दिल्ली हॉस्टल हादसे और जेन-जी की नाराजगी पर विशेष रिपोर्ट: व्यवस्था और राजनीति पर उठे गंभीर सवाल

दिल्ली में एक हॉस्टल गिरने की घटना में पांच छात्रों की मौत हो गई है। इस हादसे में पांच युवाओं के सपने और पांच परिवारों के अरमान बिल्डिंग के मलबे में पूरी तरह दफन हो गए हैं। इसके बाद सरकार ने क्या-क्या कदम उठाए होंगे, यह बात किसी भी बच्चे से पूछ ली जाए तो वह सारी कार्रवाई क्रम से बता देगा। दरअसल इस तरह की औपचारिकताएं देश के हर राज्य में और हर बड़ी घटना के बाद दोहराई जाती हैं। इसलिए अब यह प्रक्रिया लोगों को पूरी तरह रट चुकी है। किसी भी राज्य में और किसी भी सरकार को कभी भी हादसों से किसी तरह का सबक लेते हुए नहीं देखा गया है। एक नया हादसा होना, उसके बाद कुछ कार्रवाई होना और कुछ ही दिनों में सब कुछ बराबर हो जाना ही आज के समय की नियति बन चुका है। दिल्ली शहर में बिल्डिंग गिरने का यह केवल एक साल के भीतर छठवां मामला सामने आया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में तो यहां तक बड़ा दावा किया गया है कि पिछले 10 साल के दौरान एक हजार से अधिक ऐसे हादसे हो चुके हैं। लेकिन कभी ऐसा नहीं देखा गया कि सरकार इस प्रकार की घटना दोबारा कभी न हो सके, इसके लिए ठोस कदम उठाए।
हादसों के बाद प्रशासनिक लापरवाही और लीपापोती
केवल बिल्डिंग गिरना ही एकमात्र समस्या नहीं है, बल्कि मंदिरों के भीतर भगदड़ मचना, बसों में ओवरलोडिंग होना या फिर बसों का ओवर स्पीड में चलना जैसे किसी भी तरह के हादसे क्यों न हों, सरकार हमेशा हादसे के बाद कुछ ही देर तक जागी हुई दिखाई देती है। यह तर्क पूरी तरह से दिया जा सकता है कि हर एक छोटे-बड़े हादसे के लिए सीधे तौर पर सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। यह तर्क पूरी तरह से मंजूर भी किया जा सकता है, लेकिन क्या कभी किसी बड़े हादसे के बाद वास्तविक जिम्मेदारों के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई की गई है जो एक बड़ा मिसाल बन सके? क्या कभी ऐसा हुआ है कि लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों के दिलों में किसी कार्रवाई का कोई खौफ पैदा हुआ हो? हादसे के तुरंत बाद जिन प्रशासनिक अधिकारियों को लापरवाही के लिए पूरी तरह जिम्मेदार मानते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है, वे अधिकारी कुछ ही दिनों के भीतर न केवल वापस प्रशासनिक मशीनरी का हिस्सा बन जाते हैं, बल्कि कई उदाहरण तो ऐसे भी देखने को मिले हैं कि वे अधिकारी दूसरी बार और भी ज्यादा बड़े औहदे और ताकत کے साथ वापस लौटते हैं।
देशभर के हॉस्टल्स की बदहाली और अदालती टिप्पणियां
बहरहाल, अगर फिलहाल केवल दिल्ली के इस हॉस्टल मामले की ही बात कर ली जाए तो सरकारी और प्रशासनिक तंत्र का सारा निकम्मापन पूरी तरह से खुलकर सामने आ जाएगा। दिल्ली के इस हॉस्टल मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने बेहद अहम बात कही है। दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि इस भयानक हादसे के लिए अकेले दिल्ली नगर निगम और दिल्ली यूनिवर्सिटी दोनों ही पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। अदालत ने यह भी कहा कि देश के दूसरे शहरों से आकर पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए बने इन हॉस्टलों की मौजूदा हालत बेहद दयनीय और खराब स्थिति में है। सरकार अपनी इन सभी बुनियादी जिम्मेदारियों से किसी भी कीमत पर नहीं बच सकती है। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी किसी भी तरह की खीज का कोई नतीजा नहीं है, बल्कि यह देशभर के तमाम हॉस्टल्स की बिल्कुल सच्ची और कड़वी हकीकत है। इसके लिए बहुत ज्यादा जांच पड़ताल करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, आप केवल गूगल करके देख सकते हैं कि आज देश के हॉस्टल्स किस तरह से चलाए जा रहे हैं।
विभिन्न शहरों के हॉस्टल्स में छात्रों का लगातार विरोध प्रदर्शन
बेंगलुरु की दयानंद सागर यूनिवर्सिटी के एस-रेसिडेंसेस हॉस्टल में वाई-फाई काम न करने की समस्या, गर्म पानी न मिलने की मुसीबत, गंदे पानी की आपूर्ति, खराब लिफ्ट और साफ-सफाई बिल्कुल न होने जैसी गंभीर समस्याओं से परेशान होकर सैकड़ों छात्रों ने जोरदार प्रदर्शन किया था। सूरत और देश के अन्य शहरों में स्थित समरस गर्ल्स हॉस्टल में खाने के भीतर कीड़े मिलने, पानी की भारी किल्लत और बदइंतजामी के खिलाफ छात्राओं को सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा। भोपाल के कमला नेहरू गर्ल्स हॉस्टल और बीएचयू के तमाम हॉस्टल्स में भी भारी बदहाली और जरूरी सुविधाओं के घोर अभाव को लेकर छात्रों का भयंकर गुस्सा पहले ही फूट चुका है। सीहोर की वीआईटी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में तो सैकड़ों छात्र गंदा पानी पीने की वजह से गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। जब इन छात्रों ने इसके खिलाफ हंगामा किया तो उन्हीं पीड़ित छात्रों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करा दी गई। देवास की अमलतास यूनिवर्सिटी में भी छात्रों को गर्मी के दिनों में दोपहर के समय बिजली न मिलने की वजह से मजबूर होकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा था। ऐसी दर्जनों जानकारियां आज पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
सियासत और जेन-जी की मौजूदा स्थिति
लेकिन लगभग इन सभी मामलों में सरकारें हमेशा दिखने के लिए तो छात्रों के साथ खड़ी नजर आती हैं, लेकिन असलियत में वे हमेशा कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट के साथ खड़ी होती हैं। आजकल की पूरी सियासत खुद को छात्रों का असली रहनुमा साबित करने के लिए केवल एक बड़ी नौटंकी कर रही है। सबसे दिलचस्प बात यह देखने को मिल रही है कि यह सब कुछ तब हो रहा है जब देश के कई हिस्सों में जेन-जी पीढ़ी बुनियादी असुविधाओं के खिलाफ सड़कों पर खुलकर उतर रही है। आज जेन-जी पीढ़ी को लगातार यह बताया जा रहा है कि वही इस देश का आने वाला भविष्य हैं। उन्हीं नौजवानों को मिलकर एक विकसित भारत के सपने को पूरी तरह से साकार करना है। इसके साथ ही एक छिपी हुई बड़ी शर्त यह भी है कि बाबू इसका किसी भी तरह का श्रेय तुम्हें नहीं मिलने वाला है। जंतर-मंतर पर हुए बड़े प्रदर्शन के बाद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा फोकस अब जेन-जी पर ही बना हुआ है। वे सोशल मीडिया के लिए खास वीडियो बना रहे हैं और एक सप्ताह के भीतर दो-दो बार जेन-जी से सीधा संवाद कर रहे हैं।
राजनीतिक दल और शिक्षा व्यवस्था का हाल
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी देश भर में छात्रों की इस गूंज को जोर-शोर से सुना रहे हैं। लेकिन आज की पूरी सियासत देश के हालात को बदलने की बजाय केवल छात्रों की मानसिकता को बदलने की कोशिशों में पूरी तरह से जुटी हुई है। बीजेपी और आरएसएस जैसे संगठन स्कूलों के भीतर पढ़ रहे छात्रों की सूरत में अपने पक्के वोटर देख रहे हैं। उनकी पूरी कोशिश यही है कि चाहे स्कूल बंद होते रहें, परीक्षाओं के पेपर लीक होते रहें, परीक्षा का रिजल्ट समय पर न आए, चार साल की डिग्री को पूरा होने में छह साल का समय लग जाए और छात्र ओवर ऐज होने के गम में भले ही मर जाएं, लेकिन जेन-जी को किसी भी हालत में नाराज नहीं होना चाहिए। लेकिन अगर आपको देश की सरकारों और यहां की राजनीति पर गहरा गुस्सा आ रहा है तो एक बार थोड़ा ठहरिए। क्या इन सरकारों को कभी जवाबदेह बनाया जा सके, इसके लिए क्या कहीं भी मजबूती के साथ कोई नागरिक पहल दिखाई दी है? हाल ही में या कुछ पिछले कुछ सालों के दौरान छात्रों, किसानों या फिर अन्य नागरिक संगठनों ने जो भी जरूरी सवाल उठाए हैं, क्या उनके समर्थन में समाज की कोई व्यापक सहभागिता कभी नजर आई है?
स्कूलों के बंद होने और बुनियादी संकट पर सन्नाटा
राजनीतिक मसलों से अपनी दूरी बनाए रखना तो किसी हद तक पूरी तरह से समझा जा सकता है, लेकिन समाज से जुड़ा हुआ आखिर ऐसा कौन सा विषय है जिस पर पूरा समाज कभी एकमत और सहमत दिखाई दिया हो? केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूडाइस प्लस रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार पूरे देश भर में एक ही साल के भीतर 4,791 सरकारी स्कूलों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया या फिर उन्हें दूसरे स्कूलों में मर्ज कर दिया गया। इनमें अकेले मध्य प्रदेश राज्य के 2,426 सरकारी स्कूल शामिल हैं। वर्ष 2025-26 के दौरान पूरे देश में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या घटकर 14,66,682 ही रह गई है, जबकि इसके पिछले साल यह कुल संख्या 14,71,473 हुआ करती थी। इतने बड़े पैमाने पर स्कूलों के बंद होने के बावजूद देश भर में पूरी तरह से गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है। इसके बिल्कुल उलट कुछ लोग ऐसे भी हैं जो लगातार शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य की मांग करने वाले लोगों के विरोध में ही खड़े हो जाते हैं। जिन्हें यह बात लगती है कि देश के स्कूल हमेशा खराब हालत में रहें, लगातार बंद होते रहें और अस्पताल भी पूरी तरह बदहाल रहें तब भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, आखिर वे लोग कौन हैं?
सड़कों की खस्ताहाल स्थिति और देश का आर्थिक बोझ
समाज के बुनियादी मुद्दों को सीधे राष्ट्रवाद और धर्म के साथ जोड़कर जो लोग सनातन धर्म की आड़ में बड़े नेताओं के नाम पर सरेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं और स्थापित विधान को खुली चुनौती दे रहे हैं, आखिर वे लोग कौन हैं? क्या वे लोग कहीं बाहर किसी दूसरे देश से आए हैं या फिर वे इसी समाज का एक अभिन्न हिस्सा हैं? जिन सड़कों पर अभी कुछ ही दिन पहले बहुत बड़ा नाज किया जा रहा था, जिन्हें देश की तरक्की का मुख्य तंत्र बताया जा रहा था, जिन सड़कों पर कार के अंदर बैठकर आराम से चाय पीने का बड़ा आनंद लेने और गाड़ी से पानी की एक बूंद भी बाहर न छलकने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे, आज वही सभी सड़कें पूरी तरह से छलनी हो रही हैं। बड़े-बड़े ब्रिज आज धंस रहे हैं, सड़कें आवारा मवेशियों से पूरी तरह से भरी पड़ी हैं और सड़क दुर्घटनाओं में देश के आम लोग अपनी जान गंवा रहे हैं और मवेशी भी मारे जा रहे हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि सड़क हादसों में अपनी जान गंवाने वाले लोगों में सबसे अधिक संख्या इसी जेन-जी वर्ग के युवाओं की होती है।
महंगाई, बेरोजगारी और पेपर लीक की गंभीर समस्याएं
रोजमर्रा उपयोग में आने वाली सभी आवश्यक वस्तुओं के दाम लगातार अपने सभी पुराने चरम स्तरों को पार करके आगे निकल चुके हैं। देश के सिर पर कर्ज का बोझ लगातार काफी तेजी के साथ बढ़ता जा रहा है। सरकारी क्षेत्र के भीतर रोजगार के नए अवसर लगातार बहुत तेजी से घटते जा रहे हैं, जबकि निजी क्षेत्र भी इस मामले में बहुत फूंक-फूंककर अपने कदम रख रहा है। देश भर में दर्जनों प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजे पिछले काफी लंबे समय से लगातार लटके हुए हैं। नर्सिंग जैसा एक महत्वपूर्ण चार साल का प्रोफेशनल कोर्स आज छह साल बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो पा रहा है। देश के कुल 19 राज्यों में बड़े पैमाने पर पेपर लीक होने के गंभीर मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए जा चुके हैं। राज्य-दर-राज्य हर रोज घूसखोरी और भयंकर भ्रष्टाचार के नए मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इन सबके बावजूद यदि देश की सरकारें हर समय केवल सनातन का शंख फूंकने में ही पूरी तरह से लगी हुई हैं, तो यह बात बिल्कुल साफ है कि सरकार यह अच्छी तरह मान चुकी है कि देश की जनता तरक्की के किसी तंत्र पर नहीं बल्कि केवल धार्मिक मंत्रों पर ही बहुत ज्यादा मोहित होती है।
धार्मिक राजनीति और वैचारिक विरोधाभास
थोड़ा सोचिए कि जब शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देने की बजाय राजनीति केवल धार्मिक आयोजनों के बल पर ही फल-फूल रही है, तो ऐसी स्थिति में किसी भी राजनीतिक पार्टी को और आखिर क्या करना चाहिए? कोई भी राजनीतिक दल हमेशा वही काम करता है जिससे उसे चुनाव के समय ज्यादा से ज्यादा वोट मिल सकें। अपनी चुनावी जरूरतों के हिसाब से पश्चिम बंगाल राज्य के भीतर मछली और भात बड़े चाव से खाया जा सकता है, लेकिन उत्तर प्रदेश राज्य में मछली के भोज को लेकर बड़े गंभीर सवाल उठाए जा सकते हैं। देश में गाय कहीं पर लोगों की गहरी आस्था का बड़ा विषय बनी हुई है तो कहीं पर वह केवल व्यापार की एक बड़ी जरूरत मात्र बनकर रह गई है। कानून का एक जगह पर बहुत सख्ती के साथ पालन करवाया जाता है तो दूसरी जगह पर उसे पूरी तरह से ढीला छोड़ दिया जाता है। संवैधानिक शक्तियों के सही उपयोग से लेकर उनके खुलेआम दुरुपयोग तक सब कुछ आज देश में सरेआम हो रहा है। देश की सेना के भीतर भी आज यही जेन-जी पीढ़ी के युवा अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
सेना का अपमान और बयानों की राजनीति
एक तरफ तो देश की सेना की हर तरफ बहुत जय-जयकार की जाती है, तो दूसरी तरफ देश के ही सैन्य अधिकारियों को आतंकवादियों का सीधा रिश्तेदार तक बताया जा रहा है। मध्य प्रदेश के एक मंत्री कुंवर विजय शाह ने सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में बहुत ही गलत बयानबाजी की थी। उस मंत्री ने देश की महिला कर्नल को आतंकवादियों की अपनी बहन तक करार दे दिया था। अगर यही बात देश की किसी अन्य विपक्षी पार्टी के किसी नेता द्वारा कही गई होती तो देश का पूरा राष्ट्रवाद तुरंत चोटिल हो जाता और सेना का बड़ा अपमान मान लिया जाता। ऐसे बयानों के बाद तुरंत बड़े-बड़े मुकदमे शुरू हो जाते। लेकिन चूंकि वह बयान देने वाला उनका अपना ही मंत्री है, इसलिए सरकार उस मंत्री के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने की अनुमति देने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हो रही है। एक ही समय पर देश के अंदर कई तरह की अलग-अलग बातें सरेआम की जा रही हैं। एक तरफ तो बड़ी-बड़ी नसीहतें दी जाती हैं कि जो लोग यह चाहते हैं कि मुसलमान भारत देश में बिल्कुल न रहें, वे लोग कभी सच्चे हिन्दू नहीं रह सकते हैं।
धार्मिक ध्रुवीकरण और नफरत भरे आह्वान
लेकिन दूसरी तरफ देश के मुसलमानों को सरेआम गरियाने में लोगों को रत्तीभर भी संकोच महसूस नहीं होता है। मुस्लिम बहुल मोहल्लों के भीतर मिसाइलें गिराने तक के खुलेआम भड़काऊ आह्वान किए जा रहे हैं। हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले कई बड़े नेता तो आज यहां तक खुलकर कह चुके हैं कि उन्हें देश के मुसलमानों के वोटों की अब कोई जरूरत ही नहीं है। देश का एक मुख्यमंत्री तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे प्रसिद्ध नारे 'सबका साथ और सबका विकास' को भी पूरी तरह से गलत बता चुका है। उनका अपना यह मानना है कि विकास केवल उन्हीं लोगों का होना चाहिए जो पूरी तरह से उनके अपने साथ हैं। हालांकि जब उन्होंने यह बात कही थी तब वे किसी राज्य के मुख्यमंत्री नहीं थे। कुछ लोग इस तरह का तर्क भी देते हैं कि वे केवल अपनी वैचारिक सोच के हिसाब से ही अलग-अलग राजनीतिक दलों का खुलकर समर्थन करते हैं। इस बात में कोई बहुत बड़ी बुराई भी नहीं है, क्योंकि हर इंसान किसी न किसी वैचारिक सोच का समर्थक जरूर होता है। लेकिन आखिर यह किसकी ऐसी विकृत विचारधारा हो सकती है जो यह चाहती है कि देश के बच्चे अच्छे स्कूलों में बिल्कुल न पढ़ सकें?
बुनियादी सवालों से भटकाव और समाज की जिम्मेदारी
देश के आम लोगों को अच्छा इलाज और स्वास्थ्य सुविधाएं कभी न मिल सकें, आम जनता हमेशा महंगाई की आग में बुरी तरह से पिसती रहे और अपनी एक-एक छोटी जरूरत के लिए दर-दर की ठोकरें खाती रहे? यह बात पूरी तरह से निर्विवाद है कि दुनिया का कोई भी इंसान, संस्था या समुदाय कभी भी इस तरह की घटिया विचारधारा का समर्थक नहीं हो सकता है। फिर आखिर शिक्षा का सही सवाल उठाने वाले लोगों का सनातन धर्म के नाम पर सरेआम सिर फोड़ना किस प्रकार की विचारधारा का खुला समर्थन है? जंतर-मंतर की सड़कों पर देश के लड़के लगातार चिल्लाकर यह बात कहते रहे कि सादे कपड़ों में आए कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने उन पर कायराना हमले किए हैं, लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी। अब उन्हीं हमलावरों में से एक शख्स इस बात की बड़ी शेखी बघार रहा है कि उसने किस तरह से सनातन धर्म की बहुत रक्षा की है। चाहे परीक्षाओं का पेपर लीक हुआ हो या फिर पेपर की खुली लूट मची हो, सरकार या विपक्ष से किसी भी तरह का कड़ा सवाल पूछने से पहले समाज की पूरी ठेकेदारी लेने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि वे अपनी खुद की औलादों को आखिर कितने अलग-अलग हिस्सों में बांटकर रखना चाहते हैं?
समाज का विभाजन और बदलाव की मुख्य शर्त
समाज का यह आपसी विभाजन ही आज राजनीति की इस बेरहमी को बहुत ज्यादा बढ़ावा देने का काम कर रहा है। यदि देश के बुनियादी मुद्दों पर पूरे समाज के भीतर एकरूपता आ जाए तो वह राजनीति को हमेशा कायदे में रखने का काम करती है। तब दुनिया में किसी की भी इतनी बड़ी हैसियत नहीं रह जाएगी कि वह इस समाज की सामूहिक इच्छा के विरुद्ध जाकर कुछ भी गलत कर डाले। इसलिए आज का सबसे बड़ा बुनियादी सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि राजनीति हमारे समाज को आपस में बांटने का काम कर रही है। असली सवाल तो यह है कि हमारे समाज के भीतर आखिर कौन सी ऐसी ग्रंथी मौजूद थी जिसमें नफरत का इतना सारा जहर पहले से ही भरा हुआ था? यही जहर आज राजनीतिक हथकंडों के भारी दबाव की वजह से पूरी तरह से फूटकर हमारे पूरे देश के माहौल को जहरीला बना रहा है। देश की सरकारें जो कुछ भी करती हैं, वे यह अच्छी तरह समझते हुए करती हैं कि यही इस देश की आम जनभावना बन चुकी है। जिस दिन देश की आम जनता की भावनाओं के भीतर व्यापक रूप से देश को सुधारने की असली झलक दिखने लगेगी, उसी दिन से हमारा यह देश सुधरना शुरू हो जाएगा और हमारी तमाम व्यवस्थाएं भी अपने आप बेहतर होने लगेंगी। राजनीतिक समर्थन या विरोध करना अपनी जगह पर पूरी तरह से ठीक है, लेकिन इस देश और समाज की वास्तविक बेहतरी के लिए हमेशा सही को सही और गलत को गलत कहना ही सबसे पहली और अनिवार्य शर्त होती है। राजनीति के लिए कभी भी किसी इंसान की कोई व्यक्तिगत जरूरत कोई मायने नहीं रखती है, बल्कि उसके द्वारा उठाए गए कड़े सवाल ही हमेशा सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। आज भी देश की सरकारें बिल्कुल उसी पुराने ढर्रे पर लगातार आगे बढ़ रही हैं। देश की युवा पीढ़ी यानी जेन-जी की असली जरूरतें क्या हैं, इस बात की फिक्र सरकारों को बहुत कम है, बल्कि उनकी नाराजगी से होने वाले नुकसान की फिक्र सरकारों को सबसे ज्यादा सताती है। आज इसी एक बड़ी कसौटी पर पूरे समाज को खुद को बहुत अच्छी तरह से परखना चाहिए कि आखिर आज वह इस देश में कहां पर खड़ा है।