गुरुग्राम में सहस्त्र चंडी महायज्ञ और जन्माष्टमी पर हुआ विशेष अनुष्ठान, जगद्गुरु नरेंद्रानंद ने दिए प्रवचन

गुरुग्राम के पंचकोशी मार्ग स्थित आदि शंकराचार्य महासंस्थानम में सहस्त्र चंडी महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। यह महायज्ञ जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती महाराज के मार्गदर्शन और सानिध्य में चल रहा है। इस महायज्ञ पूजन का पांचवां दिन बहुत खास रहा क्योंकि इस दिन जन्माष्टमी का पावन अवसर था। जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किया गया। इस धार्मिक अनुष्ठान की जानकारी संस्थान के प्रवक्ता के द्वारा मीडिया से साझा की गई।
जन्माष्टमी पर महायज्ञ परिसर में काली जी के नाम विशेष अनुष्ठान
जन्माष्टमी के पावन अवसर पर महायज्ञ परिसर में काली जी के नाम विशेष अनुष्ठान किया गया। इस अनुष्ठान के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार गूंजते रहे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यज्ञ वेदी में पूरी विधि-विधान से विशेष आहुतियां अर्पित की गईं। इस दौरान पूरा महायज्ञ परिसर देवी उपासना और मंत्रोच्चार से गूंजता रहा। इसके साथ ही महायज्ञ परिसर में भगवान श्रीकृष्ण के जयघोष भी गूंजते रहे।
भगवान श्रीकृष्ण और मां काली एक ही परम शक्ति के विभिन्न स्वरूप
जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती महाराज ने जन्माष्टमी के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और मां काली अलग-अलग नहीं हैं। वे दोनों कोई अलग शक्ति नहीं बल्कि एक ही परम शक्ति के विविध स्वरूप हैं। उन्होंने आगे बताया कि सनातन धर्म में परम तत्व की अनुभूति अनेक स्वरूपों में की जाती है। श्रीकृष्ण धर्म की स्थापना और प्रेम के प्रतीक हैं। इसके अलावा श्रीकृष्ण करुणा और लोकमंगल के भी प्रतीक माने जाते हैं। मां काली अधर्म और अज्ञान का नाश करती हैं। मां काली अहंकार और नकारात्मक शक्तियों के विनाश की शक्ति का स्वरूप हैं। दोनों स्वरूपों का मूल उद्देश्य धर्म की रक्षा करना है। दोनों स्वरूपों का उद्देश्य मानवता का कल्याण करना भी है।
धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने लिया था अवतार
जन्माष्टमी हिंदू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह पर्व हम सभी को भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का स्मरण कराता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा था। जब पृथ्वी पर अत्याचार और असत्य का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया था। तब धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था। श्रीकृष्ण का जीवन मानव समाज को एक विशेष प्रेरणा देता है। उनका जीवन हमें धर्म और कर्म के मार्ग पर चलना सिखाता है। उनका जीवन हमें प्रेम, करुणा, नीति और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। जन्माष्टमी के दिन सभी श्रद्धालु उपवास रखते हैं। श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का विधि-विधान से पूजन करते हैं। मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव को बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु इस जन्मोत्सव को बहुत उल्लास के साथ मनाते हैं।
श्रीकृष्ण का संदेश मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देता है
शंकराचार्य महाराज ने बताया कि जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए। इस अवसर पर मां काली का स्मरण करना भी बहुत जरूरी है। यह स्मरण सनातन धर्म की व्यापक आध्यात्मिक दृष्टि को दर्शाता है। कृष्ण का संदेश मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देता है। वहीं दूसरी ओर काली शक्ति व्यक्ति के भीतर के भय को मिटाती है। काली शक्ति व्यक्ति के भीतर के अज्ञान और नकारात्मकता का नाश करती है। इसलिए कृष्ण और काली का पूजन करना असल में एक ही परम चेतना के दो आयामों का पूजन है।
महायज्ञ के पांचवें दिन रहा विशेष उत्साह और भक्ति का वातावरण
महायज्ञ के पांचवें दिन सभी श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धा के साथ भाग लिया। श्रद्धालुओं ने इस विशेष अनुष्ठान में बढ़-चढ़कर सहभागिता की। सभी ने यज्ञ वेदी में आहुतियां अर्पित कीं। यज्ञ वेदी में आहुतियां देकर राष्ट्र की सुख-समृद्धि की कामना की गई। इसके साथ ही विश्व कल्याण और सामाजिक शांति के लिए प्रार्थना की गई। सभी प्राणियों के मंगल की कामना भी इस दौरान की गई। जन्माष्टमी का पर्व होने के कारण महायज्ञ परिसर में विशेष उत्साह देखा गया। महायज्ञ परिसर में भक्ति का एक अद्भुत वातावरण दिखाई दिया। वैदिक मंत्रोच्चार, देवी स्तुति और श्रीकृष्ण के जयघोष से पूरा वातावरण गूंज उठा। पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दे रहा था। इस अवसर पर कई गणमान्य संत महात्मा उपस्थित रहे। मौके पर मिथिलेश दीक्षित लखनऊ से उपस्थित रहे। बाबूलाल मुवडा जयगाव भूटान से उपस्थित रहे। सच्चिदानंद तिवारी, बृजभूषानंद सरस्वती और रामलखन दास नागा सहित सैकड़ों संत महात्मा उपस्थित रहे।