हिसार कृषि विश्वविद्यालय में उपचारित अपशिष्ट जल सिंचाई परियोजना की समीक्षा बैठक हुई आयोजित

हरियाणा में कृषि क्षेत्र के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। भूजल संरक्षण तथा सिंचाई व्यवस्था को आधुनिक और टिकाऊ बनाने की दिशा में राज्य सरकार काम कर रही है। इसी कड़ी में उपचारित अपशिष्ट जल सिंचाई परियोजना के तहत एक समीक्षा बैठक आयोजित की गई। यह बैठक हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में बुधवार को संपन्न हुई।
पनिहार-चौधरीवास स्मार्ट सिंचाई क्लस्टर की प्रगति की समीक्षा
यह समीक्षा बैठक पनिहार-चौधरीवास स्मार्ट सिंचाई क्लस्टर की प्रगति को देखने के लिए बुलाई गई थी। इस महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री के ओएसडी वीरेंद्र सिंह बड़खालसा ने की। ओएसडी ने परियोजना की प्रगति की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि एक परियोजना, एक टीम और एकीकृत समयबद्धता की भावना से कार्य किया जाए। निर्धारित समय में गुणवत्तापूर्ण परिणाम सुनिश्चित किए जाने पर भी विशेष जोर दिया गया।
जल संसाधनों का संरक्षण और वैकल्पिक जल स्रोतों का उपयोग
बैठक के दौरान ओएसडी वीरेंद्र सिंह बड़खालसा ने कहा कि जल संसाधनों का संरक्षण करना बहुत जरूरी है। कृषि के लिए वैकल्पिक जल स्रोतों के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देना आज के समय की बड़ी मांग है। पनिहार-चौधरीवास की तर्ज पर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे क्लस्टर विकसित किए जाने चाहिए। प्रदेश में स्मार्ट, आधुनिक और टिकाऊ सिंचाई क्लस्टर विकसित किए जाने की योजना है। उन्होंने यह भी कहा कि सिंचाई क्षेत्र में नई तकनीक और टिकाऊ जल प्रबंधन समाधानों को बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
सतरोड़ और डाबड़ा में स्थापित तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
इस परियोजना के तहत गांव सतरोड़ और डाबड़ा में तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए गए हैं। इन प्लांटों से प्रतिदिन करीब 17 एमएलडी उपचारित अपशिष्ट जल निकाला जाएगा। इस उपचारित जल को बंद पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से सीधे कृषि क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा। इस योजना से करीब 1700 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई की जाएगी। इस व्यवस्था से लगभग 971 किसानों को सीधे तौर पर लाभ पहुंचेगा।
कृषि क्षेत्र में जल उपलब्धता और भूजल संरक्षण की चुनौतियां
हकृवि के कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने बैठक में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में जल की उपलब्धता और भूजल संरक्षण इस समय की दो प्रमुख चुनौतियां हैं। उपचारित अपशिष्ट जल के सुरक्षित और वैज्ञानिक उपयोग पर आधारित यह मॉडल बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। यह मॉडल सिंचाई के लिए वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध कराने का काम करेगा। साथ ही यह भूजल पर बढ़ते दबाव को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अनुसंधान निदेशक ने दी परियोजना की पूरी जानकारी
अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने परियोजना की अब तक की प्रगति की पूरी जानकारी दी। उन्होंने किसान संबंध एजेंसी के रूप में हकृवि की भूमिका के बारे में भी बताया। बैठक में पनिहार-चौधरीवास मॉडल को प्रदेश के अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में लागू करने पर चर्चा हुई। अधिकारियों और विशेषज्ञों ने तकनीकी प्रगति और पाइपलाइन नेटवर्क पर विचार-विमर्श किया। उपचारित जल के पुन: उपयोग, किसान सहभागिता तथा दीर्घकालीन संचालन एवं रखरखाव से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा की गई।
बैठक में उपस्थित प्रमुख अधिकारी और विशेषज्ञ
इस अवसर पर कई विभागों के अधिकारी, विशेषज्ञ एवं किसान बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। मिकाडा के एसडीई कपिल मूंड और चीफ इंजीनियर एसडी शर्मा बैठक में मौजूद थे। वॉटर यूजर सोसायटी के अध्यक्ष सुरेश कुमार ने भी बैठक में हिस्सा लिया। डॉ. सुरेंद्र धनखड़ और डॉ. दलीप बिश्नोई सहित अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी भी उपस्थित रहे।