वैश्विक बाजार में छा रहा भारत का सुपरफूड मखाना, जानिए कैसे बढ़ रहा है उत्पादन और निर्यात

भारतीय कृषि क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में कई पारंपरिक फसलों ने स्थानीय पहचान से निकलकर वैश्विक स्तर पर अपनी खास धाक जमाई है। इस श्रृंखला में सबसे नया और क्रांतिकारी नाम मखाना यानी फॉक्स नट का है। कभी यह केवल धार्मिक पूजा-पाठ, उपवास और पारंपरिक भारतीय व्यंजनों तक सीमित रहता था। लेकिन आज मखाना वैश्विक स्वास्थ्य और पोषण बाज़ार में एक प्रीमियम सुपरफूड के रूप में स्थापित हो चुका है। पौष्टिक तत्वों से भरपूर होने और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती वैश्विक जागरूकता के कारण इसकी मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाइयों पर पहुँच गई है।
राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और सरकारी योजनाएं
भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है और इस समय एक मखाना क्रांति के मुहाने पर खड़ा है। यह बदलाव देश के कृषि-खाद्य निर्यात को मजबूत कर रहा है। केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय बजट 2025-26 में की गई घोषणा के तहत 15 सितंबर 2025 को बिहार में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का औपचारिक शुभारंभ किया गया था। यह बोर्ड मखाने की पूरी वैल्यू-चेन को एकीकृत करने का काम कर रहा है। सरकार ने 2025-26 से 2030-31 की अवधि के लिए 476.03 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है।
उत्पादन में बिहार का दबदबा और मुख्य केंद्र
वैश्विक मखाना बाज़ार पर भारत का एक छत्र साम्राज्य है। दुनिया भर में आपूर्ति होने वाले मखाने का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत से पहुंच रहा है। देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग तीन चौथाई यानी 75 प्रतिशत है। बिहार के उत्तर और पूर्व में स्थित कोसी और मिथिला सीमांचल क्षेत्र मखाने की खेती का गढ़ बन चुके हैं। विशेष रूप से सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, दरभंगा, मधुबनी, कटिहार और पूर्णिया जिले मखाना उत्पादन के मुख्य केंद्र हैं।
उत्पादन के आंकड़े और जीआई टैग की भूमिका
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार भारत में मखाना उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। साल 2024–25 के दौरान भारत में कुल मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा था। साल 2025-26 में यह उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन तक पहुँचने का अनुमान है। बिहार के मिथिला क्षेत्र में उत्पादित मखाने को मिथिला मखाना के रूप में भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्रदान किया गया है। जीआई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मखाने की प्रामाणिकता और प्रीमियम छवि स्थापित हुई है।
निर्यात और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग
भारत आज अपने कुल मखाना उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत यानी करीब 25 हजार मीट्रिक टन तक निर्यात करता है। वर्ष 2025 में विदेश व्यापार महानिदेशालय ने पॉप्ड मखाना के लिए अलग एचएसएन कोड जारी किया था। वर्ष 2025-26 में भारत ने 19,296.08 लाख रुपये मूल्य के 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका 40 प्रतिशत, कनाडा 20 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात 17 प्रतिशत हिस्सा खरीदते हैं।
घरेलू खपत और पोषण संबंधी फायदे
भारत में पॉप्ड मखाने की औसत मासिक खपत 3 हजार से 3,500 मीट्रिक टन है, जो त्योहारों के सीजन में बढ़कर 5 हजार मीट्रिक टन तक पहुँच जाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से साबित हुआ है कि मखाने का पोषण स्तर कई पारंपरिक मेवों की तुलना में अधिक संतुलित है। मखाने में नगण्य वसा होती है और इसमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन पाया जाता है जिसकी पाचन क्षमता 95 प्रतिशत है। इसका ग्लाइसेमिक लोड कम होने के कारण यह डायबिटीज के मरीजों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।