भारतीय शिक्षा प्रणाली के मूल उद्देश्यों पर उठते प्रश्न: क्या शिक्षा एक नागरिक अधिकार है या बाजार का उत्पाद

भारतीय शिक्षा प्रणाली के मूल उद्देश्यों को लेकर देश में एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भारत में शिक्षा का संकट अब केवल स्कूलों-कॉलेजों की कमी, विश्वविद्यालयों की सीमित सीटों या बढ़ती फीस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि असली प्रश्न यह है कि शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य एक जागरूक नागरिक तैयार करना है या बाजार के लिए उपभोक्ता बनाना।
शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और व्यापारीकरण के खिलाफ विरोध
नौ अगस्त को 'भारत छोड़ो आंदोलन दिवस' के अवसर पर नई दिल्ली के जंतर-मंतर से ‘यूथ सोशलिस्ट इनिशिएटिव’ के बैनर तले गूंजे एक नारे ‘शिक्षा के सौदागरों, सत्ता छोड़ो’ ने इस बहस को पुनः देश के केंद्र में ला खड़ा किया है। समाजवादी कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं, शिक्षकों, छात्रों, पत्रकारों और युवाओं का यह विरोध प्रदर्शन शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायीकरण के खिलाफ एक व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करने का प्रयास था। भारतीय समाजवादी और लोकतांत्रिक परंपरा में शिक्षा को सदैव सामाजिक मुक्ति और समता का माध्यम माना गया है, परंतु 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद से भारतीय शिक्षा व्यवस्था का चरित्र तेजी से बदला है और निजी संस्थान कुकुरमुत्ते की तरह बढ़े हैं।
शिक्षा का अधिकार और बढ़ती असमानता
शुरुआती तर्क यह था कि सरकार अकेले देश की भारी-भरकम शैक्षिक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती, इसलिए निजी क्षेत्र का सहयोग आवश्यक है। समस्या तब शुरू हुई जब शिक्षा सेवा से हटकर कारोबार और अधिकार से बदलकर एक उत्पाद बन गई। जैसा कि प्रो. अनिल सद्गोपाल ने रेखांकित किया, शिक्षा के अधिकार को जल, जंगल, जमीन और आजीविका के बुनियादी अधिकारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जिस परिवार के पास आजीविका की सुरक्षा ही नहीं है, उसके बच्चे के लिए शिक्षा का संवैधानिक अधिकार महज कागजों तक सीमित रह जाता है। आज स्थिति यह है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यक्ति के आर्थिक सामर्थ्य पर निर्भर हो गई है और महंगी फीस, कोचिंग, डिजिटल गैजेट्स व हॉस्टल का खर्च आम परिवारों की पहुंच से बाहर है।
सरकारी व्यवस्था की कमियां और मुनाफा केंद्रित शिक्षा
कार्यक्रम में जयंतिभाई पांचाल ने स्पष्ट किया कि शिक्षा को बाजार की वस्तु के बजाय नागरिक अधिकार बनाना होगा, क्योंकि यदि शिक्षा केवल खरीदने की क्षमता पर तय होगी तो लोकतंत्र में समान नागरिकता का विचार ही बेमानी हो जाएगा। निजीकरण की आलोचना का अर्थ सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर पर्दा डालना नहीं है, क्योंकि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, गिरती गुणवत्ता और प्रशासनिक उदासीनता जैसे गंभीर मुद्दे हैं। असल सवाल यह है कि शिक्षा का चरित्र जनहितैषी है या मुनाफा केंद्रित। आज शिक्षा की पूरी बहस केवल नौकरी और प्लेसमेंट पैकेज के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है, जबकि डॉ. प्रेम सिंह ने कहा कि शिक्षा का काम केवल उद्योगों के लिए 'कुशल मजदूर' तैयार करना नहीं, बल्कि विवेकशील, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक नागरिक बनाना है।
कोचिंग उद्योग और युवाओं का संकट
संविधान के 86वें संशोधन के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया, लेकिन व्यवहार में विषमता और गहरी हुई है। आज कोचिंग उद्योग इस शैक्षिक संकट का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है क्योंकि स्कूल और विश्वविद्यालय प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुरूप गुणवत्ता प्रदान करने में विफल साबित हो रहे हैं। इसके बाद जब भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली जैसी घटनाएं होती हैं, तो यह युवाओं के भविष्य पर कुठाराघात करती हैं। यूथ सोशलिस्ट इनिशिएटिव ने संसद और राज्य विधानसभाओं के विशेष सत्र बुलाकर शिक्षा पर समग्र नीतिगत बहस की मांग की है। शिक्षा बाजार में बिकने वाला सामान नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की नींव है और राज्य को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी स्वीकारते हुए सार्वजनिक शिक्षा ढांचे को मजबूत करना होगा।