हिसार: बिजली निजीकरण के विरोध में 11 से 13 अगस्त की हड़ताल को प्रो. संपत सिंह ने दिया समर्थन, भाजपा सरकार पर लगाए बड़े आरोप

Team Atal Hind11 August 20262 min read12 viewsहिसार
हिसार: बिजली निजीकरण के विरोध में 11 से 13 अगस्त की हड़ताल को प्रो. संपत सिंह ने दिया समर्थन, भाजपा सरकार पर लगाए बड़े आरोप

हरियाणा में बिजली क्षेत्र के निजीकरण को लेकर सियासत गरमा गई है। इनेलो के राष्ट्रीय संरक्षक एवं पूर्व मंत्री प्रो. संपत सिंह ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक बिजली व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय निजी कंपनियों के व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देने में जुटी है।

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बिजली कर्मचारियों की हड़ताल का समर्थन

प्रो. संपत सिंह ने 11, 12 और 13 अगस्त को बिजली कर्मचारियों एवं इंजीनियरों की प्रस्तावित हड़ताल का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल वेतन या कर्मचारियों की सेवा शर्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की सार्वजनिक बिजली व्यवस्था, किसानों, उपभोक्ताओं और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति को बचाने की लड़ाई है।

सार्वजनिक संस्थानों को कमजोर करने का आरोप

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सार्वजनिक बिजली संस्थानों को जानबूझकर कमजोर और अक्षम बताकर उनके लाभदायक हिस्सों को निजी कंपनियों को सौंपने की जमीन तैयार कर रही है। प्रो. सिंह ने कहा कि जिन बिजली संस्थानों का निर्माण जनता के टैक्स के पैसे से हुआ है, उन्हें मजबूत करना सरकार की जिम्मेदारी है, न कि उन्हें कमजोर करके निजीकरण का रास्ता खोलना। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिजली कोई सामान्य व्यावसायिक उत्पाद नहीं, बल्कि आम आदमी, किसान और उद्योग की बुनियादी जरूरत है।

बिजली निगमों की वित्तीय स्थिति और बकाया राशि

बिजली निगमों की वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि निगमों पर 27 हजार 915 करोड़ रुपये का घाटा और 27 हजार 248 करोड़ रुपये का कर्ज है। इसके अलावा डिफॉल्टरों से करीब 10 हजार 140 करोड़ रुपये की राशि बकाया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतनी बड़ी राशि की वसूली लंबित है, तो सरकार का ध्यान बकाया वसूलने और व्यवस्था में सुधार करने के बजाय निजीकरण की ओर क्यों है।

कृषि फीडर और अतिरिक्त बोझ का मुद्दा

कृषि फीडरों के लिए प्रस्तावित एग्रो कॉरपोरेशन या समानांतर व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि कृषि फीडरों की अलग पहचान पहले ही की जा चुकी है और टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से काम किया जा रहा है। ऐसे में बिजली निगमों के वित्तीय संकट के बीच नया संस्थागत ढांचा खड़ा करना सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। अंत में उन्होंने बिजली निगमों की वित्तीय स्थिति के लिए कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराने के प्रयासों को भी पूरी तरह से खारिज कर दिया।

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