गर्भवती कमांडो सुनेना पटेल की नक्सली इलाके में ड्यूटी

Atal Hind Team Online8 September 20265 min read25 viewsछत्तीसगढ़
गर्भवती कमांडो सुनेना पटेल की नक्सली इलाके में ड्यूटी

छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा इलाका देश के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां घने जंगलों, उबड़-खाबड़ रास्तों और नक्सली खतरे के बीच सुरक्षाबलों को हर पल मुस्तैद रहना पड़ता है। इस खतरनाक माहौल में पुरुष जवानों के साथ महिला जवान भी कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। इन्हीं में से एक निडर नाम है डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानी डीआरजी की महिला कमांडो सुनेना पटेल का।

दंतेवाड़ा/8 सितंबर2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नक्सली प्रभावित इलाके काफी चुनौती भरे हैं। वहां के घने जंगलों में सुरक्षा बलों को हर दिन मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी ही जगह पर एक महिला कमांडो ने अपनी ड्यूटी को आगे बढ़ाया। उनका नाम सुनेना पटेल है।

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सुनेना दंतेश्वरी फाइटर्स यूनिट में शामिल थीं। यह यूनिट जिला रिजर्व गार्ड के तहत काम करती है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गश्त करना और स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनका मुख्य काम था।

जब सुनेना इस टीम में शामिल हुईं तो वह दो महीने की गर्भवती थीं। उन्होंने इस बात की जानकारी अधिकारियों को तुरंत नहीं दी। वजह साफ थी। वह ऑपरेशन और गश्त में हिस्सा लेना चाहती थीं। ड्यूटी छोड़ना उनके मन में नहीं था।

गर्भावस्था के दौरान भी वह नियमित रूप से जंगलों में निकलती रहीं। उनके कंधे पर करीब 10 से 20 किलो का बैग होता था। हाथ में एके-47 जैसी राइफल रहती थी। साथ में अन्य जरूरी सामान भी लेना पड़ता था। उबड़-खाबड़ रास्ते, घने जंगल और लंबे समय तक पैदल चलना आम बात थी।

कई बार गश्त दो-तीन दिन तक चलती रहती थी। नदी पार करनी पड़ती, पहाड़ी इलाकों से गुजरना पड़ता। गर्मी, बारिश या ठंड का असर भी पड़ता। लेकिन सुनेना ने अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ी। वह अपनी टीम के साथ आगे बढ़ती रहीं।

अधिकारियों को जब उनकी गर्भावस्था की जानकारी मिली तो उन्होंने आराम करने की सलाह दी। सुनेना पहले तो तैयार नहीं थीं। वह कहती थीं कि जब तक संभव है ड्यूटी जारी रखना चाहती हैं। बाद में स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें हल्के काम पर लगा दिया गया।

इससे पहले भी एक बार ड्यूटी के दौरान उन्हें गर्भपात हो चुका था। उस घटना के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। दोबारा गर्भवती होने पर भी उन्होंने अपना काम जारी रखा। परिवार का साथ भी उनके साथ रहा। पति ने उन्हें कभी रोका नहीं। बल्कि उनका निर्णय सम्मान किया।

सुनेना होम गार्ड के रूप में अपनी सेवा शुरू की थीं। बाद में दंतेश्वरी फाइटर्स में शामिल हुईं। उनकी लगन और काम को देखते हुए उन्हें जिम्मेदारियां दी गईं। टीम लीडर की भूमिका भी निभाई। नक्सली मुठभेड़ों में उनकी भागीदारी रही।

जंगलों में गश्त करते समय कई चुनौतियां आती थीं। नक्सलियों का खतरा हमेशा बना रहता था। रास्ते में आईईडी या अन्य खतरों का सामना भी हो सकता था। फिर भी वह डटी रहीं। स्थानीय लोगों से बातचीत और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में भी योगदान दिया।

बाद में सुनेना ने स्वस्थ बेटी को जन्म दिया। मां और बच्ची दोनों ठीक रहे। परिवार में खुशी का माहौल था। सुनेना चाहती थीं कि उनकी बेटी भी मजबूत बने। वह अपनी जिंदगी से सीख लेकर आगे बढ़े।

उनकी कहानी कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी। दंतेवाड़ा में महिला कमांडो की संख्या बढ़ाने में भी उनका उदाहरण सहायक रहा। कई युवतियां सुरक्षा बलों में शामिल होने के लिए आगे आईं। अधिकारियों ने भी उनकी कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ की।

सुनेना का सफर आसान नहीं था। बचपन से लेकर अब तक कई मुश्किलें आईं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। गर्भावस्था के दौरान भी शारीरिक और मानसिक दबाव सहना पड़ा। फिर भी ड्यूटी को प्राथमिकता दी।

आज भी उनकी कहानी याद की जाती है। नक्सली इलाकों में महिला सुरक्षा बल की भूमिका को मजबूत करने वाले उदाहरणों में उनका नाम आता है। कर्तव्य, साहस और मातृत्व को साथ लेकर चलने की मिसाल है यह।सुनेना पटेल जैसी महिलाएं दिखाती हैं कि सही इरादा और मेहनत से मुश्किल हालात भी पार किए जा सकते हैं। घर और ड्यूटी दोनों जिम्मेदारियों को निभाना संभव है। उनकी यात्रा कई लोगों को आगे बढ़ने का हौसला देती है।

दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना आसान काम नहीं। महिला कमांडो अपनी उपस्थिति से स्थानीय विश्वास भी बढ़ाती हैं। सुनेना ने उसी दिशा में काम किया। नियमित प्रशिक्षण, टीम वर्क और अनुशासन उनके साथ रहे।गर्भावस्था के सातवें महीने तक भी वह गश्त पर जाती रहीं। बाद में अधिकारियों के कहने पर आराम किया। बेटी के जन्म के बाद भी वह फिर से ड्यूटी पर लौटने की इच्छा रखती थीं। परिवार की जिम्मेदारी और पेशेवर काम दोनों को संतुलित रखने की कोशिश जारी रही।

उनकी कहानी से यह साफ होता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति कितनी महत्वपूर्ण है। नक्सली प्रभावित इलाकों में काम करना जोखिम भरा है। फिर भी कई जवान और कमांडो रोजाना अपनी ड्यूटी निभाते हैं। सुनेना उनमें से एक थीं जिन्होंने अतिरिक्त चुनौती का सामना किया।आज जब हम उनकी यात्रा को देखते हैं तो साधारण शब्दों में कह सकते हैं कि कर्तव्य निभाना ही उनकी प्राथमिकता थी। गर्भवती होने के बावजूद 20 किलो तक के सामान के साथ जंगलों में निकलना आसान नहीं। लेकिन उन्होंने इसे निभाया।

परिवार का सहयोग, टीम का साथ और खुद का संकल्प इन सबने मिलकर इस सफर को संभव बनाया। बेटी के जन्म के बाद भी वह चाहती हैं कि उनकी संतान भी मजबूत और आत्मनिर्भर बने।सुनेना पटेल की यह यात्रा दिखाती है कि मुश्किल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ा जा सकता है। नक्सली इलाकों की चुनौतियां अलग हैं। लेकिन लगन और ईमानदारी से काम करने वाले लोग इनसे निपटते हैं। उनकी कहानी कई युवाओं खासकर महिलाओं के लिए उदाहरण बनी हुई है।

समय के साथ उनकी भूमिका और जिम्मेदारियां बढ़ीं। पदोन्नति भी मिली। लेकिन मूल बात वही रही। ड्यूटी के प्रति समर्पण। गर्भावस्था के दौरान भी उन्होंने आराम को प्राथमिकता नहीं दी जब तक जरूरी नहीं हुआ।आज भी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बल सक्रिय हैं। महिला कमांडो की भागीदारी बढ़ी है। सुनेना जैसी कहानियां इस दिशा में सकारात्मक असर डालती हैं। साधारण पृष्ठभूमि से आकर उन्होंने असाधारण काम किया।

उनके अनुभव से यह समझ आता है कि स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। अधिकारियों ने सही समय पर उन्हें आराम की सलाह दी। इससे मां और बच्ची दोनों सुरक्षित रहे। संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।सुनेना पटेल की पूरी यात्रा कर्तव्य, साहस और परिवार के बीच संतुलन की कहानी है। नक्सली प्रभावित जंगलों में गश्त करते हुए उन्होंने दिखाया कि महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा सकती हैं। उनकी मेहनत और लगन को सलाम।

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