और बेचो चाय, समोसा, मंगोड़े... ये है मोदी जी का 'डिजिटल इंडिया टैक्स'?

और बेचो चाय, समोसा, मंगोड़े... ये है मोदी जी का 'डिजिटल इंडिया टैक्स'?

और बेचो चाय, समोसा, मंगोड़े… ये है मोदी जी का ‘डिजिटल इंडिया टैक्स’!*

व्यंग्यात्मक संपादकीय - राजेन्द्र सिंह जादौन

एक जमाना था जब चाय वाला अपनी चाय बेचता था, समोसे वाला समोसा और मंगोड़े वाला मंगोड़े। ग्राहक आया, दस रुपये की चाय पी, जेब से दस रुपये निकाले और हिसाब खत्म। दुकानदार ने पैसा गल्ले में रखा और अगले ग्राहक की तरफ बढ़ गया। न कोई ऐप था, न QR कोड था, न UPI था और न ही डिजिटल इंडिया का इतना बड़ा ज्ञान। फिर देश डिजिटल होने लगा। सरकार ने कहा कैश कम रखिए, डिजिटल भुगतान कीजिए। दुकानदारों को QR कोड दिए गए। चाय की दुकान से लेकर सब्जी की ठेली तक QR कोड दिखाई देने लगा। ऑटो वाले ने भी QR कोड लगा लिया और सड़क किनारे मंगोड़े बेचने वाले ने भी। डिजिटल इंडिया का सपना जमीन पर उतर आया।

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सरकार ने लोगों को समझाया कि डिजिटल भुगतान आसान है, सुरक्षित है और पारदर्शी है। जनता ने भी कहा चलो भाई, सरकार कह रही है तो डिजिटल हो जाते हैं। अब ग्राहक के पास छुट्टे पैसे नहीं हैं तो कोई समस्या नहीं। चाय दस रुपये की है तो UPI कर दीजिए। समोसा बीस रुपये का है तो UPI कर दीजिए। ऑटो का किराया 150 रुपये है तो मोबाइल निकालिए और भुगतान कर दीजिए। देश डिजिटल हो गया और सरकार ने इसे अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिनाना शुरू कर दिया।

लेकिन अब सवाल यह है कि जिस डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इतना प्रचार किया, उसी डिजिटल लेन-देन को लेकर टैक्स की चर्चा क्यों होने लगी? यानी पहले कहा गया डिजिटल बनो और अब सवाल उठ रहा है कि डिजिटल बनकर कमाओगे तो टैक्स भी दो। वाह रे डिजिटल इंडिया!

चाय वाला बेचारा सुबह से शाम तक चूल्हे के सामने खड़ा रहता है। गैस, दूध, चायपत्ती, चीनी, कप, बिजली, दुकान का किराया और न जाने कितने खर्च। दिनभर में कुछ हजार रुपये की बिक्री हुई तो उसमें उसका मुनाफा कितना बचा, यह शायद उसकी डायरी भी ठीक से नहीं जानती। लेकिन डिजिटल भुगतान का रिकॉर्ड जरूर सरकार के पास पहुंच जाता है। समोसे वाले की हालत भी अलग नहीं है। सुबह आलू खरीदो, तेल खरीदो, मैदा खरीदो, गैस भरो, दुकान लगाओ और फिर उम्मीद करो कि दिन अच्छा जाएगा। मंगोड़े वाला भी यही कर रहा है। ऑटो चालक सुबह ऑटो लेकर निकलता है और शाम तक पेट्रोल, EMI, मेंटेनेंस और घर के खर्च का हिसाब लगाता है।

इन लोगों ने डिजिटल इंडिया को इसलिए नहीं अपनाया कि उन्हें अर्थशास्त्र का बड़ा ज्ञान था। उन्होंने इसलिए अपनाया क्योंकि सरकार ने कहा कि यही आधुनिक भारत है। अब अगर इसी डिजिटल सुविधा को टैक्स का नया रास्ता बना दिया गया तो सवाल तो उठेगा ही। क्या डिजिटल इंडिया का मतलब यही था कि गरीब और छोटे कारोबारी की कमाई का हर छोटा-बड़ा लेन-देन सरकार की नजर में आ जाए?

सरकार कह सकती है कि टैक्स सिर्फ उन्हीं पर लगेगा जो निर्धारित सीमा से ऊपर कारोबार करते हैं। ठीक है, लेकिन सवाल केवल टैक्स का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें हर डिजिटल भुगतान को संभावित राजस्व के चश्मे से देखा जाने लगे। क्योंकि डिजिटल भुगतान करने वाला हर व्यक्ति बड़ा व्यापारी नहीं है। जिसने 20 रुपये का समोसा खरीदा है, वह भी UPI कर रहा है। जिसने 50 रुपये की चाय और नाश्ता किया है, वह भी UPI कर रहा है। जिसने 200 रुपये का ऑटो किराया दिया है, वह भी UPI कर रहा है। जिसने सड़क किनारे सब्जी खरीदी है, वह भी UPI कर रहा है।

तो क्या डिजिटल भुगतान की सुविधा को अब धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था में बदला जाएगा जहां छोटे से छोटे लेन-देन पर भी टैक्स की नजर हो? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों, छोटे कारोबारियों, ऑटो चालकों और स्वरोजगार करने वालों से चलता है। ये लोग किसी बड़े कॉर्पोरेट कार्यालय में बैठकर करोड़ों रुपये के सौदे नहीं करते। इनकी रोज की कमाई ही इनकी पूंजी है और रोज का खर्च ही इनकी सबसे बड़ी चुनौती।

इनसे कहा गया डिजिटल बनो। ये डिजिटल हो गए। इनसे कहा गया UPI अपनाओ। इन्होंने UPI अपना लिया। इनसे कहा गया कैशलेस बनो। इन्होंने कैशलेस होना भी सीख लिया। अब अगर उसी डिजिटल व्यवस्था को इनके लिए अतिरिक्त टैक्स, अतिरिक्त अनुपालन और अतिरिक्त सरकारी निगरानी का माध्यम बना दिया गया तो फिर सवाल पूछना जरूरी है कि आखिर इस डिजिटल क्रांति का सबसे बड़ा फायदा किसको मिला, आम आदमी को या सरकार को?

बड़े कारोबारी तो अपने लिए CA रखते हैं, अकाउंटेंट रखते हैं, टैक्स विशेषज्ञ रखते हैं। कानून की हर बारीकी समझते हैं। लेकिन भोपाल की सड़क किनारे चाय बेचने वाले रामू से पूछिए कि GST की धारा क्या है, इनकम टैक्स की सीमा क्या है और डिजिटल लेन-देन का टैक्स नियम क्या है। वह शायद यही कहेगा कि साहब, मुझे तो बस इतना पता है कि सुबह दुकान खोलता हूं और रात को घर चलाने लायक पैसा बच जाए तो समझता हूं आज दिन अच्छा था। यही भारत का असली छोटा कारोबारी है और यही वह वर्ग है जिसे डिजिटल इंडिया के नाम पर सबसे पहले डिजिटल बनाया गया।

एक तरफ बड़े निवेशकों और बड़े कारोबारियों को राहत देने की बातें होती हैं और दूसरी तरफ अगर छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, ऑटो चालक और आम आदमी के छोटे-छोटे डिजिटल लेन-देन पर भी टैक्स या अतिरिक्त बोझ की चर्चा होने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर डिजिटल इंडिया किसके लिए है?

बड़े उद्योगपति पर इसका कितना असर पड़ेगा और सड़क किनारे चाय बेचने वाले पर कितना? विदेशी निवेशक पर कितना असर पड़ेगा और उस ऑटो चालक पर कितना जो दिनभर ट्रैफिक में फंसकर परिवार चलाने की कोशिश करता है?

सरकार अगर कहती है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था पारदर्शिता के लिए है तो स्वागत है। लेकिन पारदर्शिता का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि छोटे आदमी की जेब तक तो कैमरा पहुंच जाए और बड़े आदमी के रास्ते में नियमों की इतनी सुरंगें हों कि पैसा बाहर निकलते-निकलते रास्ता ही बदल ले।

डिजिटल इंडिया का सपना खूबसूरत है। UPI ने भारत की भुगतान व्यवस्था को बदल दिया है। दुनिया भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल की चर्चा करती है। लेकिन किसी भी व्यवस्था की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि सरकार कितना पैसा वसूल सकती है। सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि आम आदमी को कितनी सुविधा मिली, छोटे व्यापारी की जिंदगी कितनी आसान हुई और कारोबार करना कितना सरल हुआ।

क्योंकि चाय वाला देश की अर्थव्यवस्था का दुश्मन नहीं है। समोसे वाला टैक्स चोर नहीं है। मंगोड़े वाला कोई कॉर्पोरेट साम्राज्य नहीं चला रहा। ऑटो चालक कोई विदेशी निवेशक नहीं है। ये लोग उस भारत का हिस्सा हैं जिसके दम पर बाजार चलता है।

इसलिए सरकार को अगर टैक्स लेना है तो व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें ईमानदार छोटे कारोबारियों को डर नहीं, भरोसा मिले। वरना कल को चाय वाला QR कोड देखकर ही कह देगा, साहब चाय दस रुपये की है, लेकिन UPI करेंगे तो पहले बताइए सरकार ने इस पर कौन-सा नया डिजिटल टैक्स लगाया है। और समोसे वाला कहेगा, दो समोसे बीस रुपये के हैं, लेकिन डिजिटल इंडिया में बीस रुपये का हिसाब बीस जगह देना पड़ेगा।

तब शायद सरकार को समझ आएगा कि डिजिटल क्रांति और डिजिटल टैक्स में जमीन-आसमान का फर्क है। डिजिटल भारत चाहिए, जरूर चाहिए, लेकिन ऐसा डिजिटल भारत नहीं चाहिए जहां बड़े कारोबारियों के लिए राहत और छोटे दुकानदार के लिए हर QR कोड एक संभावित टैक्स नोटिस बन जाए।

पहले कहा गया डिजिटल बनो। अब जनता पूछ रही है डिजिटल बनने की कीमत कितनी है? और अगर जवाब यह है कि चाय, समोसा, मंगोड़े और ऑटो के हर छोटे भुगतान पर भी सरकार की नजर और टैक्स का बोझ बढ़ेगा, तो फिर सवाल तो बनता है कि मोदी जी, यह डिजिटल इंडिया है या डिजिटल इंडिया टैक्स का नया अध्याय?

क्योंकि चाय वही है, समोसा वही है, मंगोड़ा वही है, ग्राहक वही है, बस फर्क इतना है कि पहले गल्ले में पैसा जाता था और अब QR कोड में जाता है, और हिसाब सरकार तक पहुंच जाता है।

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