बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र और भारत की जमीनी हकीकत

इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया है। राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है। यह मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान है। इस हिंदुस्तान में आज भी भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, और पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इन सबसे इतर नारे हैं, उम्मीद हैं और इनके बीच बेरोजगारी महंगाई भ्रष्टाचार से कराहता आम आदमी है। इस आलेख में हम बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, गरीब-अमीर के बीच खाई, न्याय प्रणाली और साइबर अपराध जैसे गंभीर मुद्दों पर आधिकारिक आंकड़ों की बात करेंगे।
बेरोजगारी की स्थिति और युवाओं की चुनौतियां
हालिया आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर लगभग 5.5% है। यह दर वैश्विक औसत (4.9%) के आसपास और कई प्रमुख जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्थिर स्थिति में है, हालांकि युवाओं के बीच यह दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश में कुल बेरोजगारी दर स्थिर है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की दर लगभग 5.1% और शहरी क्षेत्र की दर लगभग 6.4% से 6.6% के बीच दर्ज की गई है। युवा बेरोजगारी की समस्या एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। भारत में 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक यानी लगभग 15% से 16% के बीच है, जो कौशल अंतराल और तकनीक-आधारित बदलावों को दर्शाती है। वैश्विक और भारतीय बाजारों में अनौपचारिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण पूर्णकालिक नौकरियों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
गरीबी की अंतहीन समस्या और आंकड़े
भारत में आज भी गरीबी की समस्या विकराल बनी हुई है। भारत में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और काफी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी से जुड़े कई ऐसे आंकड़े हैं, जो वाकई डराने वाले हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 23.4 करोड़ लोग गरीबी के स्तर पर जीवन जीने को मजबूर हैं। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि गरीबी को मापने के लिए किस मानक या पैमाने का उपयोग किया जा रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर भारत में लगभग 23.4 करोड़ लोग घोर या बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है। विश्व बैंक के अत्यधिक गरीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि विश्व बैंक के मानकों यानी 2.15 डॉलर प्रतिदिन आय के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या घटकर लगभग 7.5 करोड़ यानी 75 मिलियन रह गई है। पिछले एक दशक में लगभग 26.9 से 27 करोड़ लोग इस अत्यधिक गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यदि उच्च स्तर यानी लगभग 4.20 डॉलर प्रतिदिन के मानक को देखा जाए, तो भारत की लगभग 23.9% आबादी यानी करीब 34.2 करोड़ लोग आर्थिक सुरक्षा के उस दायरे से नीचे आते हैं।
भुखमरी और कुपोषण की गंभीर स्थिति
नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कुल 123 देशों की सूची में भारत को 102वां स्थान मिला है। इस सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 25.8 है, जो देश में भूख और कुपोषण की स्थिति को गंभीर श्रेणी में रखता है। 123 देशों की पड़ताल में भारत का स्थान 102वां है। रिपोर्ट के अनुसार मुख्य स्वास्थ्य व पोषण के आंकड़े इस प्रकार हैं कि 12.0% बाल बौनापन है जिसमें उम्र के हिसाब से कम लंबाई होती है, और 32.9% बाल कमजोरी है जिसमें लंबाई के हिसाब से कम वजन होता है। इस रिपोर्ट में दूसरी सबसे अधिक बाल मृत्यु दर 2.8% है। भुखमरी सूचकांक वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था। भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की वेबसाइट के अनुसार चीन, ब्राजील और कुवैत सहित अठारह देशों ने पांच से कम के जीएचआई स्कोर के साथ अग्रिम पंक्ति में हैं।
भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत की स्थिति
भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। भारत का कुल स्कोर 100 में से 39 है, जो पिछले वर्ष यानी 2024 में 96वीं रैंक की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार दर्शाता है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी की जाती है। डेनमार्क, फिनलैंड और सिंगापुर सबसे कम भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। भारत का प्रदर्शन 91वीं रैंक पाकिस्तान की 136वीं रैंक, श्रीलंका की 107वीं रैंक, और नेपाल की 109वीं रैंक से बेहतर है, लेकिन चीन की 76वीं रैंक और भूटान की 18वीं रैंक से पीछे है।
गरीब और अमीर के बीच बढ़ती गहरी खाई
विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 का तीसरा संस्करण पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के द्वारा जारी किया गया है। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के शीर्ष 10% सबसे अमीर लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का तीन-चौथाई यानी लगभग 75% हिस्सा है, जबकि सबसे निचले 50% हिस्से के पास केवल 2% संपत्ति है। भारत में शीर्ष 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% ही मिलता है। देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है, और शीर्ष 10% के पास करीब 65% संपत्ति है। भारत में केवल 15.7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, और कुल श्रम आय में उनका हिस्सा महज 20% के आसपास है। भारत में असमानता गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जहाँ शीर्ष 10% राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा अर्जित करते हैं और शीर्ष 1% के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। इसे महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर के 15.7% पर स्थिर बने रहने से और बढ़ावा मिलता है। जलवायु असमानता के लिए सबसे धनी 10% लोग निजी पूंजी से होने वाले उत्सर्जन के 77% के लिये उत्तरदायी हैं। केवल शीर्ष 1% अकेले 41% योगदान करते हैं, जो असमान जिम्मेदारी और जोखिम को दर्शाता है।
न्याय प्रणाली और अदालतों में लंबित मुकदमे
देश में अदालतों में न्याय के लिए लम्बी लाइन लगीं है। अगली पेशी अगले साल के चलते लाखों की संख्या में वादी व पीड़ित तारीख पर चक्कर काटते हुए दुनिया से चले जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता। स्थिति यह है कि देशभर की अदालतों में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल 5.64 करोड़ से अधिक मुकदमे पेंडिंग हैं। अदालत के स्तर पर लंबित मामलों का विवरण इस प्रकार है। सुप्रीम कोर्ट यानी सर्वोच्च अदालत में लगभग 96,000 से अधिक केस पेंडिंग हैं। हाई कोर्ट यानी उच्च न्यायालय में देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 63.76 लाख मामले पेंडिंग हैं। जिला और अधीनस्थ अदालतें यानी निचली अदालतें में कुल पेंडिंग मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 4.98 करोड़ से अधिक मामले अटके हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक है।
साइबर अपराध और देश में अपराध की स्थिति
देश में अपराध की स्थिति भी बदतर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अंतिम उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक शारीरिक और हिंसक अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, जबकि डिजिटल व वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। देश में समग्र अपराध दर घटकर लगभग 418.9 प्रति लाख जनसंख्या पर आ गई है। विभिन्न डिजिटल और ऑनलाइन धोखाधड़ी में लगभग 17% से 18% की वृद्धि दर्ज की गई है।