भारत में फासीवाद और लोकतंत्र की स्थिति

Atal Hind Team Online13 September 20268 min read20 viewsराजनीति
भारत में फासीवाद और लोकतंत्र की स्थिति

नागरिक परिक्रमा

फासीवाद का बर्बर भागवत पुराण

क्या अब भी किसी को कोई शक है कि हमारा देश संघी गिरोह की सरपरस्ती में फासीवादी के एक ऐसे नए दौर से गुजर रहा है, जिसकी कल्पना एक नागरिक के रूप में हममें से किसी ने नहीं की थी। संविधान, लोकतंत्र, कायदे-कानून सब एक तरफ धरे रह गए हैं, इनकी जगह संघी गिरोह के मौखिक निर्देशों ने ले ली है। इन निर्देशों पर अमल करने वाला लठैतों का एक गिरोह भी संगठित रूप से काम कर रहा है, जिसकी सत्ता के सभी अंगों तक आसान पहुंच सर्वविदित है। इस पहुंच के बल पर अब वह सरे आम नागरिकों को सजा देने की हिमाकत कर रहा है और न्यायपालिका नाम की संस्था की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है। एक नागरिक, एक लेखक, एक रचनाकार, एक चिंतक के रूप में बोलना, लिखना, सोचना, असहमति जाहिर करना, सवाल खड़े करना, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना -- ये सब आज गुनाह है। इसके लिए आप देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी, पाकिस्तानी ... आदि विशेषणों से नवाजे जा सकते हैं और दंडित किए जा सकते है। अब वही काम सही है, जो सत्ता को सुहाए, उसकी चापलूसी करे, सत्ता में बैठे लोगों की राष्ट्र के नाम पर जयकारे लगाए। फासीवाद को अपनी मुहिम आगे बढ़ाने के लिए नागरिक नहीं चाहिए, आज्ञपालक प्रजा चाहिए, जो उसके दिए खैरात को बिना ना-नुकुर स्वीकार करें और सत्ता का गुणगान करें। जो ऐसा नहीं कर सकता, उसे इस देश में रहने का भी कोई अधिकार नहीं है, नागरिकता भी उससे छीन ली जाएगी। ब्रर्टोल्ट ब्रेख्त ने फासीवाद के बारे में कहा था कि वह अपने लिए जनता भी चुन सकती है। भारत में आज यही हो रहा है। एसआईआर के नाम पर करोड़ों नागरिकों की नागरिकता छीन लिए जाने, उन्हें मताधिकार ही नहीं, राज्य की कल्याणकारी सुविधाओं और उनके बुनियादी नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिए जाने का वास्तविक खतरा साकार होता हम अपनी आंखों से देख रहे हैं और इस बर्बरता के खिलाफ न्यायपालिका की चुप्पी भी हम देख रहे हैं। कानून के शासन की जगह अब संघी लठैतों ने ले ली है, जो कहीं जन संघर्षों, जन आंदोलनों पर हमला कर रही है, जो कहीं अल्पसंख्यकों पर, तो कहीं पत्रकारों पर और कहीं यात्रियों और पशु-व्यापारियों पर हमले कर रही हैं।

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फासिस्टों का कोई सगा नहीं होता। वह देश, संस्कृति, धर्म, रिश्ते-नाते सबको ठगकर फलता-फूलता है। वह कट्टरपंथियों की एक ऐसी जमात पैदा करता है, जिसका मकसद ही अब तक की श्रेष्ठ मानव उपलब्धियों को कुचलना होता है। विचारहीनता, अवैचारिकता और अवैज्ञानिकता उसकी विचार प्रक्रिया के अभिन्न अंग होते हैं। विज्ञान और तार्किकता से उसको सबसे ज्यादा चिढ़ होती है, क्योंकि मानव सभ्यता के पास यही एक पूंजी होती है, जो फासीवाद के मकसद को नाकाम कर सकती है।

पिछले 60 सालों में हमने जिस लोकतंत्र को विकसित किया, उसमें बहुत-सी कमजोरियां, बहुत-सी बुराइयां थीं। लेकिन संघी गिरोह ने पिछले 12 सालों में जिस फासीवाद को पनपाया है, वह चाहे कितना भी मजबूत हो, मजबूत दिखे, लेकिन एक कमजोर लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए कि फासीवाद की पूरी दृष्टि ही मानवद्रोही होती है। वह मनुष्य को, उसकी मेहनत और सृजनात्मकता को केवल कॉर्पोरेटों की तिजोरियों को भरने का साधन समझती है। इसके लिए विमर्श और समावेशिता की सोच और प्रक्रिया को जीवन से बेदखल करने की जरूरत पड़ती है। 'मोदी चालीसा' के नाम पर आज यही हो रहा है : जो मोदी कहे, वही सही, बाकी सभी देशद्रोही। ऐसी दृष्टि का लोकतंत्र, समावेशीकरण और देश की एकता की रक्षा के लक्ष्य से कोई संबंध नहीं हो सकता। ऐसी दृष्टि मूल्यांकन भी नहीं कर सकती : न देश का, न जनता का, न अर्थव्यवस्था का, यहां तक कि सत्ता पक्ष का। ये केवल वैचारिक गुलाम होते है। एक विचार उभरता है उस कॉर्पोरेट-शीर्ष से, सत्ता का केंद्र जिसका बंधक है और यह विचार बिना किसी परिवर्धन, संशोधन, विमर्श और आलोचना के एक तीखे दुर्गंध के रूप में पूरे देश में फैलाकर बताया जाता है कि यही सुगंध है, इसे स्वीकार करो। जो इसके लिए तैयार नहीं है, वह इसी के साथ जीने को अपनी मजबूरी समझे। यही हिंदुत्व है, जिसका वास्तव में भारतीय विचार परंपरा और चिंतन के साथ कोई संबंध नहीं है। इस हिंदुत्व का असली उद्देश्य सत्ता के साथ गलबहियां करना है और अपने कॉर्पोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाना है। इसके लिए विचारहीनता का संजाल बुनना जरूरी होता है।

दुनिया में बर्बरता रही है और लूट भी है। लेकिन मानव सभ्यता कभी भी इसके पक्ष में नहीं रही है, उल्टे वह इसके खिलाफ़ लड़कर ही विकसित हुई है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। बर्बरता और लूट के खिलाफ जमीनी और वैचारिक संघर्ष जारी रहेगा और कोई तटबंध इस विचार प्रवाह को बांधकर नहीं रख सकता। फासीवाद के मानवद्रोही दृष्टि पर लोकतंत्र की उदार मानवपेक्षी दृष्टि ही विजयी होगी, जेन-ज़ी और जेन-अल्फा का उभरता संघर्ष इसी बात का संकेत है। संघी गिरोह के सरदार मोहन भागवत ने अमेरिका में जो प्रवचन दिया है, उससे भी यही बात साबित होती है कि विश्व बंधुत्व के विचारों पर नफरत का कोई भी विचार हमेशा के लिए हावी नहीं हो सकता। यह अलग बात है कि विवेकानंद बनने की कोशिश में 'भागवत-प्रवचन' हाथी का दिखने वाला दांत ही साबित हुआ है। भागवत की अमेरिका में कथनी से उनके संघी गिरोह की भारत में एकदम उल्टी करनी पूरी दुनिया देख रही है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना की खुली पोल

आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ को धन्यवाद देना चाहिए कि फर्जी जीडीपी वृद्धि के शोर के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री जन धन योजना की पोल खोल कर रख दी है। उन्हें आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, 12 अगस्त 2026 की स्थिति में देश भर में कुल 59,03,74,907 जन धन खाते थे। लेकिन 5,72,35,490 जन धन खातों में कोई बैलेंस नहीं है और 15,36,77,009 खाते निष्क्रिय हैं, याने इनमें लंबे समय से कोई लेन-देन नहीं हुआ है। इन आंकड़ों के साथ थोड़ा-सा गुणा-भाग कर लें, तो हम पाएंगे कि निष्क्रिय खातों सहित जिन खातों में रकम जमा है, उनमें भी औसतन 6000 रूपये से ज्यादा की राशि जमा नहीं है।

मोदी के वर्ष 2014 से सत्ता में आते ही यह बहुमहत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई थी, जिसका मुख्य मकसद आम जनता को बचत के लिए प्रोत्साहित करना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजना से जोड़ना था। ये आंकड़ें बताते हैं कि यह योजना, नोटबंदी की तरह ही, अपने दोनों उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रही है। इस योजना के तहत आम जनता को, शून्य बैलेंस पर जनधन खाते खोलने की सुविधा दी गई थी। 59 करोड़ से ज्यादा खाते खुलने का अर्थ है कि हमारे देश की वयस्क आबादी के बहुत बड़े हिस्से को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया। इन आंकड़ों के सहारे गोदी मीडिया में मोदी सरकार ने देश के विकास के भारी-भरकम दावे भी किए थे।

लेकिन आंकड़ों से साफ है कि विकास के दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। पिछले 12 सालों में करोड़ों लोगों की कुल बचत 6000 रूपये से ज्यादा नहीं है, यानी साल भर में वे मुश्किल से 500 रूपये भी नहीं बचा पाते। कुल मिलाकर, प्रति व्यक्ति बचत लगभग शून्य ही है। अर्थशास्त्रीय नजरों से देखें, तो जीडीपी में वृद्धि के साथ ही प्रति व्यक्ति बचत भी बढ़ना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न बचत हुई, न लोगों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ। किसानों और मजदूरों के हर साल बढ़ रहे आत्महत्या के आंकड़ें बताते हैं कि मामला ठन-ठन गोपाल है या 'ऋणम् कृत्वा घृतम् पीबेत' का है। इसका साफ अर्थ है कि या तो जीडीपी के आंकड़े गलत है या विकास लोगों तक पहुंच नहीं रहा है।

लेकिन दोनों ही निष्कर्ष सही है। वे अर्थशास्त्री भी, जो कभी सरकार से जुड़े थे, जीडीपी के आंकड़ों को तथ्यों के साथ चुनौती दे रहे हैं। मोदी सरकार का दावा है कि "2023-24 से 2026-27 तक की चार साल की अवधि में यह पहली तिमाही की सबसे ज़्यादा वास्तविक जीडीपी विकास दर है।" लेकिन वे बता रहे हैं कि जिस कदर जीडीपी गणना का फर्जीकरण किया गया है, उसे हिसाब में लिया जाएं, तो इस वर्ष की पहली तिमाही की जीडीपी 2.6 प्रतिशत से ऊपर नहीं बैठती। यह जीडीपी भी देश की आम जनता के हाथ में नहीं पहुंची है, बल्कि कॉर्पोरेट-तिजोरी में कैद हो गई है। यही कारण है कि आज भारत में आय और संपत्ति की असमानता पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है। इस असमानता के आंकड़ों को दुहराने की जरूरत नहीं है, केवल यही याद रखना काफी है कि मोदी सरकार के आंकड़ों के हिसाब से ही, देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर जिंदा है, इसके बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कटौती जारी है। आज देश की आधी आबादी, अपने बच्चों और महिलाओं की बड़ी संख्या के साथ, भुखमरी और कुपोषण का शिकार है। सरकारी जीडीपी ने उनकी किस्मत की रेखाओं को बदला नहीं है। जीडीपी से जुड़कर रोजगार, औसत मजदूरी और निवेश बढ़ने की भी यही हकीकत है कि बढ़ा कुछ नहीं है, सर्वनाश चौतरफा है।

जब सरकार की आखिरी सांस चल रही होती है, तो तमाम फुलाए गए गुब्बारे भी फूटने लगते हैं। चलाचली की बेला में मोदी सरकार के साथ भी यही हो रहा है।

(टिप्पणीकार संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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