हरियाणा में बढ़ रहे हैं दलित उत्पीड़न की घटनाओं के अदालती केस, आंकड़े आए सामने

हरियाणा में बढ़ रहे हैं दलित उत्पीड़न की घटनाओं के अदालती केस, आंकड़े आए सामने

चंडीगढ़ में 12 अगस्त को मिली जानकारी के अनुसार, हरियाणा में अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अत्याचार से संबंधित अदालती मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। दलितों को अदालतों से केवल तारीख मिल रही है। साल 2022 में ऐसे कुल 1633 मामले दर्ज किए गए थे, जो साल 2024 में घटकर 1077 रह गए हैं।

लंबित मामलों की संख्या में हुई बढ़ोतरी

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इसके बावजूद अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 3119 से बढ़कर 3910 हो गई है। कुरुक्षेत्र से भाजपा सांसद नवीन जिंदल के लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने ये सभी आंकड़े दिए हैं। साल 2024 में दर्ज किए गए 1077 मामलों में से केवल 661 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किया गया, जबकि सिर्फ 56 मामलों में ही दोषसिद्धि हुई है। साल के अंत तक कुल 3910 मामले लंबित पड़े हुए थे। इसका मतलब यह है कि नए मामलों में कमी आने के बावजूद पुराने मामलों के निपटारे की रफ्तार लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए पर्याप्त नहीं रही है।

तीन साल के आंकड़ों की स्थिति

साल 2022 से 2024 के बीच नए मामलों की संख्या 1633 से घटकर 1077 रह गई, यानी इसमें करीब 34 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इसके बिल्कुल उलट लंबित मामलों की संख्या 3119 से बढ़कर 3910 हो गई है। इन तीन वर्षों की अवधि के दौरान लंबित मामलों में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। साल 2023 में 1539 नए मामले दर्ज किए गए थे और साल के अंत में कुल 3569 मामले लंबित थे। इसका सीधा अर्थ यह है कि तीन साल में नए मामलों की संख्या में 556 की कमी जरूर आई, लेकिन अदालतों में लंबित मामलों का बोझ 791 मुकदमों और अधिक बढ़ गया है।

विशेष अदालतों का अभाव

हरियाणा राज्य में एससी और एसटी अत्याचार से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए अब तक कोई भी एक्सक्लूसिव स्पेशल कोर्ट स्थापित नहीं की गई है। केंद्र सरकार के अनुसार, देश के 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसी कुल 217 विशेष अदालतें गठित की जा चुकी हैं। हालांकि, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश समेत कुल 10 ऐसे राज्य हैं जहां अभी तक इस तरह की विशेष अदालतें नहीं बनाई गई हैं। कानून की धारा 14 के प्रावधानों के तहत राज्य सरकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की आपसी सहमति से इस प्रकार के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालत स्थापित कर सकती है।

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