हांसी कांड: आंदोलनकारियों पर कार्रवाई, पुलिस पर एफआईआर क्यों नहीं?

हांसी में जीवन कुंडू हत्याकांड को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर 15 अगस्त के दिन लाठीचार्ज बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।
हरियाणा में अपराध लगातार बढ़ता और बेलगाम होता जा रहा है, लेकिन सरकार अपराधियों पर शिकंजा कसने के बजाय न्याय की मांग कर रही जनता की आवाज दबाने में लगी है।
वह भी तब, जब मुख्यमंत्री स्वयं हांसी में मौजूद थे। न्याय की मांग कर रही जनता पर लाठीचार्ज करना लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं, बल्कि तानाशाही की मानसिकता को दर्शाता है।
जब पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा हो और मुख्य आरोपी अभी तक गिरफ्तार न हुआ हो, तो यह हरियाणा की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
सरकार तुरंत मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करे, पीड़ित परिवार को न्याय दे और पूरे मामले की तत्काल निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे।

हांसी में गिरफ्तार किये गए किसान नेताओं की सूची
राजकुमार अग्रवाल की रिपोर्ट
चंडीगढ़ /16 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
हरियाणा के हांसी में दोहरा रवैया: प्रदर्शनकारियों पर मुकदमे, लेकिन लाठीचार्ज करने वाली पुलिस पर कार्रवाई क्यों नहीं?
हरियाणा के हिसार जिले का हांसी शहर इन दिनों एक गंभीर और संवेदनशील कानूनी सवाल के केंद्र में है। मृतक जीवन लाल के हत्यारों की जल्द गिरफ्तारी की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद प्रशासन की कार्यशैली पर कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि जब झड़प में दोनों पक्ष शामिल थे, तो कानूनी कार्रवाई सिर्फ एक ही पक्ष यानी आम जनता और प्रदर्शनकारियों पर क्यों की गई? आखिर कानून की नजर में दोहरा रवैया क्यों अपनाया जा रहा है?
हरियाणा के हांसी शहर में 15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक बड़ा विवाद हो गया। हिसार के सूर्य नगर में डेयरी संचालक जीवन कुंडू की 4 अगस्त को पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। उनके परिवार और किसान संगठनों, खापों ने मुख्य आरोपी रमेश शर्मा समेत सभी हत्यारों की जल्द गिरफ्तारी की मांग की थी। पुलिस ने अब तक नौ आरोपियों को पकड़ लिया है, लेकिन मुख्य आरोपी अभी भी फरार है। इस मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के हांसी में तिरंगा फहराने वाले कार्यक्रम की ओर बढ़ने की कोशिश की।
यहीं पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच मुठभेड़ हो गई। दोनों तरफ से पथराव हुआ। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। नतीजा यह रहा कि हांसी के पुलिस अधीक्षक (एसपी) विनोद कुमार, एक डीएसपी समेत कई पुलिसकर्मी घायल हुए। कई प्रदर्शनकारी भी चोटिल हुए। कुछ महिलाओं और बुजुर्गों के भी घायल होने की खबरें आईं।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली। करीब 150-200 लोगों के नाम लिए गए। प्रयास हत्या, दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा जैसी धाराएं लगाई गईं। दस किसान नेताओं को गिरफ्तार कर कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इनमें सुरेश कोथ, शमशेर नंबरदार जैसे नाम शामिल हैं।
अब सवाल उठ रहा है कि दोनों पक्षों पर एक जैसी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर निहत्थे या शांतिपूर्ण तरीके से आए आंदोलनकारी दोषी माने गए तो लाठीचार्ज करने वाली पुलिस पर भी कार्रवाई क्यों नहीं? जनता पर लाठी चलाने या अत्यधिक बल प्रयोग के खिलाफ पुलिस पर हत्या के प्रयास या चोट पहुंचाने की एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? पुलिस की कार्यशैली सब पर एक जैसी क्यों नहीं?
घटना की पूरी कहानी आसान भाषा में
4 अगस्त की सुबह हिसार के सूर्य नगर में जीवन कुंडू कचरा फेंकने निकले थे। पड़ोसियों के एक समूह ने उन पर लाठियों और डंडों से हमला कर दिया। वे बेहोश हो गए। परिवार ने अस्पताल पहुंचाया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस ने 15 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया। अब तक नौ आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं। मुख्य आरोपी रमेश शर्मा फरार है। पुलिस ने 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया है और लुकआउट नोटिस जारी किया है। दस टीमें उसकी तलाश में लगी हुई हैं।
परिजन और किसान संगठन धरना दे रहे थे। उन्होंने 14 अगस्त को टोल प्लाजा बंद करने और 15 अगस्त को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का विरोध करने का ऐलान किया था। उनका कहना था कि मुख्य आरोपी प्रभावशाली लोगों से जुड़ा है, इसलिए गिरफ्तारी में देरी हो रही है। (हालांकि संबंधित विधायक ने इन आरोपों से इनकार किया है।)
15 अगस्त की सुबह सैकड़ों प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य वाहनों से हांसी पहुंचे। महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे। पुलिस ने सिसाय पुल और अन्य जगहों पर नाकाबंदी कर दी। प्रदर्शनकारियों को कार्यक्रम स्थल (राजकीय महाविद्यालय मैदान) की ओर जाने से रोका गया। बात बढ़ी। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। प्रदर्शनकारियों ने पथराव शुरू कर दिया। एसपी विनोद कुमार के हाथ में पत्थर लगा। वे रुमाल से खून रोकते नजर आए। एक डीएसपी और अन्य जवान भी घायल हुए।

वीडियो में एसपी और कुछ पुलिसकर्मी (कुछ सिविल ड्रेस में) पत्थर फेंकते भी दिखे। एसपी का कहना था कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए यह जरूरी था। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने पहले आक्रामक रुख अपनाया। एक न्याय समिति ने शिकायत की है कि सीआईए इंचार्ज ने एके-47 तानकर धमकी दी। महिला प्रदर्शनकारियों और बुजुर्गों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट के आरोप भी लगे हैं। समिति ने डीजीपी, राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेजी है।
सिर्फ एक तरफ कार्रवाई क्यों?
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर तुरंत एफआईआर दर्ज कर दी। प्रयास हत्या जैसी गंभीर धाराएं लगाईं। दस नेताओं को जेल भेज दिया। लेकिन पुलिस पर कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई। एसपी या अन्य अधिकारियों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चला।
लोग पूछ रहे हैं – कानून सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। अगर प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और पुलिसकर्मी घायल हुए तो उनके खिलाफ कार्रवाई सही है। लेकिन अगर पुलिस ने भी पथराव किया, लाठीचार्ज में लोग घायल हुए, महिलाओं-बुजुर्गों पर बल प्रयोग किया तो उन पर भी समान धाराएं क्यों नहीं लगाई गईं? निहत्थे या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर लाठी चलाना भी तो बल प्रयोग है। भारतीय कानून में पुलिस को भी जवाबदेह बनाया जा सकता है।
सिर्फ जनता पर कार्रवाई, पुलिस को छूट क्यों?
घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए कई नामजद और सैकड़ों अज्ञात आंदोलनकारियों के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने, दंगा भड़काने और पुलिस पर हमला करने जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली। कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया।
लेकिन इस पूरी कार्रवाई में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि जिस पुलिस बल पर निहत्थी जनता पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करने के आरोप लगे, उनके खिलाफ एक भी शिकायत या एफआईआर दर्ज नहीं की गई। अब स्थानीय लोगों और कानून के जानकारों का कहना है कि:
यदि उग्र हुई जनता दोषी है, तो लाठी चलाने में अपनी सीमाएं लांघने वाले पुलिसकर्मी दोषी क्यों नहीं हैं?
जब आम नागरिकों पर पुलिस कर्मियों को चोट पहुंचाने के लिए मुकदमा दर्ज हो सकता है, तो गंभीर रूप से घायल हुए नागरिकों की शिकायत पर एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई?
क्या कानून केवल आम नागरिकों के अधिकार छीनने और उन पर मुकदमे दर्ज करने के लिए है?
विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं। सांसद कुमारी शैलजा ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। किसान संगठनों ने कहा है कि न्याय की मांग करने वालों पर लाठियां बरसाना गलत है। हत्या के आरोपी को नहीं पकड़ पाए और मांग करने वालों को जेल भेज दिया। यह पक्षपात लगता है।
पुलिस का पक्ष यह है कि प्रदर्शनकारियों ने कार्यक्रम बाधित करने की कोशिश की। भारी भीड़ थी। कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी था। पथराव शुरू होने पर जवाबी कार्रवाई की गई। कई पुलिसकर्मी घायल हुए इसलिए एफआईआर दर्ज की गई।
पुलिस की कार्यशैली सब पर एक जैसी होनी चाहिए
लोकतंत्र में पुलिस का काम कानून लागू करना है, किसी एक पक्ष का नहीं। अगर आम आदमी गलती करता है तो उसके खिलाफ केस चलता है। उसी तरह अगर पुलिसकर्मी अत्यधिक बल प्रयोग करते हैं, निर्दोष लोगों को चोट पहुंचाते हैं तो उनके खिलाफ भी जांच होनी चाहिए।
कई राज्यों में लाठीचार्ज या बल प्रयोग के मामलों में मानवाधिकार आयोग जांच करता है। कभी-कभी पुलिसकर्मियों पर भी एफआईआर दर्ज होती है। यहां भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। वीडियो फुटेज हैं। गवाह हैं। घायलों के मेडिकल रिपोर्ट हैं। इनके आधार पर दोनों पक्षों की गलती तय की जा सकती है।
अगर प्रदर्शनकारी दोषी हैं तो सजा मिले। अगर पुलिस ने नियम से ज्यादा बल प्रयोग किया तो उन पर भी कार्रवाई हो। सिर्फ एक तरफ मुकदमा चलाना विश्वास कमजोर करता है। लोग सोचते हैं कि पुलिस सत्ता के पक्ष में काम करती है।
जीवन कुंडू का परिवार अभी भी न्याय की राह देख रहा है। मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई। शरीर अभी अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा में है, ऐसा कुछ रिपोर्टों में कहा गया। धरना जारी है। हिसार में भी विरोध प्रदर्शन हुए।
पुलिस की कार्यशैली पर उठते निष्पक्षता के सवाल
भारतीय संविधान और हमारी न्याय प्रणाली के तहत कानून के सामने हर व्यक्ति समान है, चाहे वह आम नागरिक हो या खाकी वर्दी में तैनात कोई अधिकारी। अगर किसी घटना में दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़प होती है, तो निष्पक्ष जांच का पहला सिद्धांत यह कहता है कि दोनों तरफ से आई शिकायतों को दर्ज किया जाए और सबूतों के आधार पर कार्रवाई की जाए।
हांसी में हुई इस घटना ने पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर गहरा दाग लगा दिया है। जब निहत्थे लोग न्याय की गुहार लगा रहे थे, तब उन पर लाठियां भांजना और बाद में उन्हीं को अपराधी ठहरा देना किस तरह का न्याय है? पीड़ित परिवार का तो यह भी कहना है कि मूल मामला यानी जीवन लाल के हत्यारों की गिरफ्तारी मुख्य मुद्दे से भटक गई है और अब पूरी लड़ाई पुलिस बनाम जनता बन चुकी है।
आगे क्या होना चाहिए?
मुख्य आरोपी रमेश शर्मा को जल्द गिरफ्तार किया जाए।
15 अगस्त की मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच हो। दोनों पक्षों की गलतियों पर समान कार्रवाई हो।
घायल प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों का सही इलाज हो।
पुलिस की कार्यशैली में सुधार हो ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न बढ़ें।
कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। चाहे आम आदमी हो या पुलिसवाला। निहत्थे आंदोलनकारियों पर लाठी चलाना और फिर सिर्फ उन्हीं पर मुकदमा चलाना सही नहीं लगता। पुलिस पर भी अगर गलती साबित हो तो एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। तभी न्याय की भावना मजबूत होगी।
हांसी की इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि पुलिस की कार्यशैली पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। जनता का भरोसा बनाए रखना बहुत जरूरी है। जीवन कुंडू जैसे मामलों में जल्द न्याय मिले और प्रदर्शनकारियों-पुलिस दोनों पर एक जैसा कानून लागू हो। यही सही रास्ता है।