डिजिटल दौर में कम होती आवाजें और सेंसरशिप: शब्दों पर पहरा नहीं फिर भी क्यों दब रही है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

डिजिटल दौर में अभिव्यक्ति की आज़ादी और सेंसरशिप को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शब्दों पर सीधा पहरा नहीं होने के बावजूद आवाजें कम क्यों होती जा रही हैं, इस पर बड़ा सवाल बना हुआ है। मेटा के फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर मंच खुला है, लेकिन बात कितनी दूर जाएगी यह कम्युनिटी स्टैंडर्ड तय करता है। सरकार की नीति पर सवाल, फैसले की आलोचना या व्यवस्था की कमी सामने रखते ही पोस्ट हट सकती है, पहुंच घट सकती है और अकाउंट प्रतिबंधित हो सकता है।
डिजिटल दरबार में अभिव्यक्ति की आज़ादी और पारदर्शिता का संकट
अगस्त 2026 में पत्रकारों, राजनेताओं, स्वतंत्र टिप्पणीकारों और कुछ राजनीतिक संगठनों के पोस्ट व अकाउंट्स पर कार्रवाई ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुद्दा पोस्ट हटने का नहीं बल्कि पारदर्शिता का है। नागरिक को पता होना चाहिए कि उसकी अभिव्यक्ति किस नियम की किस धारा से टकराई। निर्णय स्वचालित प्रणाली, स्थानीय टीम या कानूनी अनुरोधों के दबाव में हुआ, यह स्पष्ट नहीं होता है। भारत में नफरत वाली सामग्री पर प्रोएक्टिव कार्रवाई वैश्विक औसत से कम रही है।
स्क्रीन के पीछे सेंसरशिप और शैडोबैन का नया तरीका
पहले सेंसरशिप सामने होती थी लेकिन अब यह स्क्रीन के पीछे होती है। डिजिटल युग में सेंसरशिप अभिवादन करके आती है। पोस्ट रहती है पर पहुंच गायब हो जाती है। अकाउंट चलता है पर लोग देख नहीं पाते हैं। इसे शैडोबैन, रिस्ट्रिक्शन या कोई अन्य तकनीकी नाम दें, नतीजा एक ही है कि आवाज मौजूद होकर भी सार्वजनिक नहीं रहती है। यह उस लेखक जैसा है जिसकी किताब छपे लेकिन सारी प्रतियां गोदाम में बंद रहें।
वैश्विक नियम और नागरिकों के अधिकार
मेटा की नीतियां वैश्विक हैं लेकिन समान न्याय का सवाल हमेशा बना रहता है। अमेरिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत में सरकार, समाज व कानून के दबाव की वास्तविकता अलग है। भारत के आईटी नियम प्लेटफॉर्म पर दबाव डाल सकते हैं। सबसे कमजोर नागरिक होता है जिसके पास केवल एक पोस्ट होती है और कभी-कभी वह भी नहीं बचती है।
मंच की भूमिका और सत्ता की आलोचना
मंच वही सार्थक है जहां हर आवाज को जगह मिले। मेटा स्वयं को अभिव्यक्ति का मंच कहता है और मंच पर सहमति व असहमति दोनों सुनाई देनी चाहिए। लेकिन जब मंच का मालिक तय करने लगे कि कौन सी आलोचना स्वीकार्य है और कौन सी नहीं, तो वह संपादक, निर्णायक और प्रहरी तीनों बन जाता है। हेट स्पीच और गलत सूचना रोकना जरूरी है, लेकिन सत्ता की आलोचना को उसी श्रेणी में रखना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
आत्म-सेंसरशिप का खतरा और लोकतंत्र
सेंसरशिप की सबसे बड़ी जीत पोस्ट हटाना नहीं बल्कि लिखने से पहले हाथ रोक देना है। जब पत्रकार को सवाल पूछने पर अकाउंट बंद होने का डर हो, तो नागरिक अपने भीतर ही सेंसर बिठा लेता है। यही आत्म-सेंसरशिप लोकतंत्र को भीतर से खोखला करती है। लोग वही लिखते हैं जो सुरक्षित है और धीरे-धीरे सार्वजनिक बहस में असहमति की जगह प्रशंसा का शोर भर जाता है।
निजी स्वामित्व और सामाजिक जिम्मेदारी
मेटा निजी कंपनी है इसलिए सामग्री हटाने का अधिकार रखती है, लेकिन यह आधा सच है। जब करोड़ों नागरिकों की बातचीत निजी प्लेटफॉर्मों पर निर्भर हो, तो उनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी बढ़ती है। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नागरिक को दी है, एल्गोरिदम को नहीं। हर कार्रवाई का कारण बताया जाए और प्रभावी अपील मिले ताकि यह जांच हो सके कि नियम सभी पर समान लागू हैं या नहीं।