गोमूत्र खरीद मॉडल: ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया विकल्प या चुनावी चमक, जानिए पूरी सच्चाई

उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर से गोमूत्र खरीद का नया पायलट मॉडल सामने आया है। इसे लेकर यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार गोमूत्र को सचमुच ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया उत्पाद बनाना चाहती है या यह केवल कागजी घोषणा बनकर रह जाएगी। इस योजना के तहत 15 गांवों से रोजाना करीब 500 लीटर गोमूत्र एकत्र करने का लक्ष्य रखा गया है। 500 लीटर प्रतिदिन का मतलब साल भर में करीब 1.82 लाख लीटर है। दस रुपये लीटर की दर से केवल खरीद पर सालाना लगभग 18.25 लाख रुपये खर्च होंगे और दर बीस रुपये होने पर यह खर्च 36.5 लाख रुपये पहुंच जाएगा।
बुलंदशहर और अन्य राज्यों के पुराने अनुभव
बुलंदशहर में यह प्रयोग बिल्कुल शून्य से शुरू नहीं हुआ है। नरसेना क्षेत्र में पिछले वर्षों से महिला समूह गोमूत्र संग्रह कर रहे हैं। 2023 में किसानों से 10 से 15 रुपये लीटर तक खरीद और जैविक खाद तथा कीटनाशक तैयार करने का दावा सामने आया था। 2024 की रिपोर्टों में दर्जन से अधिक गांवों में महिला समूहों के संग्रह केंद्र और 20 हजार लीटर से अधिक संचयन का उल्लेख मिला है। छत्तीसगढ़ में जुलाई 2022 में गोधन न्याय योजना के विस्तार के रूप में चार रुपये लीटर की दर से गोमूत्र खरीद शुरू हुई थी। गुजरात में बनास डेयरी ने 2025 में देशी कांकरेज गाय पालने वाले करीब 150 पशुपालकों से पांच रुपये लीटर की दर पर गोमूत्र खरीदने का पायलट शुरू किया है।
प्रसंस्करण, गुणवत्ता और महिलाओं की आय से जुड़े सवाल
ताजा गोमूत्र कोई दूध नहीं है जिसे सामान्य दुग्ध शृंखला की तरह तुरंत उठाकर हर जगह पहुंचाया जा सके। गांव में स्वच्छ संग्रह पात्र, ढक्कनयुक्त टैंक, फिल्ट्रेशन, बैच पहचान, परिवहन और प्रसंस्करण की समयसीमा तय करनी होगी। 300 महिलाओं को शेयरहोल्डर बनाना योजना का आकर्षक हिस्सा है, लेकिन 500 लीटर रोज पर दो रुपये प्रति लीटर कमीशन के हिसाब से कुल कमीशन एक हजार रुपये प्रतिदिन और करीब 3.65 लाख रुपये सालाना होगा। 300 महिलाओं में बराबर बांटने पर औसतन लगभग 1,217 रुपये सालाना यानी करीब 101 रुपये महीना बैठता है।
मांग पैदा करने और चुनावी चश्मे पर नजर
सरकार के लिए सबसे जरूरी काम खरीद दर बढ़ाना नहीं बल्कि मांग पैदा करना होना चाहिए। कृषि विभाग, आयुर्वेद संस्थान, कृषि विश्वविद्यालय, सहकारी समितियां और निजी कंपनियां मिलकर परीक्षण करें। इस योजना को 2027 की विधानसभा चुनावी तैयारी के चश्मे से भी देखा जा रहा है। गायों से जुड़ी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समस्या वास्तविक है और गोसंरक्षण तभी टिकेगा जब पशुपालन आर्थिक रूप से व्यवहार्य बने। सरकार को हर छह महीने खरीद, भुगतान, प्रसंस्करण, बिक्री और किसानों की आय के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए।