दिग्विजय दिवस पर विशेष: वैश्विक अराजकता के दौर में क्यों प्रासंगिक है स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण

दिग्विजय दिवस पर विशेष: वैश्विक अराजकता के दौर में क्यों प्रासंगिक है स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण

दिग्विजय दिवस - वैश्विक अराजकता में भारत की आध्यात्मिक दिग्विजय

लेखक--सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्

11 सितम्बर दुनिया के लिए दो अर्थ रखता है। 2001 में इसी दिन अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ - आतंक, असहिष्णुता और सभ्यताओं के टकराव का प्रतीक। और इससे ठीक 108 साल पहले 1893 में इसी दिन शिकागो में एक तीस वर्षीय भारतीय संन्यासी ने विश्व धर्म महासभा में कहा था - " अमेरिका के मेरे प्यारे भाईयों और बहनों " - और दो मिनट तक हॉल तालियों से गूँजता रहा। वह था स्वामी विवेकानंद का दिग्विजय भाषण। एक ने दुनिया को बांटा, दूसरे ने जोड़ा। आज जब विश्व फिर उसी दोराहे पर खड़ा है, तब दिग्विजय दिवस की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है। दिग्विजय केवल भाषण नहीं, भारत का आत्म परिचय था-- 1893 का भारत गुलाम था, भूखा था, अंग्रेजों द्वारा "बर्बर" कहा जाता था। शिकागो में विश्व धर्म महासभा का उद्देश्य भी ईसाई धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करना था। वहाँ सात हजार लोगों के सामने विवेकानंद ने पांच मिनट में दुनिया की सोच पलट दी। अपने सम्बोधन में उन्होंने तीन सूत्र दिए-- पहला सहिष्णुता नहीं, स्वीकृति--  उन्होंने कहा, "मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सहन नहीं करते, स्वीकार करते हैं कि सभी धर्म सत्य हैं।" यह आज के 'टॉलरेंस' के पश्चिमी विमर्श से कहीं आगे का विचार है। दूसरा गर्व और सेवा का समन्वय-- उन्होंने भारत को शरण देने वाला देश बताया - "हमने यहूदियों को शरण दी जब रोम ने उन्हें मारा, हमने पारसियों को शरण दी।" यह सनातन का वसुधैव कुटुम्बकम् है, जो आज भारत की विदेश नीति में 'विश्व मित्र' बन कर लौटा है। और तीसरी बात कि मनुष्य ही केंद्र है-- "दरिद्र नारायण" की अवधारणा। धर्म मंदिर में नहीं, मनुष्य की सेवा में है। यही व्यावहारिक वेदांत है। इसीलिए इसे दिग्विजय कहा गया - शस्त्र से नहीं, विचार से विश्व विजय।

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आज के वैश्विक परिवेश में दशा और दिशा - क्यों फिर प्रासंगिक है?- 2026 की दुनिया 1893 से अलग नहीं, बल्कि अधिक जटिल है। इसके कारण में पहला है आज पुनः सभ्यताओं का टकराव लौट आया है-- रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-गाजा संघर्ष, अमेरिका-चीन टैरिफ वार, यूरोप में दक्षिणपंथ का उभार - दुनिया फिर "हम बनाम वे" में बंट रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है, पिछले दस साल में धार्मिक आधार पर हिंसा 40 फीसदी बढ़ी है।

ऐसे में विवेकानंद का "सभी धर्म सत्य हैं" का घोष एकमात्र एंटी-डोट है। जब ट्रंप प्रशासन 'लिबरेशन डे टैरिफ' और एकतरफा प्रतिबंध लगाता है, तब दुनिया को एक ऐसी आवाज चाहिए जो कहे - एकता में विविधता ही प्रकृति की योजना है।दूसरा है आध्यात्मिक शून्यता का संकट-- विकसित देशों में अवसाद, अकेलापन, आत्महत्या दर रिकॉर्ड पर है। अमेरिका में हर तीसरा युवा खुद को अकेला बताता है। भौतिक समृद्धि ने मन की भूख नहीं मिटाई।

भारत का योग, ध्यान, वेदांत आज ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री बन चुका है, जिसकी कीमत 5.6 ट्रिलियन डॉलर है। 11 सितम्बर 1893 को विवेकानंद ने जो बीज बोया था, वही आज योग दिवस (21 जून) और मिलेट वर्ष के रूप में फल-फूल रहा है। तीसरी बात कट्टरता बनाम उदारता की-- एक तरफ ISIS, अल-कायदा जैसी जिहादी विचारधारा, दूसरी तरफ श्वेत श्रेष्ठतावाद। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं - असहिष्णुता। विवेकानंद ने कहा था - "सांप्रदायिकता, कट्टरता और हठधर्मिता ने इस सुंदर पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है।" यह वाक्य आज की ब्रेकिंग न्यूज़ लगता है।

इसलिए दिग्विजय दिवस की दिशा स्पष्ट है - यह केवल अतीत का जश्न नहीं, भविष्य का रोडमैप है। लक्ष्य है, धर्म को विवाद से निकाल कर संवाद बनाना। आज के भारत की भूमिका, शिकागो से नई दिल्ली तक-- यदि 1893 में भारत ने विचार दिया था, तो 2026 में भारत उसे आचरण में उतार रहा है। कैसे? तो गौर से समझिए कूटनीति में दिग्विजय-- आज भारत की विदेश नीति विवेकानंद के "विश्व बंधुत्व" का ही आधुनिक रूप है। ब्रिक्स 2026 की अध्यक्षता-- जब दुनिया अमेरिका बनाम चीन में बंटी है, भारत कह रहा है - हम किसी के विरोध में नहीं, सबके साथ हैं। भारत ब्रिक्स में रूस-चीन के साथ भी है, क्वाड में अमेरिका-जापान के साथ भी। यह स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी नहीं, विवेकानंद की "स्वीकृति" का सिद्धांत है। जी-20 2023 और वसुधैव कुटुम्बकम्--  भारत ने जी-20 का मंत्र वसुधैव कुटुम्बकम् दिया। अफ्रीकन यूनियन को जी-20 में शामिल कराया।

यह वही भावना है - "सभी को साथ लेकर चलना।" वैक्सीन मैत्री, योग कूटनीति-- कोविड में सौ देशों को वैक्सीन, दो सौ देशों में योग। यह "सेवा ही धर्म है" का व्यावहारिक वेदांत है। आंतरिक मोर्चे पर चुनौती और लक्ष्य-- विवेकानंद ने कहा था- "भारत को जगाना है तो पहले गरीब, दलित, पिछड़े को गले लगाना होगा। सभी सामाजिक विभाजन भ्रम हैं।" आज भारत दो चुनौतियों से जूझ रहा है - पहला है सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया पर नफरत। और दूसरा जातीय जनगणना, आरक्षण और आर्थिक असमानता है। दिग्विजय दिवस का लक्ष्य हमें याद दिलाता है - राष्ट्रवाद नफरत पर नहीं, गर्व और सेवा पर बनेगा। जैसे विवेकानंद ने कहा - "गर्व करो कि तुम हिन्दू हो, पर दूसरों से घृणा मत करो।" प्रधानमंत्री मोदी ने इसीलिए शिकागो भाषण को बार-बार दोहराया है - कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला पर ध्यान,

नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा, और 'विकसित भारत 2047' का मंत्र - आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान। 17 साल के नरेंद्र मोदी जब वडनगर छोड़ कर हिमालय गए थे, तो हाथ में विवेकानंद की किताब थी। वह व्यक्तिगत दिग्विजय ही आज राष्ट्रीय दिग्विजय बन रही है। युवा के लिए दिग्विजय है-- भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, औसत आयु 29 साल। विवेकानंद ने शिकागो में सबसे ज्यादा युवाओं को ही आकर्षित किया था। उन्होंने कहा -

"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" आज के युवा के तीन लक्ष्य होने चाहिए, जो दिग्विजय दिवस तय करता है। पहला है आत्म-गौरव-- अपनी संस्कृति पर हीन भावना छोड़ो। अंग्रेजी सीखो, पर संस्कृत भूलो मत। AI सीखो, पर वेदांत भी पढ़ो। दूसरे सेवा--  रामकृष्ण मिशन आज भी 1200 स्कूल, अस्पताल चलाता है। हर युवा साल में सौ घंटे सेवा करे - यही राष्ट्र-निर्माण है। और तीसरे है कि विश्व-नागरिक बनो-- केवल नौकरी के लिए नहीं, विचार के लिए दुनिया में जाओ। भारतीय डायस्पोरा 3.5 करोड़ है, वह भारत का सॉफ्ट पावर है। अंत में निष्कर्ष यही है कि यह दूसरी दिग्विजय का समय है।1893 में एक संन्यासी ने अमेरिका को भारत समझाया था। 2026 में भारत को दुनिया को फिर समझाना है - युद्ध से नहीं, बुद्ध से, बाजार से नहीं, बाजार के बीच मानवता से।

दिग्विजय दिवस की दशा यह है कि वह आज भी प्रासंगिक है। दिशा यह है कि वह संघर्ष से संवाद की ओर ले जाता है। और लक्ष्य यह है कि भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं, आध्यात्मिक विश्व-गुरु बने - जो दुनिया को GDP ही नहीं, जीने का तरीका भी दे। नीचे उदधृत चार लाइनों में मंतव्य स्पष्ट हो जाता है कि--

शिकागो में गूंजा था जो,आज दिल्ली से गूंजेगा।

सहिष्णुता का मंत्र वही,फिर विश्व को सिखाएगा।।

ग्यारह सितम्बर दो हैं जग में,एक बांटे, एक जोड़े।

भारत को तय करना है, किस राह पर वह दौड़े।।

भारत ने राह चुन ली है - जोड़ने की। यही सच्ची दिग्विजय है।

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