डॉ. जितेंद्र सिंह की अध्यक्षता में हुई विज्ञान सचिवों की बैठक, आरडीआई फंड नीति और सुरक्षा उपायों पर हुई चर्चा

आरडीआई फंड की ‘हितों के टकराव’ से जुड़ी नीति को करदाताओं के पैसे और निजी पूंजी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कड़े सुरक्षा उपायों से सुरक्षित किया गया है; हालांकि, हितधारकों के सुझावों का स्वागत है तथा जहां भी संभव हो और अधिक सुरक्षा उपायों पर विचार किया जा सकता है: डॉ. जितेंद्र सिंह
नई दिल्ली / 20 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की अध्यक्षता में विज्ञान सचिवों की मासिक संयुक्त बैठक में तीन महत्वपूर्ण घोषणाएं की गईं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आरडीआई फंड की ‘हितों के टकराव’ से जुड़ी नीति को करदाताओं के पैसे और निजी पूंजी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कड़े सुरक्षा उपायों से सुरक्षित किया गया है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि हितधारकों के सुझावों का स्वागत है तथा जहां भी संभव हो और अधिक सुरक्षा उपायों पर विचार किया जा सकता है। केन्द्रीय मंत्री को बताया गया कि आरडीआई फंड में जनता का पैसा शामिल होने के कारण पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से फंड के वितरण और हितों के टकराव से जुड़े सुरक्षा उपायों के संबंध में कड़े नियमों का पालन किया जा रहा है। उन्हें यह भी बताया गया कि निवेश संबंधी निर्णयों की विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु इस ढांचे में मजबूत प्रणालियां मौजूद हैं तथा जहां भी जरूरत हो, वहां और अधिक सुरक्षा उपायों पर विचार किया जा रहा है।
बैठक के दौरान, डॉ. जितेंद्र सिंह को बताया गया कि चयनित कंपनियों में से कुछ को आरडीआई फंड वितरित करने का कार्य पूरा हो चुका है, जबकि बाकी चयनित कंपनियों को फंड वितरित करने की प्रक्रिया चल रही है और यह शीघ्र ही पूरी हो जाएगी।
केन्द्रीय मंत्री को यह भी बताया गया कि दूसरे स्तर के फंड मैनेजरों (एसएलएफएम) के चयन और उनके नामों की घोषणा करने की प्रक्रिया जारी है। उम्मीद है कि यह प्रक्रिया लगभग दो सप्ताहों में पूरी हो जाएगी। ये एसएलएफएम योग्य कंपनियों की पहचान करने और आरडीआई फंड से संबंधित ढांचे के जरिए उन्हें सहायता प्रदान करने में अहम भूमिका निभाएंगे। यह भी बताया गया कि एसएलएफएम को शामिल करने की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की जा रही है, क्योंकि इन फंड मैनेजरों पर मंजूर किए गए ढांचे के तहत निवेश को प्रबंधित करने के साथ-साथ निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करने का दायित्व भी होगा।
केन्द्रीय मंत्री को यह भी जानकारी दी गई कि आरडीआई फंड के ढांचे को और अधिक समावेशी बनाने तथा विभिन्न सेक्टरों की रणनीतिक तकनीकी जरूरतों के अनुरूप ढालने हेतु अंतर-मंत्रालयी विचार-विमर्श का आयोजन भी किया गया है। राष्ट्रीय महत्व के उन क्षेत्रों की पहचान करने के लिए विभिन्न मंत्रालयों से सुझाव मांगे गए, जिन्हें शुरू में तय किए गए सेक्टरों की सूची से हटकर मदद की जरूरत हो सकती है। एक विशेषज्ञ समिति ने इन सुझावों की समीक्षा की और ढांचे को अधिक लचीला एवं समावेशी बनाने हेतु सेक्टरों के दायरे को बढ़ाने की सिफारिश की, ताकि यह फंड तकनीक से जुड़ी व्यापक प्राथमिकताओं को पूरा कर सके।
केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि आरडीआई फंड का उत्तरदायित्व साझा है, क्योंकि निवेश का 50 प्रतिशत हिस्सा निजी इक्विटी के स्रोतों से आने की उम्मीद है। इस कारण निवेश समितियों पर करदाताओं के पैसे और निजी पूंजी, दोनों की सुरक्षा की समान जिम्मेदारी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भले ही जांच-पड़ताल और सत्यापन की प्रक्रियाओं में कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन कंपनियों को आगे बढ़ने में मदद करने हेतु समय पर फंड जारी करना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे भविष्य में तेजी से काम करें और फंड जारी करने की प्रक्रिया को अधिक बेहतर व तेज गति से काम करने वाला बनाएं।
डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली के टेक्नोलॉजी भवन स्थित आर्यभट्ट हॉल में विज्ञान मंत्रालयों एवं विभागों की मासिक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। इस बैठक में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर उमेश वी. वाघमारे; जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले; वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग की सचिव तथा सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलाईसेल्वी; पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. श्रीनिवास कुमार तुम्माला; अंतरिक्ष विभाग के सचिव एवं इसरो के अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन; प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के सचिव श्री राजेश कुमार पाठक; और अनुसंधान राष्ट्रीय रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के सीईओ के अलावा अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए।

आरडीआई की प्रोसेसिंग के संबंध में केन्द्रीय मंत्री का यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब सरकार अनुसंधान एवं विकास के मामले में निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी व उत्तरदायी माहौल बनाना चाह रही है। समीक्षा के दौरान, यह बताया गया कि आवेदनों के मूल्यांकन का पहला दौर पूरा हो चुका है और योग्य आवेदनों के लिए सकारात्मक सिफारिशें तैयार हैं। इस बात पर जोर दिया गया कि बिना किसी जरूरी वजह के देरी किए बिना प्रस्तावों को अगले चरणों में आगे बढ़ाया जाए। साथ ही, सार्वजनिक फंड को जारी करने से पहले जरूरी जांच-पड़ताल भी की जाए।
आरडीआई से संबंधित पहल इसलिए बेहद अहम है क्योंकि यह अपनी तरह का पहला सरकारी प्रयास है और इसका उद्देश्य सार्वजनिक फंडिंग की सहायता देकर अनुसंधान एवं विकास के कार्यों में निजी निवेश को बढ़ावा देना है। बैठक में यह उम्मीद जताई गई कि पहले चक्र से इस तंत्र को आगे के चक्र में अधिक आसान और बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, सरकार इस बात को भी समझती है कि सार्वजनिक फंडिंग के ऐसे ढांचे में निजी क्षेत्र की भागीदारी एक नया अनुभव है। इसलिए इसमें तेजी, जिम्मेदारी और हितधारकों के भरोसे के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने विभिन्न मंत्रालयों एवं विशेषज्ञों के साथ बातचीत के आधार पर आरडीआई के ढांचे के तहत आने वाले रणनीतिक क्षेत्रों का दायरा बढ़ाने के प्रस्तावों की भी समीक्षा की। इस विस्तार का उद्देश्य आरडीआई के दिशा-निर्देशों के दायरे में रहते हुए उभरते रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों को शामिल करना है। चर्चाओं के दौरान तकनीक, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के तेजी से बदलते उस स्वरूप को भी ध्यान में रखा गया, जिसके लिए नवाचार-सहायता इकोसिस्टम का इतना लचीला होना जरूरी है कि वह नए व उभरते क्षेत्रों को अपना सके।
बैठक में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम में अंतर-मंत्रालयी सहयोग और जानकारी साझा करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के उपायों पर भी चर्चा की गई। सचिवों और विभागों को नियमित बातचीत जारी रखने, आपसी हित के क्षेत्रों की पहचान करने और वैज्ञानिक संस्थानों व कार्यक्रमों के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। सहयोग को मजबूत करने और काम के दोहराव से बचने हेतु सीएसआईआर तथा अन्य वैज्ञानिक संगठनों के बीच समय-समय पर संस्थागत बातचीत भी की जा रही है।
इस समीक्षा में ‘सह-संकल्प’ की प्रगति का भी जायजा लिया गया। यह एक रिसोर्स बुक है जिसमें सरकार की सहायता से हुए वैज्ञानिक शोध से विकसित तकनीकों को दर्शाया गया है। इस पहल में शामिल 60 तकनीकों में से 56 को पहले ही जमीनी स्तर पर कार्यान्वित किया जा चुका है, जबकि 41 तकनीकें टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 8 या 9 तक पहुंच चुकी हैं। यह इनके व्यापक पैमाने पर अपनाए जाने की मजबूत संभावना को दर्शाती हैं। सीएसआईआर ने यह भी बताया है कि इस पहल के दौरान प्रदर्शित की गई 38 तकनीकों को अपनाने में विभिन्न कंपनियों एवं उद्यमियों ने दिलचस्पी दिखाई है और तकनीक चाहने वालों को आगे की कार्रवाई के लिए संबंधित प्रयोगशालाओं से जोड़ा जा रहा है।
बैठक का एक अहम हिस्सा वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में जानकारी देने के तरीकों को अपेक्षाकृत अधिक सीधा, आधुनिक और आसान बनाने पर केन्द्रित था। केन्द्रीय मंत्री ने विभिन्न विज्ञान विभागों की संचार और सोशल-मीडिया टीमों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर जोर दिया, ताकि अहम उपलब्धियों, तकनीक-हस्तांतरण, उद्योग जगत के साथ सहयोग और समाज से जुड़े कार्यों को निरंतर पहचान मिल सके। विचार-विमर्श के दौरान संक्षिप्त डिजिटल कंटेंट और ऐसे प्लेटफॉर्म के अधिक उपयोग पर भी जोर दिया गया, जो सीधे नागरिकों, उद्योग जगत और तकनीक के संभावित उपयोगकर्ताओं तक पहुंच सकें।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ी सफलता की कहानियों की प्रस्तावित डिजिटल लाइब्रेरी पर भी चर्चा की गई। इसका उद्देश्य विभिन्न विभागों और प्रयोगशालाओं से प्राप्त प्रमाणित कंटेंट का एक सुलभ एवं आसानी से साझा करने योग्य भंडार बनाना है। इस प्रस्तावित दृष्टिकोण में लगभग दो से तीन मिनट के छोटे वीडियो बनाने की परिकल्पना की गई हैं, जिसमें देश भर की प्रयोगशालाएं और संस्थान सीधे योगदान दे सकें तथा वैज्ञानिक उपलब्धियां अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सकें।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में 27 से 29 अक्टूबर के दौरान होने वाले ‘इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ईएसटीआईसी) 2026’ की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। तीन नोबेल पुरस्कार विजेताओं और तीन अन्य प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं ने इसमें भाग लेने की पुष्टि कर दी है, जबकि कुछ और लोगों से भी पुष्टि की उम्मीद है। इस प्रदर्शनी में 150 स्टॉल शामिल किए जा रहे हैं, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों, एक ईएसटीआईसी इनोवेशन बूथ, प्रमुख प्रायोजकों और चुनिंदा डीप-टेक स्टार्टअप की भागीदारी होगी। 120 से अधिक आमंत्रण भेजे गए हैं। इनमें से अब तक 73 आमंत्रण स्वीकार किए जा चुके हैं।
बैठक में ‘स्वच्छ सागर सुरक्षित सागर (एसएसएसएस) अभियान 2026’ की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। यह अभियान 12 से 19 सितंबर तक चलेगा। इसके तहत 111 चिह्नित समुद्र तटों पर विभिन्न गतिविधियां की जाएंगी। इसमें मछुआरों, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, एनसीसी, एनएसएस, स्काउट्स एंड गाइड्स, स्वैच्छिक संगठनों और निजी क्षेत्र के लोगों की भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए एक समर्पित वेबसाइट, डैशबोर्ड और मोबाइल ऐप पहले ही बनाए जा चुके हैं। साथ ही, इस अभियान को डिजिटल माध्यम से प्रचार, प्रतियोगिताओं और ओशन ओलंपियाड के जरिए समर्थन दिया जा रहा है।
बैठक में विज्ञान के साथ जन-सहभागिता को बढ़ाने वाली पहलों की समीक्षा की गई, जिसमें 29 अगस्त से प्रस्तावित मासिक ‘विज्ञान की बात’ व्याख्यान श्रृंखला और माईगव के सहयोग से विज्ञान एवं नवाचार आधारित प्रतियोगिताएं तथा क्विज शामिल हैं। इन पहलों का उद्देश्य वैज्ञानिक संस्थानों, नागरिकों, युवा शोधकर्ताओं और व्यापक नवाचार इकोसिस्टम के बीच एक मजबूत इंटरफेस बनाना है।
समीक्षा बैठक में सरकार के उस व्यापक दृष्टिकोण की झलक मिली, जिसका उद्देश्य आरडीआई की डिलीवरी में तेजी लाना और सरकारी पैसों के उपयोग में कड़े सुरक्षात्मक उपायों को कार्यान्वित करना है। भारत के अनुसंधान एवं विकास इकोसिस्टम में निजी निवेश के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरने के साथ, सरकार यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है कि बेहतरीन स्टार्टअप एवं निजी अन्वेषकों को समय पर सहायता मिले। साथ ही, ठोस सत्यापन, पारदर्शिता और हितों के टकराव से जुड़े सुरक्षा उपायों के माध्यम से सार्वजनिक संसाधन सुरक्षित रहें।