सुनीता तोमर की कहानी: गुटखा-तंबाकू के खतरे

सुनीता तोमर की दर्दभरी कहानी: गुटखा-तंबाकू के खतरे और निकोटिन की लत से मुक्ति का सच
नई दिल्ली / 15 अगस्त 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
तंबाकू और गुटखे की लत देश में लाखों जिंदगियों को हर साल खामोशी से निगल रही है। यह सिर्फ एक लत नहीं, बल्कि एक ऐसा धीमा ज़हर है जो इंसान को अंदर से खोखला कर देता है। मध्य प्रदेश की रहने वाली सुनीता तोमर की कहानी इसका सबसे बड़ा और दर्दनाक उदाहरण है। मात्र 28 साल की छोटी सी उम्र में गुटखा और तंबाकू के सेवन के कारण सुनीता ओरल कैंसर यानी मुंह के कैंसर का शिकार हो गई थीं।
कैंसर इतना भीषण था कि डॉक्टरों को उनका आधा जबड़ा और गला काटकर अलग करना पड़ा। बेहद दर्द और तकलीफ झेलने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और तंबाकू विरोधी अभियान का चेहरा बनीं। अपनी मृत्यु से ठीक दो दिन पहले सुनीता तोमर ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में उन्होंने लिखा था कि जो दर्द और तकलीफ मैं झेल रही हूं, वह देश का कोई और नागरिक न झेले। उनके इस भावुक पत्र ने पूरे देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया था।
संसदीय बयान का विवाद और चेतावनी का कड़ा फैसला
सुनीता तोमर के इस पत्र के पीछे एक बड़ी वजह वह बयान भी था, जो उस समय टीवी समाचारों में छाया हुआ था। एक राजनेता ने यह विवादित टिप्पणी कर दी थी कि तंबाकू से कैंसर होने का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इस बयान से मर्माहत होकर सुनीता ने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि तंबाकू और गुटखे के विज्ञापनों तथा पैकेजों पर सख्त नियम बनाए जाएं।
सुनीता तोमर की इस मुहिम और जनहित की मांग के बाद सरकार ने बड़ा फैसला लिया। देश में बिकने वाले हर गुटखा, खैनी और तंबाकू के पैकेट पर 85 प्रतिशत हिस्से में कैंसर की खौफनाक और सचित्र चेतावनी छापना अनिवार्य कर दिया गया। इस कदम का मकसद था कि लोग पैकेट देखते ही इसके भयानक परिणामों को समझ सकें और इस लत से दूर रहें।
85% चेतावनी के बाद भी क्यों नहीं घट रहे आंकड़े?
पैकेजों पर खौफनाक तस्वीरें छापने के बावजूद आज भी हालात पूरी तरह से नहीं बदले हैं। स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक, भारत में आज भी हर साल लगभग 13 लाख से अधिक लोग गुटखा और तंबाकू जनित बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।
सवाल उठता है कि आखिर इतनी चेतावनियों के बाद भी लोग गुटखा और तंबाकू छोड़ क्यों नहीं पाते? विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल स्वाद या आदत की नहीं है, बल्कि इसके पीछे निकोटिन की तीव्र लत है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक गुटखे का सेवन करता है, तो उसका शरीर निकोटिन पर निर्भर हो जाता है। ऐसे में बिना सही चिकित्सा और विकल्प के इस आदत को अचानक छोड़ पाना बेहद कठिन होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और निकोटिन गम्स का विकल्प
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने तंबाकू और गुटखे की लत छुड़ाने के लिए 'निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी' (NRT) को एक कारगर माध्यम माना है। इसके तहत 2 मिलीग्राम (2mg) निकोटिन गम्स का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।
हाल के दिनों में 'राइज' (Ryze) जैसी निकोटिन गम्स इसी सिद्धांत पर बनाई गई हैं। जब भी किसी व्यक्ति को गुटखा या तंबाकू खाने की तीव्र तलब (Craving) उठती है, तो वह इस गम को चबा सकता है। इसकी स्लो-रिलीज़ टेक्नोलॉजी शरीर में धीरे-धीरे निकोटिन पहुंचाती है, जिससे गुटखे की तलब शांत होती है और धीरे-धीरे व्यक्ति की आदत छूटने लगती है। आंकड़ों के अनुसार, करीब 10 लाख से अधिक लोग इस तरीके से तंबाकू मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं।
जन-जागरूकता और समाज के सहयोग की जरूरत
केवल नियम-कानून या विकल्प उपलब्ध करा देने से यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। इसके लिए पूरे समाज, युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों को मिलकर एक साथ आगे आना होगा। जब तक जमीनी स्तर पर जागरूकता नहीं फैलेगी, तब तक मासूम जानें गुटखे की भेंट चढ़ती रहेंगी।
सुनीता तोमर ने जो लड़ाई शुरू की थी, उसे अंजाम तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। गुटखा और तंबाकू को ना कहकर ही हम एक स्वस्थ और कैंसर मुक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं।