हरियाणा में 2022 से 2026 तक नियुक्त नए कर्मचारियों का तबादला क्यों नहीं?

हरियाणा में 2022 से 2026 तक नियुक्त नए कर्मचारियों का तबादला क्यों नहीं?
नियुक्ति पत्र में अगली ऑनलाइन प्रक्रिया में भागीदारी की अनिवार्य शर्त, फिर वर्तमान अभियान से बाहर क्यों?
— डॉ. विजय गर्ग
हरियाणा सरकार की ऑनलाइन तबादला नीति का मूल उद्देश्य तबादलों में पारदर्शिता, समान अवसर, निष्पक्षता और प्रशासनिक दक्षता सुनिश्चित करना है। ऑनलाइन व्यवस्था इसलिए लागू की गई ताकि मनमाने प्रशासनिक विवेक, पसंद-नापसंद और असमान व्यवहार की संभावना कम हो तथा पात्र कर्मचारियों को स्पष्ट नियमों के तहत तबादला प्रक्रिया में भाग लेने और अपनी पसंद प्रस्तुत करने का अवसर मिले। लेकिन किसी भी नीति की सफलता केवल नियम बनाने से नहीं, बल्कि उनके तार्किक, और निष्पक्ष क्रियान्वयन से तय होती है। इसी संदर्भ में 2022 से 2026 के बीच नियुक्त कर्मचारियों का प्रश्न गंभीर विचार की मांग करता है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब इस अवधि में नियुक्त सभी शिक्षकों को अनिवार्य रूप से ऑनलाइन तबादला प्रक्रिया में भाग लेना पड़ रहा है, तो अन्य विभागों के समान अवधि में नियुक्त कर्मचारियों को इससे पीछे क्यों रखा जा रहा है? यदि शिक्षकों को नीति के तहत अनिवार्य भागीदारी के दायरे में लाया जा सकता है, तो समान अवधि में नियुक्त अन्य पात्र कर्मचारियों के लिए अलग व्यवस्था का स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत आधार भी होना चाहिए। यहां मांग किसी कर्मचारी को उसकी पसंद के स्थान पर तबादला देने की नहीं, बल्कि पात्र होने पर प्रक्रिया में भाग लेने, विकल्प देने और नियमों के अनुसार विचार किए जाने के समान अवसर की है।
इस विषय में 23 मई 2025 की कट-ऑफ तिथि, “नोशनल श्रेणी” और 2026 की मॉडल ऑनलाइन तबादला नीति में प्रयुक्त “प्रत्येक कैडर का पहला ऑनलाइन तबादला अभियान” जैसे प्रावधान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इन प्रावधानों को समझने के लिए संबंधित कैडर का वास्तविक प्रशासनिक इतिहास देखना आवश्यक है। यदि किसी कैडर में 2026 में पहली बार ऑनलाइन तबादला अभियान हो रहा है, तो उसकी स्थिति उस कैडर से अलग हो सकती है जिसमें 2017 से ऑनलाइन तबादला अभियान होते रहे हैं। इसलिए एक ही कट-ऑफ को सभी कैडरों पर यांत्रिक रूप से लागू करने से पहले उनके वास्तविक नीतिगत इतिहास को देखना आवश्यक है।
समानता का प्रश्न केवल शिक्षकों और अन्य विभागों तक सीमित नहीं है। कुछ विभागों में ऑनलाइन तबादला नीति लागू होने और ऑनलाइन अभियान आयोजित किए जाने के बावजूद कर्मचारियों को ऑनलाइन स्टेशन आवंटित किए जाने की स्थिति भी गंभीर विचार की मांग करती है। हरियाणा के पशुपालन विभाग का उदाहरण इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। विभाग में 2020 से वीएलडीए कैडर के लिए ऑनलाइन तबादला नीति लागू है और इसके अंतर्गत दो ऑनलाइन तबादला अभियान भी हो चुके हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार, 2020 के बाद नियुक्त वीएलडीए कैडर के लगभग 50 प्रतिशत कर्मचारियों को ऑनलाइन स्टेशन आवंटित किए गए। यदि यह आंकड़ा विभागीय अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि ऑनलाइन तबादला नीति और उसके अंतर्गत अभियान पहले से लागू होने के बावजूद इतने बड़े स्तर पर ऑनलाइन स्टेशन आवंटित करने का आधार क्या था।
प्रश्न इससे भी गंभीर तब बनता है जब ऐसे कर्मचारियों के नियुक्ति पत्र अथवा स्टेशन आवंटन संबंधी दस्तावेजों में यह शर्त दर्ज रही हो कि उन्हें अगले ऑनलाइन तबादला अभियान में अनिवार्य रूप से भाग लेना होगा। यदि कर्मचारी को ऑफलाइन स्टेशन देते समय सरकार ने स्वयं यह शर्त रखी कि अगली ऑनलाइन प्रक्रिया में उसे भाग लेना होगा, तो बाद में किसी नई व्याख्या या आदेश के आधार पर उसी कर्मचारी को ऑनलाइन अभियान से बाहर करना प्रशासनिक न्याय और वैध अपेक्षा का गंभीर प्रश्न पैदा करता है।
कर्मचारी ने यदि ऐसी शर्त को स्वीकार करते हुए ऑफलाइन स्टेशन पर कार्यभार संभाला, तो यह स्वाभाविक अपेक्षा बनी कि अगली ऑनलाइन तबादला प्रक्रिया में उसे अनिवार्य भाग लेने का अवसर मिलेगा। बाद में उसी कर्मचारी को उस प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए तो यह केवल तबादले का विषय नहीं रह जाता, बल्कि नीतिगत निरंतरता और प्रशासनिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है। सरकार द्वारा पहले निर्धारित शर्त और बाद में अपनाई गई व्याख्या के बीच स्पष्टता आवश्यक है।
विशेषकर वे कर्मचारी जो पहले ऑनलाइन तबादला अभियानों में भाग लेते रहे हैं, उनकी स्थिति पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया, विकल्प दिए और ऑनलाइन व्यवस्था में भाग लिया। यदि 2022 से 2026 के बीच नियुक्त कर्मचारियों को वर्तमान अभियान में अनिवार्य रूप से शामिल नहीं किया जाता, तो पहले से ऑनलाइन प्रक्रिया में भाग लेते रहे कर्मचारियों की पसंद और अवसर भी निश्चित तौर पर प्रभावित होंगे। ऐसी स्थिति में यह सवाल स्वाभाविक है कि पहले की भागीदारी का वर्तमान प्रक्रिया में क्या महत्व रहेगा। किसी कर्मचारी को पहले ऑनलाइन व्यवस्था का हिस्सा बनाना और बाद में उसी व्यवस्था की अगली प्रक्रिया में उसके विकल्प सीमित कर देना नीतिगत निरंतरता पर प्रश्न खड़ा करता है।
यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि तबादले का अधिकार और तबादला प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर अलग-अलग बातें हैं। किसी कर्मचारी को ऑनलाइन प्रक्रिया में शामिल करना, उससे विकल्प लेना और उसके दावे पर नियमों के अनुसार विचार करना, उसे उसकी पसंद के स्थान पर तबादला देने की गारंटी नहीं है। अंतिम निर्णय रिक्तियों, पात्रता, कैडर की स्थिति, प्राथमिकता और प्रशासनिक आवश्यकता जैसे निर्धारित मानकों के आधार पर हो सकता है। इसलिए पात्र कर्मचारियों को प्रक्रिया में शामिल करने से प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर नहीं होता, बल्कि पारदर्शिता मजबूत होती है।
यहीं 2026 की मॉडल ऑनलाइन तबादला नीति की वास्तविक भूमिका सामने आती है। यदि यह नीति ऑनलाइन तबादलों के लिए एक मॉडल और समान सिद्धांत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाई गई है, तो उसके मूल सिद्धांत—पारदर्शिता, पात्रता, समान अवसर, विकल्प देने की प्रक्रिया और नियमबद्ध निर्णय—समान परिस्थितियों वाले सभी कर्मचारियों पर लागू होने चाहिए। यदि यह केवल शिक्षकों के लिए विशेष नीति है, तो इसकी सीमा स्पष्ट होनी चाहिए। लेकिन यदि इसे व्यापक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, तो अन्य विभागों में समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को इससे अलग रखने का औचित्य भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
सरकार को इस पूरे मामले में कैडर-वार तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। वर्ष 2017 से प्रत्येक कैडर में कितने ऑनलाइन तबादला अभियान हुए, किन वर्षों में कर्मचारियों को भाग लेने का अवसर मिला, 2022 से 2026 के बीच नियुक्त कर्मचारियों की स्थिति क्या थी, किन कर्मचारियों को ऑनलाइन स्टेशन दिए गए और किनके नियुक्ति पत्रों में अगली ऑनलाइन प्रक्रिया में भागीदारी की शर्त थी—इन सभी तथ्यों का स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए। इससे विवाद भावनात्मक आरोपों के बजाय तथ्यात्मक आधार पर हल हो सकेगा।
23 मई 2025 की कट-ऑफ को भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। सरकार बताए कि “प्रत्येक कैडर का पहला ऑनलाइन तबादला अभियान” किसे माना जाएगा और उन कैडरों की स्थिति क्या होगी जिनमें 2017 से लगातार ऑनलाइन अभियान होते रहे हैं। इसी प्रकार नेशनल श्रेणी का प्रभाव पुराने प्रतिभागियों तथा 2022 से 2026 के बीच नियुक्त नए कर्मचारियों पर किस प्रकार पड़ेगा, यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
अंततः यह केवल एक कट-ऑफ तिथि या तकनीकी श्रेणी का विवाद नहीं है। असली सवाल समान अवसर, नीतिगत निरंतरता और प्रशासनिक न्याय का है। यदि 2022 से 2026 तक नियुक्त सभी शिक्षकों को अनिवार्य रूप से ऑनलाइन तबादला प्रक्रिया में भाग लेना पड़ रहा है, तो समान अवधि के अन्य विभागों के पात्र कर्मचारियों को उससे बाहर रखने का कारण स्पष्ट होना चाहिए। यदि किसी विभाग में ऑनलाइन अभियान दो बार हो चुके हैं, फिर भी कर्मचारियों को ऑफलाइन स्टेशन दिए गए और उनके नियुक्ति पत्रों में अगली ऑनलाइन प्रक्रिया में अनिवार्य भागीदारी की शर्त रखी गई, तो बाद में उन्हें उसी प्रक्रिया से बाहर करना भी पुनर्विचार योग्य है।
ऑनलाइन तबादला नीति की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है जब नियम विभाग, कर्मचारी या परिस्थिति के अनुसार बदलते हुए न दिखाई दें। सरकार को तकनीकी व्याख्या से अधिक नीति की मूल भावना, विभागीय भिन्नता से अधिक समान अवसर और पुरानी भागीदारी से अधिक वर्तमान पात्रता को महत्व देना चाहिए। तबादला किसी कर्मचारी को मनचाही पोस्टिंग देने का अधिकार नहीं है, लेकिन पात्र कर्मचारी को निष्पक्ष प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर देना प्रशासनिक न्याय का मूल सिद्धांत अवश्य है।
आखिर सवाल सीधा है—जब 2022 से 2026 के बीच नियुक्त शिक्षकों को अनिवार्य रूप से ऑनलाइन तबादला प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है, तो उसी अवधि में नियुक्त अन्य पात्र कर्मचारियों को समान अवसर क्यों नहीं? जब किसी कर्मचारी को नियुक्ति पत्र में अगली ऑनलाइन प्रक्रिया में भाग लेना अनिवार्य लिखा गया है, तो बाद में उसे उसी प्रक्रिया से बाहर क्यों किया जाए? और जब किसी विभाग में ऑनलाइन तबादला नीति पहले से लागू है तथा उसके अंतर्गत अभियान भी हो चुके हैं, तो कर्मचारियों की स्थिति निर्धारित करने में उस विभाग के पूरे नीतिगत इतिहास को क्यों न देखा जाए?
इन प्रश्नों का स्पष्ट, लिखित और तर्कसंगत उत्तर आवश्यक है। ऑनलाइन तबादला नीति की असली परीक्षा यही है कि वह केवल ऑनलाइन हो, या वास्तव में समान, पारदर्शी, समयबद्ध और न्यायपूर्ण भी हो।
यदि मॉडल ऑनलाइन तबादला नीति की व्याख्या और क्रियान्वयन में कमियां बनी रहती हैं, तो नीति का उद्देश्य पूरा होने के बजाय विवाद बढ़ सकते हैं और मामला न्यायालयों तक पहुंच सकता है। अलग-अलग विभागों में अलग-अलग व्याख्या, पात्र कर्मचारियों को लेकर अस्पष्टता, पुरानी और नई नियुक्तियों के बीच असंगत व्यवहार तथा ऑनलाइन और ऑफलाइन आवेदन के बीच विरोधाभास न्यायिक विवाद की संभावना बढ़ाते हैं। इसका असर प्रशासनिक समय और संसाधनों पर पड़ता है तथा कर्मचारियों को भी लंबे समय तक अनिश्चितता और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती है।
इसलिए आवश्यकता बार-बार नई ऑनलाइन तबादला ड्राइव चलाने की नहीं, बल्कि एक स्पष्ट, त्रुटिरहित और वास्तव में मॉडल नीति बनाने की है। सभी विभागों और कैडरों के लिए पात्रता, कट-ऑफ, नेशनल श्रेणी, पूर्व ऑनलाइन भागीदारी, ऑनलाइन स्टेशन प्राप्त कर्मचारियों तथा 2022 से 2026 के बीच नियुक्त कर्मचारियों की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। जहां आवश्यक हो, पुराने आदेशों और नियुक्ति पत्रों में दी गई शर्तों का भी सम्मान किया जाना चाहिए। एक बार नियम स्पष्ट होने के बाद समयबद्ध तरीके से पूरी प्रक्रिया पूरी हो, ताकि कर्मचारी बार-बार होने वाली तबादला ड्राइव की खबरों, आशंकाओं और अनिश्चितता से मुक्त होकर अपने कार्य पर ध्यान दे सकें।
मॉडल ऑनलाइन तबादला नीति का उद्देश्य केवल ऑनलाइन आवेदन लेना नहीं, बल्कि ऐसी निष्पक्ष व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें पात्र कर्मचारी को समान अवसर मिले, उसकी पसंद पर नियमों के अनुसार विचार हो, प्रशासनिक आवश्यकता भी सुरक्षित रहे और पूरी प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से समाप्त हो। तभी कर्मचारियों को उनकी पात्रता और निर्धारित मानकों के अनुसार नए स्टेशन मिल सकेंगे और बार-बार बदलती व्याख्याओं तथा अधूरी तबादला प्रक्रियाओं से उत्पन्न मानसिक परेशानी से उन्हें राहत मिलेगी।
आखिर एक अच्छी नीति वही है जो विवाद पैदा करने के बजाय समाधान दे, अनिश्चितता बढ़ाने के बजाय विश्वास पैदा करे और कर्मचारियों को बार-बार तबादला प्रक्रिया की चिंता में उलझाने के बजाय निश्चिंत होकर अपना काम करने का अवसर दे। यही ऑनलाइन तबादला नीति की वास्तविक परीक्षा है—क्या वह केवल ऑनलाइन है, या वास्तव में समान, पारदर्शी, समयबद्ध और न्यायपूर्ण भी है?