दुनिया के लिए चिंता का विषय बना अलनीनो, बदलता मौसम और जलवायु संकट

दुनिया के लिए चिंता का विषय बना अलनीनो, बदलता मौसम और जलवायु संकट

दुनिया के लिए चिंता का विषय बना अलनीनो

लेखक=====सौरभ वार्ष्णेय=====

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धरती का बदलता मिजाज अब केवल वैज्ञानिकों के शोध और मौसम विशेषज्ञों की रिपोर्ट तक सीमित विषय नहीं रह गया है। इसका असर आम आदमी के जीवन से लेकर कृषि, जल संसाधन, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कहीं आसमान से बरसती आग लोगों को बेहाल कर रही है, तो कहीं कुछ ही घंटों में होने वाली मूसलाधार बारिश शहरों को जलमग्न कर रही है। कहीं किसान बारिश का इंतजार करते-करते परेशान हैं, तो कहीं अत्यधिक वर्षा उनकी महीनों की मेहनत को बहा ले जा रही है। मौसम के इस बदलते और असामान्य स्वरूप के बीच अल नीनो एक बार फिर दुनिया के लिए चिंता का विषय बनकर सामने आता है।

अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसका प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में तापमान, वर्षा और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। यह घटना प्राकृतिक जलवायु चक्र का हिस्सा है और हजारों वर्षों से पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में इसका अस्तित्व रहा है। लेकिन आज परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अल नीनो और बढ़ते वैश्विक तापमान का मेल मौसम की चरम स्थितियों को और अधिक गंभीर बना सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अल नीनो को लेकर इतनी चिंता क्यों है? इसका उत्तर इसके व्यापक प्रभावों में छिपा है। अल नीनो के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक बढ़ सकता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में वर्षा के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है और आज भी खेती का एक बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर आधारित है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है या उसका वितरण असमान रहता है, तो इसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ सकता है।

धान, मक्का, दालें, तिलहन और अन्य फसलों की पैदावार प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। उत्पादन में कमी का असर केवल किसान तक सीमित नहीं रहता। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई पर दबाव पैदा हो सकता है। पहले से ही महंगाई और रोजगार जैसी चुनौतियों से जूझ रहे आम परिवारों के लिए खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी अतिरिक्त बोझ बन सकती है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी कम गंभीर नहीं है। जलवायु परिवर्तन के कारण जब वातावरण अधिक गर्म होता है, तो उसमें नमी धारण करने की क्षमता बढ़ती है। परिणामस्वरूप कई बार कम समय में अत्यधिक बारिश होने लगती है। ऐसी बारिश सामान्य मानसून से अलग होती है। कुछ घंटों में इतनी वर्षा हो जाती है कि शहरों की जल निकासी व्यवस्था जवाब दे देती है, नदियां उफान पर आ जाती हैं और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। यानी एक ओर सूखे जैसी स्थिति और दूसरी ओर अचानक बाढ़—दोनों परिस्थितियां एक ही बदलती जलवायु व्यवस्था का हिस्सा बन सकती हैं।

भारत के लिए यह खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश की भौगोलिक विविधता बहुत अधिक है। हिमालयी क्षेत्र में भारी बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएं जान-माल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। मैदानी इलाकों में नदियों का जलस्तर बढऩे से बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। वहीं महानगरों में कुछ घंटों की तेज बारिश ही यातायात, बिजली, सीवर और जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में यह समझना होगा कि केवल बारिश की कुल मात्रा देखना पर्याप्त नहीं है; बारिश कब, कितनी तेजी से और किस क्षेत्र में होती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अल नीनो का असर समुद्री और स्थलीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है। समुद्र का तापमान बढऩे से समुद्री जीव-जंतुओं और मछली उत्पादन पर असर पड़ सकता है। समुद्र दुनिया की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण नियामक है। इसलिए समुद्र के तापमान में होने वाला बदलाव लंबे समय तक वातावरण और मौसम को प्रभावित कर सकता है। यदि समुद्रों का तापमान लगातार बढ़ता रहा तो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव और बढ़ेगा।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बदलता मौसम बड़ी चुनौती बन रहा है। अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कमजोर वर्ग, बुजुर्ग, बच्चे और खुले में काम करने वाले श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियों और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन और अल नीनो का प्रभाव केवल मौसम विभाग के आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी विषय है।

अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कृषि उत्पादन में कमी, बिजली की मांग में वृद्धि, जल संकट, बाढ़ से बुनियादी ढांचे को नुकसान और स्वास्थ्य संबंधी खर्च—इन सभी का आर्थिक बोझ  सरकार और जनता दोनों को उठाना पड़ता है। अत्यधिक गर्मी में बिजली की मांग बढ़ती है, जबकि जल संकट से उद्योग और कृषि दोनों प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर बाढ़ और भूस्खलन से सड़कों, पुलों और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचता है।ऐसे समय में सरकारों की जिम्मेदारी केवल राहत और मुआवजे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि जलवायु जोखिम को विकास की हर योजना का हिस्सा बनाया जाए। शहरों की जल निकासी व्यवस्था को आधुनिक बनाया जाए, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण हो, जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और किसानों को मौसम आधारित कृषि सलाह समय पर उपलब्ध कराई जाए। सूखा और बाढ़ दोनों से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर अलग-अलग रणनीतियां तैयार करनी होंगी।

कृषि क्षेत्र में भी पारंपरिक सोच से आगे बढऩे की जरूरत है। कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों, सूखा और गर्मी सहन करने वाली किस्मों, माइक्रो-इरिगेशन तथा वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना होगा। किसानों को मौसम की वास्तविक समय की जानकारी और संभावित जोखिमों के बारे में पहले से चेतावनी मिलनी चाहिए। इससे वे बुवाई, सिंचाई और कटाई से जुड़े निर्णय अधिक वैज्ञानिक ढंग से ले सकेंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अल नीनो को केवल एक अस्थायी प्राकृतिक घटना मानकर उसके खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अल नीनो आएगा और जाएगा, लेकिन यदि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता रहा तो ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव अधिक जटिल और गंभीर हो सकते हैं। इसलिए वास्तविक चुनौती अल नीनो से अधिक उस बदलती जलवायु व्यवस्था की है, जिसमें अल नीनो अपना प्रभाव डाल रहा है।

धरती हमें लगातार संकेत दे रही है। कभी रिकॉर्ड गर्मी के रूप में, कभी असामान्य बारिश के रूप में और कभी सूखे तथा बाढ़ के एक साथ बढ़ते खतरे के रूप में। अब आवश्यकता भय पैदा करने की नहीं, बल्कि समय रहते तैयारी करने की है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम किए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता।अल नीनो को रोकना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन उसके प्रभावों से होने वाले नुकसान को कम करना निश्चित रूप से हमारे हाथ में है। इसके लिए वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना होगा, जलवायु अनुकूल नीतियां बनानी होंगी और प्रकृति के साथ विकास की नई भाषा लिखनी होगी। यदि हमने आज भी चेतावनियों को नजरअंदाज किया, तो आने वाली पीढिय़ों को केवल बदलते मौसम का नहीं, बल्कि बदलती और अधिक असुरक्षित दुनिया का सामना करना पड़ेगा। अब समय है कि धरती के बदलते मिजाज को समझा जाए और उसके संकेतों पर गंभीरता से अमल किया जाए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।

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