हिंदी दिवस विशेष: अंग्रेजों से मिली स्वतंत्रता, अब भाषा के हीनभाव से भी मिले मुक्ति

हिंदी दिवस विशेष: अंग्रेजों से मिली स्वतंत्रता, अब भाषा के हीनभाव से भी मिले मुक्ति

हिंदी से ही हमारी पहचान अंग्रेजों से मिली स्वतंत्रता, अब भाषा के हीनभाव से भी मिले मुक्ति। लेखक डॉ. अशोक कुमार वर्मा के अनुसार अंग्रेज चले गए भारत से, स्वतंत्रता का प्रभात हुआ, मन तो आज भी परतंत्र है, जहाँ अंग्रेजी का वास हुआ। भारत विविधताओं का देश है। यहाँ अनेक भाषाएँ, बोलियाँ, साहित्यिक परंपराएँ और सांस्कृतिक धाराएँ सदियों से एक-दूसरे के साथ बहती रही हैं। इसी विविधता के बीच हिंदी ने देश के विशाल जनसमुदाय के बीच संवाद और अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बनने का गौरव प्राप्त किया है। हिंदी केवल बोलने और लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की संवेदना, संस्कृति, संस्कार और जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति भी है।

हिंदी दिवस का ऐतिहासिक महत्व

प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इसका संबंध 14 सितंबर 1949 के उस ऐतिहासिक दिन से है, जब संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। संविधान लागू होने के साथ यह व्यवस्था संवैधानिक रूप से प्रभावी हुई। हिंदी दिवस इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में मनाया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक भाषा संबंधी प्रावधान किए गए हैं। वहीं अनुच्छेद 351 संघ को हिंदी के प्रसार और विकास का दायित्व देता है, ताकि हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति के विभिन्न तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

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राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर

यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि संविधान ने हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि संघ की राजभाषा का स्थान दिया है। भारत की भाषायी विविधता उसकी शक्ति है और प्रत्येक भारतीय भाषा हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। इसलिए हिंदी का सम्मान किसी दूसरी भारतीय भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि सभी भाषाओं के सम्मान के साथ होना चाहिए। अंग्रेज चले गए, पर मानसिकता कब जाएगी? भारत ने लंबे संघर्ष और असंख्य बलिदानों के बाद राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की। अंग्रेज भारत से चले गए। शासन की बागडोर भारतीयों के हाथों में आई। परंतु आज भी हमारे सामने एक प्रश्न खड़ा है कि क्या हमारी मानसिकता पूरी तरह स्वतंत्र हुई है?

मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता

यहाँ अंग्रेजी भाषा का विरोध करना उद्देश्य नहीं है। किसी भी भाषा को सीखना ज्ञान का विस्तार है। आज के समय में अनेक भाषाओं का ज्ञान व्यक्ति की क्षमता को बढ़ाता है। चिंता उस मानसिकता से है जिसमें अंग्रेजी बोलने वाले व्यक्ति को स्वतः अधिक बुद्धिमान, अधिक योग्य और अधिक आधुनिक मान लिया जाता है, जबकि हिंदी बोलने वाला व्यक्ति स्वयं को हीन समझने लगता है। यह स्थिति स्वीकार करने योग्य नहीं होनी चाहिए। किसी व्यक्ति का ज्ञान उसके विचारों, आचरण, परिश्रम, चरित्र और कर्म से निर्धारित होता है, केवल उसकी भाषा से नहीं। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, बुद्धिमत्ता का प्रमाणपत्र नहीं।

हिंदी में माँ की ममता और संस्कार

हमारी भाषा हमारे जीवन की पहली स्मृतियों से जुड़ी होती है। जिस भाषा में माँ ने पुकारा, जिस भाषा में पिता ने समझाया, जिस भाषा में दादा-दादी और नाना-नानी ने कहानियाँ सुनाईं, उसी भाषा में हमारी भावनाओं की पहली दुनिया बनी। हिंदी केवल भाषा नहीं है, हिंदी अपने संस्कार हैं, हिंदी अपनी संस्कृति है, हिंदी जीवन के आधार हैं। हिंदी का सम्मान करने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हम दूसरी भाषाओं का विरोध करें। हमें अंग्रेजी सहित अन्य भाषाएँ सीखनी चाहिए। संसार का ज्ञान जितनी अधिक भाषाओं में उपलब्ध है, उतना ही व्यापक हमारा ज्ञान हो सकता है। लेकिन दूसरी भाषा सीखते समय अपनी भाषा को छोटा समझना उचित नहीं।

हिंदी को ज्ञान और विज्ञान की भाषा बनाना

हमें अपने बच्चों को यह विश्वास देना होगा कि हिंदी बोलना पिछड़ापन नहीं है। हिंदी में विचार करना, हिंदी में लिखना और हिंदी में ज्ञान अर्जित करना गौरव की बात है। हिंदी दिवस की सार्थकता केवल समारोह, भाषण, कविता और प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हिंदी का वास्तविक विकास तब होगा जब शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विधि, चिकित्सा और आधुनिक ज्ञान के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण हिंदी सामग्री सहज रूप से उपलब्ध होगी। सरकार की राजभाषा नीति भी हिंदी के क्रमिक और व्यापक प्रयोग को प्रोत्साहित करती है। 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाकर यदि हम अगले दिन हिंदी को भूल जाएँ, तो उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

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