई औपचारिक उच्चारण नहीं है, बल्कि यह अपने किए या अनकिए सभी अपराधों को खुले दिल से स्वीकारने का भाव है। क्षमा का सबसे पहला कदम अपनी भूल मानने का पूरा साहस जुटाना है और यही बात इसे सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक मुक्ति बनाती है। आज के सोशल मीडिया के दौर के विवाद, कटु टिप्पणियां और आपसी मतभेद बहुत जल्दी वैमनस्य में बदल जाते हैं। ऐसे कठिन समय में क्षमा ही वह एकमात्र शक्ति है जो हमारे टूटे हुए संबंधों को आपस में फिर से जोड़ने का काम करती है।

सामूहिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण

धर्म तब वास्तव में जीवंत होता है जब वह केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित न रहकर समाज की सामूहिक चेतना बन जाए। दशलक्षण के दौरान किए जाने वाले जिनालय दर्शन, सामूहिक पूजा, प्रवचन और साधु-संतों का मार्गदर्शन इस चेतना को और मजबूत करते हैं। ये सभी आयोजन केवल धार्मिक गतिविधियां मात्र नहीं हैं, बल्कि यह हमारे नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारने के साझा मंच हैं। सामूहिक सहभागिता मनुष्य को अकेलेपन की भावना से बचाती है और हमेशा अच्छे मूल्यों पर टिके रहने का बहुत बड़ा संबल देती है। यही चेतना आगे चलकर अहिंसा के रूप में और अधिक व्यापक हो जाती है। जैन दृष्टि में अहिंसा का अर्थ केवल मनुष्य के प्रति सद्भाव नहीं है, बल्कि यह समस्त जीव-जगत के प्रति गहरी संवेदनशीलता है। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना, वृक्षारोपण करना और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना इसी अहिंसा का स्वाभाविक विस्तार है।

त्याग और आकिंचन्य से जीवन की मुक्ति

जीवन में चीजों का संग्रह लगातार बढ़ता जाता है और जिसे हम अपना मानकर जोड़े रखते हैं, वही धीरे-धीरे हमारे लिए एक भारी बोझ बन जाता है। दशलक्षण पर्व का त्याग और आकिंचन्य हमें इसी भारी बोझ से पूरी तरह मुक्त होने का सही मार्ग दिखाते हैं। दान और परोपकार की भावना इस पूरे विचार को एक बहुत बड़ा सामाजिक स्वरूप प्रदान करती है। निस्वार्थ भाव से किया गया दान जरूरतमंद की सहायता तो करता ही है, साथ ही दाता के मन में उदारता और संग्रह से विरक्ति का भाव भी जगाता है। सामाजिक असमानता के बीच संसाधनों का न्यायपूर्ण और सही वितरण हमारे समाज में संतोष और आपसी सहयोग को काफी बढ़ा सकता है। दिगंबर परंपरा का यह सादगीपूर्ण दान इसी विचार पर पूरी तरह आधारित है कि वस्तुओं का संचय कभी भी सुख की असली गारंटी नहीं होता है। वास्तविक सुख मनुष्य को तब मिलता है जब उसके पास मौजूद वस्तुओं में किसी और का भी हिस्सा होने का सुंदर भाव जाग उठे।

निष्कर्ष

दशलक्षण केवल मात्र दस दिनों का कोई साधारण धार्मिक अनुशासन नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे जीवन की दिशा बदलने का एक अनूठा अवसर है। 16 सितंबर से 25 सितंबर तक चलने वाला यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर गहराई से झांकने की प्रेरणा देता है। यह पर्व क्रोध, अहंकार, छल, असंयम, लालच और आसक्ति जैसी तमाम बुरी प्रवृत्तियों को आसानी से पहचानने का अवसर प्रदान करता है। क्षमा हमारे क्रोध को पूरी तरह शांत करती है, मार्दव और आर्जव हमारे व्यक्तित्व को सरल बनाते हैं, सत्य और शौच इसे निर्मल करते हैं। संयम और तप हमारी सभी इच्छाओं को एक सही सीमा देते हैं तथा त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य हमें हर प्रकार की आसक्ति से मुक्ति दिलाते हैं। इसका गहरा प्रभाव एक व्यक्ति से शुरू होकर उसके परिवार और अंत में पूरे समाज तक बहुत दूर तक पहुंचता है। इसलिए दशलक्षण पर्व की असली सार्थकता पूजा पाठ के बाद समाप्त नहीं होती, बल्कि तब शुरू होती है जब दस दिनों के बाद भी क्षमा हमारे स्वभाव में हमेशा बनी रहे।

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