स्वतंत्रता दिवस: स्वराज से सुराज की ओर बढ़ने का संकल्प दिवस - डॉ. विनोद बब्बर

Team Atal Hind11 August 20266 min read52 viewsलेख
स्वतंत्रता दिवस: स्वराज से सुराज की ओर बढ़ने का संकल्प दिवस - डॉ. विनोद बब्बर

स्वतंत्रता दिवस को स्वराज से सुराज की ओर बढ़ने का संकल्प दिवस माना जाता है। स्वतंत्रता का अर्थ अपने तीर, अपनी कमान और अपनी कमांड होना है। उच्च शिक्षा के सीमित अवसर, बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, राजनीति में धन-बल का बढ़ता प्रभाव, वैश्विक दबावों की घुटन और उमस भरे माहौल में आजादी की बात करना शीतल सुगंध समीर के सुखद झोंके के समान है। स्वधर्म, स्वराज, सुराज और स्वतंत्रता पर्यायवाची माने जा सकते हैं क्योंकि यह श्रृंखला प्रकृति का सिद्धांत है। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति परतंत्र बना सकती है। इस अर्थ में कहें तो 15 अगस्त 1947 को हमें केवल स्वराज्य मिला, स्वतंत्रता के शेष लक्षण अप्राप्त थे। देश का शासन भारतीयों के हाथों में आया, लेकिन शासन तंत्र का भारतीयकरण होना शेष था। स्वदेशी, स्वभाषा और स्वाभिमान ही किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के मुख्य स्तम्भ हैं। जब तक इनके आधार पर हम अपना शासन-तंत्र नहीं बदलते, तब तक स्वराज्य को सुराज्य में बदलना असंभव है।

भारतीय भाषाओं की अस्मिता और शिक्षा व्यवस्था

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स्वराज की प्राप्ति स्वधर्म है। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, ‘दूसरे के धर्म का पालन करने से बेहतर है स्वधर्म का पालन करते हुए नष्ट हो जाना।’ स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद आज भी भारतीय भाषाओं की अस्मिता खतरे में है। शासन से प्रशासन तक, कानून से शिक्षा तक विदेशी भाषा हावी है। प्रशासनिक सेवाओं में हिंदी सहित भारतीय भाषाएं जानने वालों का अनुपात लगातार कम हो रहा है। अपनी भाषाओं के सम्मान की आवाज उठाने की आवश्यकता का अर्थ है कि प्राप्त स्वतंत्रता आज भी अपर्याप्त है। यह केवल तथ्य नहीं, सत्य है कि जो नियम व्यवस्थाएं अंग्रेजों के काल में थी, उनमें से अधिकांश यथावत रहे। पुलिस व्यवस्था हो, शिक्षा व्यवस्था हो, शासन व्यवस्था हो, न्याय, कृषि, चिकित्सा हो या फिर समाज व्यवस्था हो। खंडित आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी त्रासद नेतृत्व की मानसिकता का खंडित होना रहा है। जो देश का ‘सरदार’ बनने की सर्वश्रेष्ठ योग्यता रखते थे उनसे अवसर छीन लिया गया लेकिन अल्प समय में ही उन्होंने राष्ट्र को एकसूत्रता में बांधने का संकल्प पूरा कर दिखाया लेकिन बाद वालों ने क्या किया?

अंग्रेजों के काल के नियमों में बदलाव और शिक्षा नीति

निसंदेह वर्तमान सरकार ने आप्रसंगिक हो चुके अंग्रेजों के काल के अनेक नियमों को रद्द करने से इण्डियन पैनल कोड को भारतीय न्याय संहिता में बदलने का साहस दिखाया है। मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के बदले नई शिक्षा नीति भी आई है लेकिन उसे पूरी तरह से लागू किया जाना अभी शेष है। नई शिक्षा नीति प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा अनिवार्य करने की बात करती है लेकिन आज भी राजधानी सहित लगभग हर नगर-महानगर में प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम डंके की चोट पर अंग्रेजी ही है और दुखद यह कि आज तक एक भी स्कूल प्रबंधक पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। ऐसे में हम सिर उठाकर कैसे कह सकते हैं कि हम अपनी भाषा, अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए स्वतंत्र हैं? हमने न जाने क्यों इस बात पर चिंतन भी छोड़ दिया है कि हमारी पीढ़ी को विदेशी वस्तु, विदेशी संस्कृति, विदेशी भाषा और विदेशी जीवन शैली अपनाने के लिए विवश क्यों किया जा रहा है? क्यों विदेशीकरण की ओर क्यों धकेला जा रहा है?

युवा पीढ़ी में बढ़ते नशीले पदार्थ और बदलती जीवनशैली

युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि एवं विद्या होना चाहिए, वहाँ धूम्रपान, मद्यपान और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों बढ़ रहे हैं। जीवन में संयम, धैर्य तथा शान्ति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवन शैली तथा विवेकहीन उन्माद ले रहा है। आखिर क्यों आजादी के लिए आत्म बलिदान देने वाले सेनानियों की कम परंतु सट्टे वाले क्रिकेट दलालों की जानकारी ज्यादा है? स्कूल-कालेजों में शारीरिक गतिविधियां लगभग गायब क्यों? यदि खेलकूद हैं भी तो महंगा क्रिकेट हावी क्यों? कम से कम साधनों में अधिक ऊर्जा प्रदान करने वाले अपने खेलों के साथ भेदभाव क्यों? आज सभी को नौकरी तो सरकारी चाहिए परंतु सुविधाएं प्राईवेट। दोहरी शिक्षा प्रणाली वर्ग विभाजन का कारण बन रही है। अपने बच्चे की शिक्षा पर भारी भरकम खर्च करने वालों के लिए ही अफसर का पिता कहलाने का अधिकार सुरक्षित है। अधिकांश सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर क्या है, उस पर चर्चा बेमानी है। ऐसे कुछ कारण अवश्य हैं तभी तो देश के दुर्घटना क्षेत्र के राज्य की विद्यालयों में न कोई पढ़ाना चाहता है और न ही कोई पढ़ना। जिनका काम पढ़ाना है उनके जिम्मे मतदाता बनाने से जनगणना तक हजारों काम हैं। मतदान से मतगणना तक लोकतंत्र उन्हीं के कंधों पर टिका है। क्या यह उचित नहीं होगा कि स्वतंत्र की परिभाषा में तंत्र के भाग्य विधाता यानि हर सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, विधायक, सांसद, मंत्री से संतरी तक सभी के आश्रितों के लिए सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग आवश्यक किया जाए? जिसे सरकारी व्यवस्था पर विश्वास नहीं तो उसे सरकारी पद क्यों मिलने चाहिए?

देश की सुरक्षा, नीति और प्रगति पर विचार

स्वतंत्रता दिवस इस बात पर चिंतन का अवसर है कि अनेक सरकारें बदलने के बाद भी समान नागरिक संहिता लागू करने के मामले में ‘कछुआ धर्म’ स्थाई क्यों बना रहा? एक पिद्दी सा शरारती पड़ोसी इतने वर्षों हमारे आंगन में आतंक कैसे फैलाता रहा? उससे सहानुभुति करने वाले भारत के नागरिक क्यों? पाक द्वारा कब्जाएं कश्मीर को वापस लेने के मामले में हमें अपने बल और विवेक पर भरोसा क्यों नहीं? सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, तो कभी विश्व बैंक की ओर क्यों देखता है? आजादी के 79 वर्षों में हमने प्रगति के पथ पर डग बढ़ाते हुए बहुत सी बाधाएं देखी हैं और उन बाधाओं के कारणों से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या हम प्रगति की गति से संतुष्ट हैं? यदि....हाँ तो, इसके कारणों की पड़ताल कौन करेगा? क्या आजादी का मतलब संस्थानों, कार्यालयों, स्कूलों व कालेजों में तिरंगा फहराना भर है? भारत अपनी समृद्ध विरासत और मेहनतकश देशवासियों के कारण आगे बढ़ा है पर नादिरशाह, गजनवी के राजनैतिक क्लोन आज भी देश को पीछे धकेल रहे हैं। क्या दोहरे आचरण की सडांध हमें विचलित नहीं करती? क्या राजनीति के नाम पर मनमानी को जारी रखकर हम स्वतंत्रता को सुराज की ओर बढ़ने से रोक नहीं रहे हैं? आजादी का अर्थ निरंकुशता और अनुशासनहीनता नहीं हो सकता। सामंजस्य का नाम ही आजादी है। किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा पीढ़ी होती है लेकिन पिछले दिनों कर्नाटक के कालेजों में हुई स्वास्थ्य जांच में हजारों युवाओं का एचआईवी पॉजिटिव होना संकेत है कि हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट किया जा रहा है। आज देश के महानगरों से सुदूर गांवों तक स्वच्छंदता बढ़ रही है, वह चिंताजनक है। बेलगाम इंटरनेट, सोशल मीडिया हमारी भावी पीढ़ी को भ्रमित और दिशाहीन कर रहा है और हम मौन देख रहे हैं तो इसे स्वतंत्रता अथवा सुराज नहीं कहा जा सकता। क्या इसी आजादी के लिए भारत माता के महान सपूत वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी? देश के उन शहीदों ने क्या कभी सपने में भी सोचा होगा कि आने वाली पीढ़ी न केवल उन्हें, अपितु राष्ट्र का गौरव और चरित्र के महत्व को भुला देगी? 80 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इन सभी विषयों पर गहराई से सोचने की आवश्यकता है।

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