हिसार में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस आयोजित, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का संकल्प लिया गया

हिसार में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस आयोजित, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का संकल्प लिया गया

भारत का विभाजन केवल सीमाओं का बंटवारा नहीं था। यह मानव इतिहास की एक ऐसी त्रासदी थी। इस त्रासदी ने लाखों परिवारों, रिश्तों और सामाजिक ताने-बाने को गहरी पीड़ा दी। विभाजन की स्मृतियों को याद करने का उद्देश्य किसी के प्रति कटुता पैदा करना नहीं है। इसका उद्देश्य उस दौर की पीड़ा से सीख लेना है। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, मानवीय संवेदना और भाईचारा सर्वोच्च हों। यह बात हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष और प्रसिद्ध चिंतक प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कही। वे शुक्रवार को गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिविलाइजेशन स्टडीज ऑन माइग्रेशन एंड डिस्प्लेसमेंट की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह कार्यक्रम विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस-2026 के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। प्रो. अग्निहोत्री इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए।

विभाजन का इतिहास और मानवीय पीड़ा

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

प्रो. अग्निहोत्री ने कहा कि विभाजन के दौरान लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। लोगों को अपनी जमीन और कारोबार छोड़कर अनजान परिस्थितियों में विस्थापित होना पड़ा। असंख्य लोगों ने अपने परिजनों को खोया। लोगों ने बेहद अमानवीय परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने कहा कि विभाजन के इतिहास का अध्ययन तथ्यों के साथ किया जाना चाहिए। इसका अध्ययन पूरी संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। इससे नई पीढ़ी उस दौर की वास्तविक परिस्थितियों को समझ सकेगी। नई पीढ़ी उस समय की मानवीय पीड़ा को भी जान सकेगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की सांस्कृतिक एकता अत्यंत प्राचीन है। यह एकता बहुत व्यापक है।

भारत की विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत

कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने अपने संबोधन में विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक एकता सदियों पुरानी है। हमारी विविधता हमारी कोई कमजोरी नहीं है। यह विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने कहा कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस अतीत की पीड़ा को याद करने का दिन है। यह भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी है। विभाजन ने केवल भूगोल को नहीं बांटा था। इसने परिवारों, रिश्तों और सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डाला था। उन्होंने कहा कि इस दिन को किसी समुदाय के विरुद्ध भावना पैदा करने के लिए नहीं मनाया जाना चाहिए। इसे मानवता, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने के संकल्प के रूप में मनाया जाना चाहिए।

विस्थापितों का संघर्ष और प्रेरणा

डॉ. प्रताप सिंह ने कार्यक्रम में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद भारत में विस्थापित लोग आए थे। इन लोगों ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने अपने साहस, मेहनत और पुरुषार्थ के बल पर नए जीवन की नींव रखी। उन्होंने कहा कि उन लोगों का संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा का स्रोत है। विभाजन की त्रासदी से हमें महत्वपूर्ण सीख लेनी चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि सामाजिक एकता ही सब कुछ है। आपसी संवाद और भाईचारा ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

विभाजन के प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ितों का सम्मान

इस विशेष अवसर पर विभाजन के प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ितों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले लोगों में प्यारेलाल लाहोरिया, चंद्रभान गांधी, गोपाल मनचंदा, वीरा देवी, जीवन देवी और गोविंद राम शामिल थे। इसके अलावा खालिन्दा राम, कैलाश कुमारी, ईश्वर देवी तथा जयरामदास चावला को भी सम्मानित किया गया। इन सभी सम्मानित विभाजन पीड़ितों ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने अपनी स्मृतियों को सबके सामने रखा। उन्होंने उस दौर की पीड़ा, संघर्ष और विस्थापन की मार्मिक कहानियां सुनाईं। उनकी आपबीती सुनकर कार्यक्रम में मौजूद सभी लोग भावुक हो गए। कार्यक्रम के अंत में सेंटर फॉर सिविलाइजेशन स्टडीज ऑन माइग्रेशन एंड डिस्प्लेसमेंट के निदेशक डॉ. तेजपाल सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने अतिथियों, विभाजन पीड़ितों और उपस्थित सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

Share:

Comments

Leave a comment