कलियुग में राम नाम की महिमा फैलाने वाले महान संत गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय

हिन्दी साहित्य के सूर्य, भक्ति के समुद्र और लोक चेतना के शिल्पी गोस्वामी तुलसीदास का नाम आते ही करोड़ों कंठों में केवल राम-राम ही गूंजता है। इस महान संत ने अपनी लेखनी से न केवल रामकथा को घर-घर पहुंचाया, बल्कि बिखरते समाज को एक सूत्र में भी बांधा। इस प्रतिभापुंज संत ने अपने जीवन और कृतित्व से कलियुग में राम नाम की पताका घर-घर में फहराने का विलक्षण कार्य किया। हमारे धर्म ग्रंथों में कहा जाता है कि जब-जब भगवान पृथ्वी पर अनाचार-अत्याचार की बढ़ती हुई आंधी को देखते हैं, तब-तब वे किसी महापुरुष को पृथ्वी पर भेजते हैं। उन्हीं महापुरुषों में महान संत तुलसीदास का अवतरण हुआ।
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म और वंश
हिन्दी के गौरव तिलक तुलसी का जन्म, वंश सभी मत-मतांतरों के घटाटोप से आच्छादित है। शिवसिंह सरोज, रामगुलाम द्विवेदी, डॉ. ग्रियर्सन, डॉ. माताप्रसाद गुप्त आदि विद्वान तुलसीदास जी का जन्म संवत् पंद्रह सौ नवासी विक्रमी मानते हैं। जबकि बाबा वेणी माधव दास तथा बाबा रघुवर दास 'गुसाईं-चरित' के आधार पर गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् पंद्रह सौ चौवन विक्रमी सिद्ध करते हैं, जो प्रसिद्ध है। पन्द्रह सौ चौवन बिसै कालिंदी के तीर। श्रावण शुक्ल सप्तमी तुलसी धरयो शरीर॥ इस महान संत के जन्म स्थान राजापुर (बांदा) अथवा सोरो (एटा) के संबंध में भी विवाद है। किंतु बहुमत राजापुर के ही पक्ष में है। इसी प्रकार कोई सरयूपारीण, कोई कान्यकुब्ज तथा कोई सनाढ्य ब्राह्मण बताते हैं।
कठिनाइयों भरा बाल्यकाल और शिक्षा
पिताश्री आत्माराम एवं माता हुलसी लोक प्रसिद्ध हैं। इसमें कोई संदेह की बात नहीं कि संत की माता हुलसी थी और तुलसी का बाल्यकाल बहुत कठिनाइयों में व्यतीत हुआ था। अनाथ बालक ने मुसीबतों भरे अपने दिन काटे थे। बाल्यावस्था में ही माता-पिता का निधन, अथवा अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म के कारण परित्याग सहना पड़ा। इसी असहाय परिस्थिति में बाबा नरहरिदास से भेंट हुई। इन्हीं महान विभूति नरहरिदास ने तुलसी के पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की। इन्होंने ही तुलसी के हृदय में राम नाम के प्रेम रूपी बीज बोए। कुछ समय पश्चात बाबा नरहरिदास इन्हें लेकर काशी पहुंचे। पंचगंगा घाट पर स्वामी रामानंद के स्थान पर ठहरे। यहीं पर अपने समय के महान विद्वान शेष सनातन रहे थे।
गृहस्थाश्रम और रामचरितमानस की रचना
जिन्होंने गोस्वामी जी को वेद, वेदांग, दर्शन, पुराण और अन्य शास्त्रों की शिक्षा दी। अनवरत अध्ययन के बाद गोस्वामी जी अपने जन्म स्थान राजापुर लौट आए और दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली के साथ पाणिग्रहण कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। तुलसी अपनी पत्नी पर बेहद अनुरक्त थे और विदुषी पत्नी द्वारा एक बार काव्यमय भर्त्सना किए जाने पर विरक्त होकर काशी चले गए और सन्यास ग्रहण कर लिया। राम भक्ति साहित्य सृजन और तीर्थ यात्रा इनके प्रिय कार्य हो गए। चित्रकूट में हनुमान जी की कृपा से तुलसीदास जी को हुए राम दर्शन विख्यात है। 1631 विक्रमी में रामचरित मानस की रचना आरंभ हुई और दो वर्ष सात माह में यह ग्रंथराज पूर्ण हुआ। अपने जीवन के उत्तर काल में पर्याप्त सम्मान प्राप्त हुआ।
भक्ति और समाज सुधार
गोस्वामी जी भावलोक के सम्राट थे। रसों के अधिपति, मौलिक उद्भावनाओं के धनी और कल्पना जगत के अधिष्ठाता थे। तुलसी की संपूर्ण कविता भक्ति काव्य है और राम भक्ति तुलसी की श्वासों का धन है जो उनके जीवन और कृतित्व में स्थापित है। तुलसी ने राम जन्म का कारण रामचरित मानस में स्पष्ट किया है। ऐसे राम भक्त तुलसी की भक्ति स्वार्थ के लिए नहीं अपितु जन कल्याण सिद्धि और धर्म वृद्धि के लिए हुई। बहुजन हिताय है तुलसी की भक्ति। तुलसी धर्म के माध्यम से विराट हिन्दू जाति को संगठित करना चाहते थे। उस समय संपूर्ण हिन्दू जाति विश्रृंखलित, विच्छिन्न, आदर्शहीन और लक्ष्यहीन हो रही थी। धार्मिक, सामाजिक और दार्शनिक भेदभाव हिन्दू जाति को खंड-खंड में विभाजित करने को तत्पर थे।