दिल्ली प्रेस क्लब में मोदी चालीसा, वीडियो पर विवाद

दिल्ली प्रेस क्लब में मोदी चालीसा, वीडियो पर विवाद

राजनीतिक गलियारों में बयानों और प्रतीकों की राजनीति नई बात नहीं है, लेकिन हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस बहस को एक बार फिर तूल दे दिया है। एक स्थानीय कार्यक्रम के दौरान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशालकाय कटआउट और पोस्टर लगाए गए, जिनमें उन्हें भगवान श्री राम के रूप में दर्शाया गया था। पोस्टर में पीएम मोदी के हाथों में धनुष-बाण और सिर पर मुकुट सुशोभित था।

नई दिल्ली /21 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

नई दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटआउट के सामने आरती और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किया जाता दिखाई दे रहा है। कटआउट में नरेंद्र मोदी को भगवान राम के रूप में दिखाया गया है। इस दौरान कुछ लोग धार्मिक अंदाज में पूजा करते और नारे लगाते नजर आते हैं।

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20 अगस्त 2026 को सामने आए इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। सवाल यह उठा कि पत्रकारों से जुड़े एक प्रमुख संस्थान के परिसर में इस तरह का धार्मिक कार्यक्रम कैसे हुआ। मामला बढ़ने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने सार्वजनिक रूप से सफाई जारी की और कहा कि क्लब ने इस कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया था। क्लब के मुताबिक, परिसर का एक हॉल प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए किराये पर दिया गया था।

वीडियो में क्या दिखाई दे रहा है?

वायरल वीडियो में एक व्यक्ति कैमरे के सामने दिखाई देता है और उसके पीछे नरेंद्र मोदी का एक बड़ा कटआउट नजर आता है। कटआउट में प्रधानमंत्री को भगवान राम की तरह दिखाया गया है। सिर पर मुकुट, हाथ में धनुष और पीछे तीरों का तरकश दिखाई देता है। कटआउट के सामने फूलों की माला भी लगाई गई है।

वीडियो में मौजूद लोग आरती करते हुए और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ करते दिखाई देते हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार कार्यक्रम के दौरान ‘जय जय मोदी, हर हर मोदी’ जैसे नारे भी लगाए गए। धार्मिक कार्यक्रम जैसा माहौल दिखाई देने के कारण वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। इसके बाद इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने क्या कहा?

वीडियो सामने आने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कार्यक्रम से दूरी बनाई। क्लब ने कहा कि उसने इस कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया था। उसके अनुसार परिसर का एक हॉल किसी संगठन को प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के लिए किराये पर दिया गया था।

क्लब के मुताबिक, हॉल के इस्तेमाल से जुड़ी शर्तों का पालन नहीं किया गया। जब अधिकारियों को वहां चल रहे कार्यक्रम की जानकारी मिली तो उन्होंने हस्तक्षेप किया और कार्यक्रम को रुकवा दिया। इस स्पष्टीकरण के बाद मामला और स्पष्ट हुआ कि कार्यक्रम प्रेस क्लब का आधिकारिक आयोजन नहीं था।

कार्यक्रम में कौन लोग शामिल थे?

राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस कार्यक्रम में बिहार राज्य ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड से जुड़े कुछ लोग शामिल थे। रिपोर्टों में बोर्ड के सदस्य और उपाध्यक्ष राजन सिंह का नाम सामने आया है। कार्यक्रम का संबंध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित प्रस्तावित मंदिर की योजना से भी जोड़ा गया है।

बिहार राज्य ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड ने इससे पहले 29 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित मंदिर बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। यह प्रस्ताव बोर्ड की पहली बैठक में रखा गया था। बोर्ड के सदस्य राजन सिंह ने कहा था कि यह पहल प्रधानमंत्री के प्रति समुदाय की ओर से सम्मान और आभार व्यक्त करने के लिए है।

पटना में मोदी मंदिर का प्रस्ताव क्या है?

29 जुलाई को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार बिहार राज्य ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड की बैठक में नरेंद्र मोदी को समर्पित मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा गया था। राजन सिंह के अनुसार प्रस्ताव को बोर्ड के सदस्यों का समर्थन मिला। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय को अधिकार और सम्मान देने की दिशा में काम किया है।

रिपोर्टों के मुताबिक यह मंदिर पटना में बनाने का प्रस्ताव है। हालांकि जमीन, निर्माण और सरकारी स्तर पर अंतिम मंजूरी से जुड़े मुद्दों को अलग-अलग रिपोर्टों में अलग तरह से बताया गया है। इसलिए इसे फिलहाल एक प्रस्तावित मंदिर के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि बन चुका मंदिर।

112 करोड़ रुपये के मंदिर की बात कितनी सही है?

दिल्ली के कार्यक्रम के दौरान प्रस्तावित मंदिर की लागत को लेकर भी चर्चा हुई। कुछ मीडिया रिपोर्टों में राजन सिंह के हवाले से करीब 112 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत और लगभग पांच एकड़ जमीन की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना के लिए सरकारी मंजूरी और जमीन आवंटन का इंतजार बताया गया है।

यहां यह समझना जरूरी है कि 112 करोड़ रुपये की राशि को फिलहाल प्रस्तावित परियोजना का अनुमान बताया गया है। इसे सरकार द्वारा स्वीकृत या जारी की गई रकम मानना सही नहीं होगा। इसी तरह मंदिर के निर्माण को भी अभी प्रस्तावित योजना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

ट्रांसजेंडर बोर्ड ने मोदी मंदिर का प्रस्ताव क्यों दिया?

बिहार ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड के सदस्य राजन सिंह ने जुलाई में कहा था कि समुदाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहता है। उनके मुताबिक ट्रांसजेंडर समुदाय को अधिकार और सरकारी स्तर पर प्रतिनिधित्व मिलने के कारण यह प्रस्ताव रखा गया।

बिहार सरकार ने राज्य ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड का गठन सामाजिक विकास और समुदाय के अधिकारों से जुड़े कामों के लिए किया है। बोर्ड की पहली बैठक में मंदिर का प्रस्ताव सामने आया। राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्ताव को बैठक में समर्थन मिला था।

प्रेस क्लब में कार्यक्रम पर सवाल क्यों उठे?

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया देश में पत्रकारों और मीडिया से जुड़े लोगों का प्रमुख संस्थान है। ऐसे परिसर में किसी राजनीतिक व्यक्ति को धार्मिक रूप में प्रस्तुत करने वाला कार्यक्रम होना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे पत्रकारिता संस्थान की निष्पक्षता और परिसर के इस्तेमाल से जोड़कर सवाल उठाए।

दूसरी तरफ, कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने इसे प्रधानमंत्री के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान के रूप में देखा। इस वजह से विवाद केवल कार्यक्रम के आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक व्यक्तित्व और धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर भी बहस शुरू हो गई। प्रेस क्लब की सफाई के बाद यह बात अलग हो गई कि कार्यक्रम आधिकारिक तौर पर क्लब द्वारा आयोजित नहीं था।

सोशल मीडिया पर वीडियो के बाद बहस

वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान राम के रूप में दिखाने पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि राजनीतिक नेताओं को धार्मिक देवताओं के रूप में प्रस्तुत करने से धर्म और राजनीति के बीच की सीमा पर सवाल खड़े होते हैं।

वहीं कुछ लोगों ने इस आयोजन को समर्थकों की व्यक्तिगत आस्था और सम्मान से जोड़कर देखा। सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। इस तरह वीडियो ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी कि किसी राजनीतिक नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करने की सीमा क्या होनी चाहिए।

‘मोदी चालीसा’ को लेकर भी चर्चा

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ‘मोदी चालीसा’ को लेकर हुई। वायरल वीडियो में लोगों को मोदी के नाम से तैयार की गई चालीसा का पाठ करते हुए दिखाया गया। कार्यक्रम के दौरान आरती और धार्मिक मंत्रोच्चार जैसा माहौल भी दिखाई देता है।

राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कार्यक्रम के पीछे प्रधानमंत्री को समर्पित प्रस्तावित मंदिर की योजना का प्रचार भी एक कारण बताया गया। हालांकि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने साफ किया कि उसने इस कार्यक्रम को आयोजित नहीं किया था। क्लब ने कहा कि जिस संस्था ने हॉल किराये पर लिया था, उसने किराये की शर्तों का उल्लंघन किया।

क्या यह प्रेस क्लब का आधिकारिक कार्यक्रम था?

इस सवाल का जवाब प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की ओर से स्पष्ट रूप से दिया गया है। क्लब ने कहा कि कार्यक्रम उसका आधिकारिक आयोजन नहीं था। हॉल किसी संगठन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए किराये पर लिया था।

क्लब के अनुसार वहां निर्धारित कार्यक्रम से अलग गतिविधि शुरू होने पर अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया। इसके बाद कार्यक्रम रोक दिया गया। इसलिए वायरल वीडियो को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित आधिकारिक धार्मिक कार्यक्रम बताना सही नहीं होगा।

मामला सिर्फ एक वायरल वीडियो तक सीमित नहीं

इस घटना को समझने के लिए जुलाई में सामने आए मोदी मंदिर के प्रस्ताव को भी देखना जरूरी है। बिहार ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव आने के करीब तीन सप्ताह बाद दिल्ली में मोदी चालीसा का कार्यक्रम सामने आया।

दोनों घटनाओं को जोड़कर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि कार्यक्रम से जुड़े लोगों की गतिविधि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सम्मान देने और प्रस्तावित मंदिर की योजना से संबंधित थी। हालांकि यह अलग बात है कि प्रस्तावित मंदिर को लेकर जमीन, निर्माण और सरकारी अनुमति जैसे कई सवाल अभी बाकी हैं।

धार्मिक आस्था और राजनीतिक व्यक्तित्व की बहस

भारत में राजनीतिक नेताओं के प्रति लोगों की भावनाएं अक्सर बहुत मजबूत होती हैं। कई बार समर्थक अपने नेताओं के सम्मान में अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। लेकिन जब किसी राजनीतिक नेता को धार्मिक प्रतीकों या देवी-देवताओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो मामला सामान्य राजनीतिक समर्थन से आगे बढ़ जाता है।

यही वजह है कि दिल्ली के इस वीडियो को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आई। एक पक्ष इसे श्रद्धा और सम्मान का मामला मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष राजनीतिक व्यक्ति को धार्मिक स्वरूप देने पर सवाल उठा रहा है। इस बहस का कोई एक सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं है और अलग-अलग लोग इसे अपने नजरिए से देख रहे हैं।

वीडियो को लेकर क्या ध्यान रखना चाहिए?

सोशल मीडिया पर वायरल किसी भी वीडियो को देखते समय उसके संदर्भ को समझना जरूरी है। इस मामले में भी केवल वीडियो देखकर यह मान लेना कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने प्रधानमंत्री की पूजा का कार्यक्रम आयोजित किया था, सही नहीं होगा।

क्लब ने खुद इस बात से इनकार किया है और कहा है कि हॉल किराये पर लिया गया था। राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में भी इस सफाई का उल्लेख किया गया है। इसलिए इस घटना की खबर लिखते समय वीडियो और आयोजन से जुड़े पक्षों की स्थिति को अलग-अलग रखना जरूरी है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल प्रस्तावित मोदी मंदिर को लेकर है। जुलाई में बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव को मंजूरी मिलने की बात सामने आई थी। लेकिन मंदिर के निर्माण के लिए जमीन, विस्तृत योजना, वित्तीय मंजूरी और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा किया जाना बाकी बताया गया है।

दिल्ली में हुए कार्यक्रम के बाद इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्तर पर फिर से चर्चा मिली है। आने वाले समय में यदि बिहार सरकार या संबंधित बोर्ड की ओर से जमीन, निर्माण लागत और परियोजना की औपचारिक स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट निर्णय सामने आता है तो तस्वीर और साफ हो सकती है।

दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘मोदी चालीसा’ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राम रूप वाले कटआउट के सामने आरती का वीडियो सामने आने के बाद विवाद खड़ा हुआ है। वीडियो में धार्मिक अंदाज में कार्यक्रम होता दिखाई देता है, जबकि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने साफ किया है कि उसने कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था।

इस घटना का संबंध बिहार राज्य ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड द्वारा जुलाई में रखे गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित मंदिर के प्रस्ताव से बताया जा रहा है। प्रस्ताव को बोर्ड की बैठक में समर्थन मिलने की बात राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित हुई थी। हालांकि प्रस्तावित मंदिर को लेकर जमीन, सरकारी अनुमति और निर्माण की अंतिम स्थिति अभी अलग विषय हैं।

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि वायरल वीडियो को उसके पूरे संदर्भ के साथ देखा जाए। एक तरफ कार्यक्रम में शामिल लोगों की अपनी आस्था और राजनीतिक समर्थन है, तो दूसरी तरफ प्रेस क्लब ने आयोजन से अपनी दूरी स्पष्ट की है। इसलिए इस घटना को केवल वायरल वीडियो के आधार पर देखने के बजाय आयोजन, प्रस्तावित मंदिर और प्रेस क्लब की आधिकारिक सफाई—तीनों पहलुओं को साथ रखकर समझना ज्यादा सही होगा।

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